<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595</id><updated>2012-02-17T06:34:29.505+05:30</updated><title type='text'>भारत का वैज्ञानिक चिन्तन</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>45</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-9081092200509194998</id><published>2010-08-21T16:30:00.000+05:30</published><updated>2010-08-21T16:31:51.413+05:30</updated><title type='text'>वैदिक गणित के सोलह सूत्र एवं उपसूत्र</title><content type='html'>जगद्गुरु भारती कृष्ण तीर्थ जी द्वारा प्रतिपादित वैदिक गणित के 16 सूत्र एवं 13 उपसूत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;16 सूत्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1. एकाधिकेन पूर्वेण - पहले से एक अधिक के द्वारा&lt;br /&gt;2. निखिलं नवतश्चरमं दशत: - सभी नौ में से तथा अन्तिम दस में से&lt;br /&gt;3. उध्र्वतिर्यक् भ्याम् - सीधे और तिरछे दोनों विधियों से&lt;br /&gt;4. परावत्र्य योजयेत् - विपरीत उपयोग करें।&lt;br /&gt;5. शून्यं साम्यसमुच्चये - समुच्चय समान होने पर शून्य होता है।&lt;br /&gt;6. आनुररूप्ये शून्यमन्यत् - अनुरूपता होने पर दूसरा शून्य होता है।&lt;br /&gt;7. संकलनव्यवकलनाभ्याम् - जोड़कर और घटाकर&lt;br /&gt;8. पूरणापूराणाभ्याम् - पूरा करने और विपरीत क्रिया द्वारा&lt;br /&gt;9. चलनकलनाभ्याम् - चलन-कलन की क्रियाओं द्वारा&lt;br /&gt;10. यावदूनम् - जितना कम है।&lt;br /&gt;11. व्यष्टिसमिष्ट: - एक को पूर्ण और पूर्ण को एक मानते हुए।&lt;br /&gt;12. शेषाण्यङ्केन चरमेण - - अंतिम अंक के सभी शेषों को।&lt;br /&gt;13. सोपान्त्यद्वयमन्त्यम् - अंतिम और उपान्तिम का दुगुना।&lt;br /&gt;14. एकन्यूनेन पूर्वेण - पहले से एक कम के द्वारा।&lt;br /&gt;15. गुणितसमुच्चय: - गुणितों का समुच्चय।&lt;br /&gt;16. गुणकसमुच्चय: - गुणकों का समुच्चय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;font-size:130%;" &gt;उपसूत्र &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1. आनुरूप्येण - अनुरूपता के द्वारा।&lt;br /&gt;2. शिष्यते शेषसंज्ञ: - बचे हुए को शेष कहते हैं।&lt;br /&gt;3. आद्यमाद्येनान्त्यमन्त्येन - - पहले को पहले से, अंतिम को अंतिम से।&lt;br /&gt;4. केवलै: सप्तकं गुम्यात् - "क", "व", "ल" से 7 गुणा करें।&lt;br /&gt;5. वेष्टनम् - भाजकता परीक्षण की एक विशिष्ट क्रिया का नाम।&lt;br /&gt;6. यावदूनं तावदूनम् - जितना कम उतना और कम।&lt;br /&gt;7. यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्ग च योजयेत्&lt;br /&gt;8. अन्त्ययोर्दशकेऽपि&lt;br /&gt;9. अन्त्ययोरेव&lt;br /&gt;10. समुच्चयगुणित:&lt;br /&gt;11. लोपनस्थापनाभ्याम्&lt;br /&gt;12. विलोकनम्&lt;br /&gt;13. गुणितसमुच्चय: समुच्चयगुणित:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-9081092200509194998?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/9081092200509194998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/9081092200509194998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html' title='वैदिक गणित के सोलह सूत्र एवं उपसूत्र'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-6192134221946072953</id><published>2010-07-26T20:59:00.000+05:30</published><updated>2010-07-26T21:01:32.883+05:30</updated><title type='text'>भारत की विश्व को देन : गणित शास्त्र-१</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt; &lt;span style="text-align: left;" padma_font_family_property="DVW-TTSurekh" class="hcontent1"&gt; गणित शास्त्र की परम्परा भारत में बहुत प्राचीन काल से ही रही है। गणित के  महत्व को प्रतिपादित करने वाला एक श्लोक प्राचीन काल से प्रचलित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।&lt;br /&gt;तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्‌।। (याजुष ज्योतिषम) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि  सबसे ऊपर रहती है,  उसी प्रकार वेदांग और शास्त्रों में गणित सर्वोच्च स्थान पर      स्थित  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।&lt;br /&gt;पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत  महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना।  मंत्र कहता है, यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की  उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी  अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही  वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य  ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक  हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति  यानी शून्यता के बारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि  से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है।  यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक "कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक  स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन  हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्य देश गणना व ज्यामिति तथा अन्य  विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता  है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी  दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के  विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय अंकों की विश्व यात्रा की कथा विश्व के अनेक विद्वानों ने  वर्णित की है। इनका संक्षिप्त उल्लेख पुरी के शंकराचार्य श्रीमत्‌ भारती  कृष्णतीर्थ जी ने अपनी गणित शास्त्र की अद्भुत पुस्तक "वैदिक मैथेमेटिक्स"  की प्रस्तावना में किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे लिखते हैं "इस संदर्भ में यह कहते हर्ष होता है कि कुछ तथाकथित  भारतीय विद्वानों के विपरीत आधुनिक गणित के मान्य विद्वान यथा प्रो. जी.पी.  हाल्स्टैंड. प्रो. गिन्सबर्ग, प्रो. डी. मोर्गन, प्रो. हटन- जो सत्य के  अन्वेषक तथा प्रेमी हैं, ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया और प्राचीन भारत  द्वारा गणितीय ज्ञान की प्रगति में दिए गए अप्रतिम योगदान की निष्कपट तथा  मुक्त कंठ से भूरि-भूरि प्रशंसा की है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से कुछ विद्वानों के उदाहरण इस विषय में स्वत: ही विपुल प्रमाण प्रस्तुत करेंगे। &lt;/span&gt; &lt;/p&gt;  &lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="text-align: left;" padma_font_family_property="DVW-TTSurekh" class="hcontent1"&gt;प्रो.  जी.पी. हाल्स्टेंड अपनी पुस्तक "गणित की नींव तथा प्रक्रियाएं" के पृष्ठ  २० पर कहते हैं, "शून्य के संकेत के आविष्कार की महत्ता कभी बखानी नहीं जा  सकती है।" "कुछ नहीं" को न केवल एक नाम तथा सत्ता देना वरन्‌ एक शक्ति देना  हिन्दू जाति का लक्षण है, जिनकी यह उपज है। यह निर्वाण को डायनमो की शक्ति  देने के समान है। अन्य कोई भी एक गणितीय आविष्कार बुद्धिमत्ता तथा शक्ति  के सामान्य विकास के लिए इससे अधिक प्रभावशाली नहीं हुआ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;span class="hcontent1"&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="text-align: left;" padma_font_family_property="DVW-TTSurekh" class="hcontent1"&gt;इसी  संदर्भ में बी.बी.दत्त अपने प्रबंध "संख्याआें को व्यक्त करने की आधुनिक  विधि (इंडियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली, अंक ३, पृष्ठ ५३०-४५०) में कहते हैं  "हिन्दुआें ने दाशमलविक पद्धति बहुत पहले अपना ली थी। किसी भी अन्य देश की  गणितीय अंकों की भाषा प्राचीन भारत के समान वैज्ञानिक तथा पूर्णता को नहीं  प्राप्त कर सकी थी। उन्हें किसी भी संख्या को केवल दस बिंबों की सहायता से  सरलता से तथा सुन्दरतापूर्वक व्यक्त करने में सफलता मिली। हिन्दू संख्या  अंकन पद्धति की इसी सुन्दरता ने विश्व के सभ्य समाज को आकर्षित किया तथा  उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया।"&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt; &lt;span class="hcontent1"&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="text-align: left;" padma_font_family_property="DVW-TTSurekh" class="hcontent1"&gt;इसी  संदर्भ में प्रो. गिन्सबर्ग "न्यू लाइट ऑन अवर न्यूमरल्स" लेख, जो बुलेटिन  आफ दि अमेरिकन मैथेमेटिकल सोसायटी में छपा, के पृष्ठ ३६६-३६९ में कहते  हैं, "लगभग ७७० ई, सदी में उज्जैन के हिन्दू विद्वान कंक को बगदाद के  प्रसिद्ध दरबार में अब्बा सईद खलीफा अल मन्सूर ने आमंत्रित किया। इस तरह  हिन्दू अंकन पद्धति अरब पहुंची। कंक ने हिन्दू ज्योतिष विज्ञान तथा गणित  अरबी विद्वानों को पढ़ाई। कंक की सहायता से उन्होंने ब्रह्मपुत्र के "ब्रह्म  स्फूट सिद्धान्त" का अरबी में अनुवाद किया। ्फ्रांसीसी विद्वान एम.एफ.नाऊ  की ताजी खोज यह प्रमाणित करती है कि सातवीं सदी के मध्य में सीरिया में  भारतीय अंक ज्ञात थे तथा उनकी सराहना की जाती थी।"&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt; &lt;span class="hcontent1"&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="text-align: left;" padma_font_family_property="DVW-TTSurekh" class="hcontent1"&gt;बी.बी.  दत्त अपने लेख में आगे कहते हैं "अरब से मिश्र तथा उत्तरी अरब होते हुए ये  अंक धीरे-धीरे पश्चिम में पहुंचे तथा ग्यारहवीं सदी में पूर्ण रूप से  यूरोप पहुंच गए। यूरोपियों ने उन्हें अरबी अंक कहा, क्योंकि उन्हें अरब से  मिले। किन्तु स्वयं अरबों ने एकमत से उन्हें हिन्दू अंक  (अल-अरकान-अलहिन्द)&lt;/span&gt;&lt;span class="hcontent1"&gt;&lt;span class="hcontent1"&gt;&lt;span class="hcontent1"&gt;&lt;span style="text-align: left;" padma_font_family_property="DVW-TTSurekh" class="hcontent1"&gt; कहा"।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/ol&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-6192134221946072953?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/6192134221946072953'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/6192134221946072953'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='भारत की विश्व को देन : गणित शास्त्र-१'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-4229598250420152408</id><published>2010-06-22T12:39:00.004+05:30</published><updated>2010-06-22T12:59:08.139+05:30</updated><title type='text'>क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ था?</title><content type='html'>( इस लेख में दिये गये विचार &lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%82"&gt;&lt;span&gt;श्री&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चन्द्रकान्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राजू&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; द्वारा रचित पुस्तक 'क्या                     विज्ञान पश्चिम में शुरू हुआ?' से लिये गये हैं।  इस नई किताब में पश्चिम के इस पूर्वाग्रहपूर्ण इतिहास  को चुनौती दी गयी है और बताया                     गया है कि क्रुसेड और इंक्विजिशन का इतिहास पर क्या  असर पड़ा। मूलत: अंग्रेजी                     में लिखित इस किताब का हिंदी संस्करण प्रकाशित किया है  दानिश बुक्स, दिल्ली ने जबकि                     अंग्रेजी संस्करण मल्टीवर्सिटी और सिटिजंस इंटरनेशनल,  पेनांग, मलेशिया से प्रकाशित                     है। यह किताब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिलिस  के प्रो. विनय लाल द्वारा संपादित  '                    डिस्सेंटिंग नालेजेस' (Dissectimg Knowleges) पुस्तिका श्रृंखला में आठवीं है।                     )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजहब और सियासत के मेल से इतिहास विकृत होता है। पश्चिम में सियासत के साथ मजहब  का गठजोड़ 1700 साल पहले शुरू                     हुआ।  इसका पश्चिम के इतिहास पर क्या असर हुआ? इसकी एक  झलक दिखती है विज्ञान के इतिहास                     लेखन में। पश्चिमी इतिहास हमें बतलाता है कि विज्ञान  है तो सार्वभौमिक, मगर यह जन्मा                     सिर्फ पश्चिम में : जहाँ वह ग्रीक लोगों के बीच शुरू  हुआ और फिर कोपर्निकस और न्यूटन                     की क्रांतियों के साथ यूरोप में फैला. चर्च और सियासत  के मेल से बना यह इतिहास                     पूर्वाग्रहों से भरा है।&lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;                  क्रुसेड के दौरान, टोलेडो में कब्जा की गईं अरबी  किताबों का सामूहिक अनुवाद लैटिन में                     किया गया. उस समय यूरोप में इस्लाम के खिलाफ तीखा  धार्मिक उन्माद फैला था तो इस्लामी                     स्रोतों से सीखने को कैसे उचित ठहराया जाता? लिहाजा यह  कमाल का दावा किया गया कि इन                     किताबों में जो भी ज्ञान है वह यूनानियों की दें है,  अरबों ने तो सिर्फ उसे सदियों                     से संभाल कर रखा. इस कहानी के अनुसार ज्यामिति की  शुरुआत युक्लिड से और खगोलविज्ञान                     की क्लॉडियस टॉलेमी से हुई. बहुत से भोले लोगों ने  प्राथमिक तथ्यों की जाँच किए                     बिना इस पर विश्वास कर लिया. जबकि हकीकत यह है कि  ''युक्लिड'' और ''क्लॉडियस टॉलेमी''                     के वजूद के लिए भी कोई गंभीर सबूत नहीं हैं और न ही  कोई विश्वस्नीय तथ्य कि इन लोगों का क्रमशः                     एलिमेंट्स और अल्माजेस्ट नाम की किताबों से किसी तरह  का संबंध था, जिनका श्रेय उन्हें                     दिया जाता है. इसके विपरीत राजू की किताब से ऐसे अनेक  ठोस सबूतों का पता चलता है जो                     बताते हैं कि ये किताबें काफी बाद की हैं.&lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;                  इसी प्रकार, इंक्विजिशन के दौरान यूरोपियों ने  गैर-ईसाई सूत्रों का जिक्र कभी नहीं                     किया, क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें विधर्मी ठहरा कर  यातनाएँ दे कर मार दिया जाएगा.                     इसलिए वे नियमित रूप से सभी विचारों के ''स्वतंत्र रूप  से पुनर्खोज'' का दावा करते                     थे. वास्तव में कोपर्निकस ने तो अरब लेखकों से शब्दशः  नक़ल किया, जबकि न्यूटन भारत                     से आयातित कैलकुलस पर अत्यधिक निर्भर था.                  &lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;                  तथ्यों के आलोक में विज्ञान की पश्चिम में उत्पत्ति या  विज्ञान के पश्चिमी मूल                     की भव्य कथा अब बिखर गई है. यह किस्सा संचारण  (यूनानियों से) और गैर-संचारण (दूसरे                     से) के झूठे दावों पर आधारित था, जिसके लिए सबूत के  दोहरे मानदंडों का इस्तेमाल किया                     गया.                  &lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;                  यूरोप में आयातित ज्ञान का धर्मशास्त्रीय-रूप-से-सही  स्रोत ही नहीं बताया गया, क्रुसेड                     के बाद के ईसाई धर्मशास्त्र के अनुकूल उसकी  पुनर्व्याख्या भी की गई. इस तरह विज्ञान                     में मजहब की व्यवस्थित घुसपैठ हुई. उदहारण के लिए,  न्यूटन के नियमों के लिए अंग्रेजी                     में ''कानून'' (लॉ) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.  क्रुसेड के बाद क्रिस्तानी धर्मशास्त्र                     में ऐसा माना गया कि भगवान दुनिया को दैवी कानूनों के  तहत संचालित करता है और न्यूटन                     ने दावा किया कि उसे ईश्वर के इन कानूनों का पता चल  गया है. उसकी सोच पूरी तरह गलत                     थी. उपनिवेशवादी और नस्लवादी इतिहासकारों ने इसी आधार  पर ज्ञान की अन्य सभी प्रणालियों                     को यह कह कर गलत ठहराया कि जो पश्चिम कि नक़ल नहीं  करता वह विज्ञान हो ही नहीं सकता.                     इस चालबाजी के साथ, धर्मशास्त्र के रंग में रँगे  यूरोपीय  ''एथ्नोमैथमेटिक्स''                     को सार्वभौमिक करार दिया गया. यह भ्रामक और झूठा  प्रचार लोगों के जेहन पर इस कदर हावी                     हो गया कि लोग यह मानने लगे कि वे पिछडे इसलिए हैं  क्योंकि उनके पास विज्ञान नहीं है                     और इसका इलाज सिर्फ यह है कि वे पश्चिम की नक़ल करें.  इसलिए आजादी के बाद भी धर्मशास्त्र                     से रँगे मैथमेटिक्स और विज्ञान की बिना समीक्षा किये  इन्हें धर्मनिरपेक्ष ज्ञान के                     रूप में स्कूली बच्चों को पढ़ाया जाता है.                  &lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;                  राजू ने अपनी उक्त किताब के जरिये इस विभ्रम को उजागर  किया है और बताया है कि इसका                     असली इलाज ''विज्ञान में स्वराज'' ही हो सकता है न कि  पश्चिम कि नक़ल करना । इसके लिए                     गणित और विज्ञान को व्यावहारिक उद्देश्यों से जोड़कर  पश्चिमी धर्मशास्त्र से दूर रखना                     होगा और पश्चिमी सामाजिक स्वीकृति के मानदंड से खुद को  अलग करना होगा. चूँकि ज्यादातर                     लोग विज्ञान के मामले में अनपढ़-जैसे हैं, वे स्वयं तय  नहीं कर पाते कि अच्छा या वास्तविक                     विज्ञान क्या है और दूसरों द्वारा फैलाए गए अफसानों के  घेरे में फँस जाते हैं. इसलिए                     ''विज्ञान में स्वराज'' की खातिर पहला जरूरी कदम है  विज्ञान के पश्चिमी इतिहास का पर्दाफाश                     करना और राजू की इस पुस्तक में यही किया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;span&gt;पुस्तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सारांश&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिमी इतिहास के मुताबिक विज्ञान ग्रीक लोगों में शुरू हुआ और यूरोप में  नवजागरण के बाद विकसित हुआ. इस कहानी को तीन चरणों में गढ़ा गया था.                    &lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;पहला, क्रुसेड (यानी युरोपी धर्मयुद्ध) के दौरान एक अरब किताबघर ईसाईयों के  कब्जे में आया और उन किताबों का सामूहिक अनुवाद हुआ. धार्मिक उन्माद के उस  माहौल में दुश्मन से सीखना कैसे उचित ठहराया जाय? इसलिये कहा गया कि इन  किताबों में जो विज्ञान है वह सब ग्रीक मूल का है.  दो प्रमुख मामले  यूक्लिड (ज्यामिति) और क्लोडिअस टोलेमी (खगोल विज्ञान) — दोनों ही मनगढ़ंत  हस्तियाँ  — के द्वारा इस प्रक्रिया  को इस पुस्तक में  दर्शाया गया है.                    &lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;दूसरा, इनक्विजिशन के दौरान, समूची दुनिया के वैज्ञानिक ज्ञान को फिर  धर्मशास्त्रीय-रूप-से-सही मूल देने की कोशिश की गई यह कह कर कि यह ज्ञान  दूसरों से संचारित &lt;em&gt;नहीं&lt;/em&gt; था, बल्कि यूरोपियों ने इसकी "स्वतंत्र  रूप से पुन: खोज" की. कोपर्निकस और न्यूटन (कैल्कुलस) के मामले इस "पुन:  खोज द्वारा क्रांति" को दर्शाते हैं.                    &lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;तीसरे, इस विनियोजित ज्ञान की पुनर्व्याख्या कर उसे क्रुसेडोत्तर  क्रिस्तानी धर्मशास्त्र के अनुकूल बनाया गया. नस्लवादी और उपनिवेशवादी  इतिहासकारों नें इसका फायदा उठाते हुए यह कहा कि (धर्मशास्त्रीय रूप से)  "सही" विज्ञान (ज्यामिति, कैल्कुलुस, आदि) सिर्फ़ यूरोप में ही मौजूद था.                    &lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;इन प्रक्रियाओं से विनियोजन अब भी जारी है।&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;विज्ञान के इतिहास की "वर्ल्ड क्लास" जालसाजी  की गयी, क्रुसेड (युरोपी धर्मयुद्ध) और इंक्विजिशन के दौरान.&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt; ''युक्लिड'' और ''क्लॉडियस टॉलेमी'' के वजूद  के लिए भी कोई गंभीर सबूत नहीं,                             उनको अध्यासित किताबें बहुत बाद की.&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;कोपर्निकस ने अरब लेखकों से शब्दशः नक़ल की.&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;न्यूटन भारत से आयातित कैलकुलस पर अत्यधिक  निर्भर था.&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;विकृत पश्चिमी इतिहास के साथ साथ पश्चिमी  धर्मशास्त्र से रँगे मैथमेटिक्स और विज्ञान की बिना समीक्षा                             किये इन्हें धर्मनिरपेक्ष ज्ञान के रूप में  स्कूली बच्चों को पढ़ाया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;''विज्ञान में स्वराज'' की मांग :  गणित और  विज्ञान को व्यावहारिक उद्देश्यों से जोड़कर                             पश्चिमी धर्मशास्त्र से दूर रखना होगा और  पश्चिमी सामाजिक स्वीकृति के मानदंड से खुद                             को अलग करना होगा. &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-4229598250420152408?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4229598250420152408'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4229598250420152408'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html' title='क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ था?'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-2514198005670937421</id><published>2010-06-06T11:22:00.002+05:30</published><updated>2010-06-06T11:28:41.553+05:30</updated><title type='text'>प्राचीन भारत में वर्णक्रम मापन  - २</title><content type='html'>(क्रमशः)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम इस यंत्र के पाठ (text) का अध्ययन करते हैं तो प्रतीत होता है कि इस  यंत्र में प्रकाश विकिरण के तीनों क्षेत्र अर्थात् अंधतम, गूढ़तम एवं तम  (ultraviolet, visible and infrared region) के मापन के लिये आवश्यकता के  अनुसार सुविधा निहित है। उदाहरणार्थ, गूढ़तम (visible radiation) के मापन  हेतु प्रकाश को दिवाकर दर्श चक्र (यंत्रांग - ७) पर स्थित प्रभाकर मणि, जो  कि समानान्तर कारक मणि (collimating lens) के रूप में कार्य करता है, पर  आपतित करते हैं, इससे निर्गत समानान्तर किरणें निशाकर दर्श चक्र (यंत्रांग -  ८) पर स्थित "किरण ग्राहक मणि" (conical prism) द्वारा आवर्त्तित होकर अंत  में प्रभामुखदर्शचक्र (यंत्रांग - ११) पर स्थित प्रभामणि के द्वारा  "छायापकर्षण दर्श" (यंत्रांग - २) पर वार्णिक वृत्तों (spectral remhd) के  रूप में, जिनका केन्द्र अंशांकित वृत्तात्मक पैमाने के केन्द्र पर स्थित  होते हुए प्रतिबिम्ब बनाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तत्तद्रेखांकनैस्सम्यक्प्रमाणंतमस:क्रमात्।&lt;br /&gt;निर्णेतुंशक्यतेतस्मात्तदंगोत्रप्रदर्शित:।।&lt;br /&gt;प्रमाणविधिरप्यत्रसंकेतात्सोच्यतेधुना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त अंशाकित वृत्तात्मक पैमाने पर वार्णिकवृत्त (spectral ring) के  छेदन बिन्दु के संगत कोण के द्वारा तम-प्रमापक-संख्या किंवा 'सांकेत' का  मापन होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; वर्णक्रमीय आँकड़े (Spectral data) एवं उनकी विवेचना-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस संदर्भ में अंशुबोधिनी में तम के वर्णक्रमीय वृत्तों के सांकेतिक नाम  (सांकेत) के साथ तम-प्रमापक-संख्या कोण की "कक्ष्य" इकाई में क्रमपूर्वक दी  गयी है जोकि निम्नांकित उद्धरण से प्राप्त होती है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;संकेतों की नियमावली-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तम:प्रमापकसंख्यासांकेतनिर्णय:।&lt;br /&gt;अलिकंकौलिकंचैवरन्ध्रंमण्डमत:परम्।&lt;br /&gt;बिंबोकंवीचकमथतामसंरौणिकंस्फुटम्।।&lt;br /&gt;स्तंभं शंबरमंछूरंगुच्छकंकुडुपंतथा।&lt;br /&gt;गुळिकंछेटिकंपद्मंमण्डलंकंचुकंतथा।। इत्यादि।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तम (radiation) की तम प्रमापक संख्याओं की संगत सांकेतों की  नामावली-(संस्कृत पाठ) (तम-प्रमापक-संख्या) (सांकेत)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंचविंशच्छतकक्ष्यतमोबिन्दुरितीर्यते। १२५ तमोबिन्दु&lt;br /&gt;तत्पपंचकमलीकंस्यात्त्र्यळीकंकौलिकंभवेत्।। १३० अलिक&lt;br /&gt;रंध्रतत्पंचकंविन्द्यान्मण्डतस्याष्ठकंविदु:। १३३ कौलिक&lt;br /&gt;तन्मण्डदशकंबिम्बोकमितिप्रोच्यतेतथा।। १३८ रंध्र&lt;br /&gt;- १४६ मण्ड&lt;br /&gt;- १५६ बिम्बोक&lt;br /&gt;तद्विंशतिर्वीचकंस्यातामसंतद्दशस्तथा। १७६ विचक&lt;br /&gt;तदष्टकंरौणिकंस्यात्कुटंतद्वादशेतिच।। १८६ तमस&lt;br /&gt;- १९४ रौणिक&lt;br /&gt;- २०६ कुट&lt;br /&gt;ततस्तदशकंस्तंभमितिसंकीर्त्यतेक्रमात्। २१६ स्तम्भ&lt;br /&gt;तत्स्तंभपंचवदशकंशंबरंस्यातथैवहि।। २३१ शम्बर&lt;br /&gt;शंबरस्याष्टदशकंमंछूरमितिकीर्तितम्। २४९ मंचुर&lt;br /&gt;तदष्टदशकंतद्वद्गुच्छमित्यभिधीयते।। २६७ गुच्छक&lt;br /&gt;- २८७ कुडुप&lt;br /&gt;कुडुपंतद्विंशतिस्स्यातदष्टाविंशतिक्रमात्। ३१५ गुलिका&lt;br /&gt;प्रोच्यतेगुलिकमितितत्त्रिंशच्छेटिकंस्मृतम्।। ३४५ छोटिका&lt;br /&gt;छेटिकस्यत्रयोविंशत्पद्ममित्यभिथीयते। ३६८ पद्म&lt;br /&gt;तत्पद्मद्वात्रिंशतिर्मण्डळमित्युंच्यतेतथा।। ४०० मण्डल&lt;br /&gt;तन्मण्डळाष्टविंशत्कंचुकमित्यभिथीयते। ४२८ कंचुक&lt;br /&gt;इत्यादि।। - इत्यादि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंशुबोधिनी के पाठ (text) में उद्धृत सूर्यप्रकाश के वर्णक्रम से संदर्भित  ये आँकड़े विवेचित किये जाँच इसके पूर्व प्राचीन कोण की इकाई "कक्ष्य", मणि  संयोजन (prism setting) तथा आवश्यक सूत्र के निष्पादन हेतु वैज्ञानिक  टिप्पणियों की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्राचीन कोण की इकाई "कक्ष्य"-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भास्कराचार्य की गणित की पुस्तक "लीलावती" के पाठ के अनुसार&lt;br /&gt;व्यासेभनन्दाग्निहतेविभक्तेखबाणसूर्यैस्स: परिधिस्सूक्ष्म:।&lt;br /&gt;द्वाविंशतिघ्ने हृतेथ शैले स्थूलोथवा स्याद्व्यवहारयोग्य:।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"परिधि के सूक्ष्म परिमाण के लिए व्यास को ३९२७ से गुणा करके १२५० से भाग  दें। व्यावहारिक किंवा स्थूल मान के लिए २२ से गुणा करके ७ से भाग दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अत: "π" का मान २२/ ७ की अपेक्षा अधिक सही मान निमांकित व्यंजक से प्राप्त  होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;π = ३९२७ / १२५० = ३९२७ x ८ / १२५० x ८ = ३१४१६ / १००००अर्थात् १०,०००&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इकाई लम्बाई वाले वृत्त की अर्ध परिधि ३१४१६ इकाई के तुल्य होगी। अध्ययन से  यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में इस परिधि पर की इकाई चाप (arc) के द्वारा  केन्द्र पर बने कोण को १ "कक्ष्य" मानते रहे हैं।&lt;br /&gt;अत: १ कक्ष्य = १०-४ रेडियन (radian) किंवा १०.००० कक्ष्य = १ रेडियन।  द्रष्टव्य है कि जिस प्रकार "रेडियन" शब्द अंग्रेजी शब्द रेडियस (radius)  से व्युत्पन्न होता है, उसी प्रकार "कक्ष्य" भी कक्षा (orbit) से  व्युत्पन्न प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;३(ii) मणि-संयोजन (Prism Setting)-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यंत्र की विशिष्ट संरचना अंतरिक्षीय स्रोतों किंवा सौर विकिरण को सुलभता से  प्राप्त करने एवं समानान्तर कारक मणि (collimating lens) की नाभि (focus)  पर अवस्थित "सूचि छिद्र" (pin hole) पर आपतित होने योग्य है। प्रयुक्त मणि  (prism) शंक्वाकार (conical) है जिसका समतल आपतित समानान्तर किरणों के  अनुदिश एवं लम्बवत् होता है। विशिष्ट तरंग दैर्ध्य (wave length) वाला कोई  वार्णिक-विकिरण-मणि (prism) एवं प्रतिबिम्ब-कारक-मणि (focussing lens) से  आवर्त्तन के उपरान्त नाभितल में वार्णिक वृत्त (spectral circles) के रूप  में बिम्ब बनाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्र संख्या-१८ में किरण आरेख प्रदर्शित है। यह मणि संयोजन (prism  setting) सभी तरंग दैर्ध्य वाली किरणों के लिये एक कालिक (simultancously)  न्यूनतम विचलन (minimum deviation) किंवा सार्वत्रिक (universal) संयोजन के  तुल्य है, जबकि त्रिकोणीय मणि (triangular prism) की अवस्था में प्रत्येक  तरंग दैर्ध्य की किरणों के लिये अलग-अलग मणि-संयोजन आवश्यक होगा। यदि  निम्नांकित तर्कों पर हम विचार करें तो यह स्पष्ट विदित हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्र संख्या-१८&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्र संख्या १९&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रिपार्श्व (Triangular prism) ABC के द्वारा किसी दी गयी तरंग दैर्ध्य की  किरण के न्यूनतम विचलन के लिये प्रतिबन्ध है कि आपतित एवं निर्गत किरणें  अपने संगत पार्श्व पर समान रूप से झुकी हों जैसा कि चित्रसंख्या १९ (i) में  पदर्शित है। त्रिपार्श्व में किरण का मार्ग, आधार BC के समानान्तर हो जाता  है। कल्पना करें कि त्रिपार्श्व के शीर्ष । से गुजरने वाला, BC रेखा पर  लम्बवत् तथा ABC तल पर भी, अभिलम्बवत् है उस पर आपतित किरणें लम्बवत् होती  हैं जो कि सभी तरंग दैर्ध्य की किरणों के लिये सत्य होगा तथा यह प्रतिबन्ध  अनुपालित होगा। कल्पना करें काट रेखा युक्त (Shaded) अर्धभाग त्रिपार्श्व  से निकाल देते हैं जैसा कि चित्र संख्या १९ (ii) में प्रदर्शित है तथा  किरणें ।क् तल पर आपतित होती है, तो दाहिने भाग के द्वारा विचलन वही होगा  जैसा कि पूर्व में न्यूनतम विचलन के लिये प्रतिबन्ध के समय था। चित्र  संख्या १९ (iii) आवश्यक सूत्र का निगमन-&lt;br /&gt;त्रिपार्श्व के द्रव्य का आवर्त्तनांक 'µ' का मान निम्नांकित व्यंजक से  प्राप्त होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;µ = sin ( α+δ ) / sin α .................................(१)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ पर δ और α क्रमश: शंक्वाकार मणि का आधार कोण एवं आवर्त्तित किरण का  विचलन है।&lt;br /&gt;हम जानते हैं कि तरंग दैर्ध्य λ पर आवर्त्तनांक µ निर्भर करता है तथा λ का  मान अनंत की ओर अग्रसर हो तो, आवर्त्तनांक घटकर अपने न्यूनतम मान को, 'मान  लें' µoको प्राप्त करता है एवं यदि दी गयी किसी तरंग-दैर्ध्य का विचलन का  मापन सीमान्त विचलन δoसे किया जाय तथा इसका मान 'x' रेडियन हो तो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;δ = δo + x ..................................................  .(२)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ पर x का मान 'x' रेडियन हो तो इस मान को समीकरण १ में रखने पर हम पाते  हैं कि&lt;br /&gt;= sin (α +δo+x) / sin α = {sin ( α+δo) cos x + cos ( α+δo ) sin x }/ sin  x&lt;br /&gt;= sin (α+δo) cos x / sin α + cos (α+δo) sin x / sin α&lt;br /&gt;= µocos x + (cosec2α - µo2)१/२sin x&lt;br /&gt;= µo+ (cosec2α - µo2)१/२, x चूँकि x का मान बहुत कम  है.................(३)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समीकरण का कौशी (Couchi's) सूत्र µ = A+B /  λ2..........................(४) से तुलना करने पर हम प्राप्त करते हैं कि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;A = µतथा x = [B / (cosec2α - µo2)१/२]/  λ2..........................................(५  )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्रस्तुत प्रसंग में इस सूत्र का उपयोग-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अध्ययन से स्पष्ट है कि प्राचीन पाठ से प्राप्त वर्ण-क्रमीय आँकड़े  (spectroscopic data) पुनरुत्पादित किये जा सकते हैं यदि शंक्वाकार मणि  (conical prism) फ्लिंट (Flint) काँच का बना हो और उसका आधार का कोण π/६  रेडियन हो, तो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;A = µo= sin {(π/६) + δ o}/ sin (π/६)&lt;br /&gt;तथा x = B /{४ - µo2}१/२. λ2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ स्थिरांक A तथा B की गणना नीचे दिये गये तरंग दैर्ध्य तथा संगत  आवर्त्तनांक के प्रामाणिक मानों के आधार पर ज्ञात कर सकते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Flint glassRefractive Index Wavelength in A Line Colour&lt;br /&gt;१.६२२ ६५६३ C रक्त (Red)&lt;br /&gt;१.६२७ ५८९० D पीत (Yellow)&lt;br /&gt;१.६३९ ४८६२ F नील (Blue)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन आँकड़ों के उपयोग के उपरान्त कोशी (Cauchi's) सूत्र को हम निम्नांकित  रूप में पाते हैं-&lt;br /&gt;µ = १.६०१३२१५ +८.९०६८२९१ x १०-११/ λ२&lt;br /&gt;जहाँ पर A= १.६०१३२१५ तथा B = ८.९०६८२९१ x १०-११, जिनसे x का मान प्राप्त  कर सकते हैं। यथा x = ७.४३३२८४५ x १०-११/ λ२रेडियन = ७.४३३२८४५ x १०-७/  λ२कक्ष्य ......................(७)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सूत्र से किसी दिये गये तरंग दैर्ध्य के लिये तम-प्रमापक-संख्या, कोण की  कक्ष्य इकाई में ज्ञात कर सकते हैं।&lt;br /&gt;दृष्य विकिरण (गूढ़तम - Visible radiation) की दीर्घ तरंग दैर्ध्य की ओर की  सीमा ७७०० आंगस्ट्राम है। इस सीमान्त बिन्दु, जो कि तम (infrared) का  प्रारंभिक बिन्दु अथवा "तमोबिन्दु" जैसा कि संस्कृत पाठ (text) में उद्धृत  है, के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। अब हम उपर्युक्त समीकरण (७) की  सहायता से x का कक्ष्य इकाई में मान ज्ञात करें जो कि निम्नांकित होगा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;x = ७.४३३२८४५ x १०-७/ (७७०० x १०-८)२कक्ष्य = १२५.३७ कक्ष्य ≅ १२५ कक्ष्य,  जो कि तमोबिन्दु के संगत दी गयी 'तमप्रमापक संख्या' का मान ही है जैसा कि  संस्कृत पाठ (text) में उल्लिखित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुन: सौर वर्णक्रम में दृश्य परास (visible region) में स्थित फ्राउनहॉफर  रेखाओं का क्रम से कक्ष्य इकाई में मान ज्ञात कर सकते हैं। 5&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौर वर्णक्रम में कई फ्राउनहॉफर रेखायें देखी गयी हैं। 6 परन्तु कुछ ही को  A,B,B, आदि संकेतों से सम्बोधित किया गया है। इनके लिये कक्ष्य मान की गणना  कर सकते हैं और आसानी से A को अलिक, B को बिम्बोक, B को वीचक, D को स्तंभ,  E२को गुच्छक, b४को कुडुप, F को गुलिका, G को मण्डल तथा h, Hg को कंचुक के  रूप में पहचान हो सकती है क्योंकि गणनाकृत मान संस्कृत पाठ में दिये  सांकेतों के संगत कक्ष्य मानों के काफी निकट हैं और इन्हें तालिका-१  (table-१) में दो से छठें स्तंभ में दिखाया गया है। इसके विपरीत सांकेतों  यथा कौलिक, रंध्र, मण्ड, तमस, रौणिक, कुट, शम्भर, मंचुर, छोटिक तथा पद्म,  के तमप्रमापक संख्याओं के संगत तरंग-दैर्घ्यों की गणना की जा सकती है और  इन्हें तालिका-१ के तीसरे स्तंभ में तारांकित (asterisk) दिखाया गया है। इन  फ्राउनहॉफर रेखायें सौर वर्णक्रम में स्थित तो हैं परन्तु ज्योतिर्भौतिकी  में कोई सांकेतिक नाम नहीं दिया गया है।&lt;br /&gt;दृश्य परास (visible range) को पूर्ण करने हेतु दो और फ्राउनहॉफर रेखायें  (H and K) तथा अंधतम के पूर्व की सीमान्त तरंग दैर्ध्य (३९०० A), जिसे  अंधतमो बिन्दु (ultraviolet rediation) कह सकते हैं, को भी तालिका-१ की  अंतिम तीन पंक्तियों में सम्मिलित कर ली गयी है। इन मानों का सम्मिलित करना  भी न्याय संगत है क्योंकि प्राचीन तालिका 'इत्यादि' कह कर एकाएक समाप्त की  गयी है। यह रोचक तथ्य भी ध्यानाकर्षण योग्य है कि जैसा कि आधुनिक  ज्योर्तिभौतिकी में नक्षत्रों का वर्णक्रमीय वर्गीकरण 7 में इन्हें  तालिका-१ के स्तंभ ७ और ८ में दिखाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमप्रमापक संख्या एवं फ्राउनहॉफर रेखायेंक्र.सं. फ्राउनहौफर रेखाएँ  तरंगदैर्ध्य (एंग्स्ट्रांग इकाई में) कक्ष इकाई में तमप्रपापक संख्या  गणनात्मक संस्कृत पाठ कक्ष इकाई में तमप्रपापक संख्या गणनात्मक संस्कृत पाठ  ''सांकेत'' (सांकेतिक नाम) वर्णक्रमीय वर्गीकरण में नक्षत्र- प्रकार  वर्णक्रमीय वर्गीकरण में नक्षत्र- प्रकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१ - अनन्त रंग ० ० - - -&lt;br /&gt;२ - ७७०० १२५.४ १२५ तमोबिन्दु - -&lt;br /&gt;३ A ७५९४ १२८.९ १३० अलिक - -&lt;br /&gt;४ - ७४७६* - १३३ कौलिक R.N गहरा रक्त&lt;br /&gt;५ - ७३३९* - १३८ रन्ध्र - -&lt;br /&gt;६ - ७१३५* Red - १४६ मंड S गहरा रक्त&lt;br /&gt;७ B ६८७० १५७.६ १५६ बिंबोक - -&lt;br /&gt;८ C ६५६२ १७२.६ १७६ वीचक M रक्त&lt;br /&gt;९ - ६३२२* - १८६ तमस - -&lt;br /&gt;१० - ६१९०* - १९४ रौणिक K रक्ताभ पीत&lt;br /&gt;११ - ६००७* Orange - २०६ कूट - -&lt;br /&gt;१२ D ५८९० Yellow २१४.३ २१६ स्तम्भ G पीत&lt;br /&gt;१३ - ५६७३* - २३१ शंबर - -&lt;br /&gt;१४ - ५४६४ - २४९ मंछूर F पीताभ श्वेत&lt;br /&gt;१५ E२ ५२७० Green २६७.६ २६७ गुच्छक - -&lt;br /&gt;१६ b४ ५१६८ २७८.३ २८७ कुडुप A श्वेत&lt;br /&gt;१७ F ४८६१ ३१४.६ ३१५ गुलिका - -&lt;br /&gt;१८ - ४६४२* Blue - ३४५ छोटिका B नीलाभ श्वेत&lt;br /&gt;१९ - ४४९५* - ३६८ पद्म - -&lt;br /&gt;२० G ४३०८ ४००.५ ४०० मण्डल O नीलाभ श्वेत&lt;br /&gt;२१ h.Hg ४१६४ Violet ४२८.७ ४२८ कंचुक - -&lt;br /&gt;२२ H ३९६८.५ ४७२ - - - -&lt;br /&gt;२३ K ३९३३.७ ४८० - - - -&lt;br /&gt;२४ - ३९०० ४८९ - अंधतमो बिन्दु - -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गवाक्षों एवं मणियों (windows and lenses) के निर्मिति में प्रयुक्त लौहों  (materials) की निर्माण विधि एवं उनके गुण-&lt;br /&gt;इस अध्ययन से न केवल यंत्र अपितु तम के विभिन्न परासों (different ranges  of radiation) में लौहों (materials) का, जो कि शंक्वाकार मणि, उन्नतोदर  मणि तथा गवाक्षों (conical prisms, lenses and windows) के निर्मिति हेतु  प्रयोग में आते थे, का विवेचन प्राप्त होता है। निम्नांकित श्लोकों में  लौहों का वर्णन दिया गया है यथा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊष्णापकर्षक लौह,-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्वेतदूर्वाकमलपुष्पक्षाराष्टकमत:परम्।।&lt;br /&gt;ताम्रषोडशकेचूलीताम्रषोडशकंतथा।&lt;br /&gt;द्वादशस्वर्णलोहेषुहिरण्याष्टकमेवच।।&lt;br /&gt;गोदन्तीतालषट्कंचसूतपंचवकमेवच।&lt;br /&gt;सूर्यकान्तशिलाषट्कमेतान्संयोज्यभागश:।।&lt;br /&gt;क्रमान्माघिममूषायांसंपूर्याथयथाविधि।&lt;br /&gt;कूर्मव्यासटिकामध्येस्थाप्येगालादिभि:क्रमात्।।&lt;br /&gt;द्वात्रिंशदुत्तरचतुश्शतकक्ष्योष्णमानत:।&lt;br /&gt;गालयित्वायंत्रमुखेतद्रसंपूरयेत्क्रमात्।।&lt;br /&gt;उष्णापकर्षकंनामलोहंस्यात्कृत्कंतत:।&lt;br /&gt;तेनप्रकल्पितंभानुफलकंमधुवर्णकम्।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाशस्तंभनाभिदलौह,-&lt;br /&gt;स्तंभनामुखलोहेषुपश्चाद्द्वादशकस्यच।&lt;br /&gt;क्रमात्खचराख्यलोहस्याष्टभागांशकंतथा।।&lt;br /&gt;भूचक्रसुरमित्रादिक्षारपंचकमेवच।&lt;br /&gt;अयस्कांतस्यचत्वारिषड्भागोरुरुकस्यच।।&lt;br /&gt;एतान्तसंमेळ्यविधिवत्तत्तद्भागानुसारत:।&lt;br /&gt;पश्चाद्भ्रामणिकमूषामुखमध्येप्रपूर्यच।।&lt;br /&gt;पंचषष्ट्युत्तरद्विशतकक्ष्योष्णप्रमाणत:।&lt;br /&gt;गालयित्वातिवेगेनयंत्रास्ये संपूरयेत्।।&lt;br /&gt;एतद्भवेत्कृतकलोह:प्रकाशस्तंभनाभिद:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छाया प्रभाविभाजक लौह,-&lt;br /&gt;अथांजनिकदशकंधौम्यद्वादशकंतथा।&lt;br /&gt;नीलांजनेषोडशांशंचतुर्विंशांशकंरुरो:।।&lt;br /&gt;जंबालिकास्थिदशकंशर्कराष्टकमेवच।&lt;br /&gt;चतुर्दशांशंसूतस्यनवांशंगैरिकस्यच।।&lt;br /&gt;वराटिकापंचकंचतत्तद्भागानुसारत:।&lt;br /&gt;एतान्संयोज्यमूषायांसंपूर्यविधिवत्क्रमात्।।&lt;br /&gt;षड्विंशत्युत्तरपंचशतकक्ष्योष्ण मानत:।&lt;br /&gt;गालयित्वाथयंत्रास्येसेचतेयेद्यदिवेगत:।।&lt;br /&gt;छायाप्रभाविभाजकलौहस्यात्कृतकस्तत:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदि, उदाहरण के रूप में यहाँ पर उद्धृत हैं।&lt;br /&gt;इनमें से एक सर्वथा नवीन "प्रकाशस्तंभनाभिद" नामक लौह (material), आर्द्रता  से अप्रभावित रहने वाला (nonhygroscopic), ५००० से.मी.-१से १४००  से.मी.-१(अर्थात् प्राचीन पैमाने पर लगभग १९ कक्ष्य से २ कक्ष्य तक) के  अवरक्त तम (infrered radiation) के लिये पारदर्शी है, उसे राष्ट्रीय  धातुकर्म प्रयोगशाला (NML), जमशेदपुर, भारत में बनाया जा चुका है, जो कि  निश्चय ही आज के आधुनिक विज्ञान की अति उन्नत तकनीकी के ज्ञान में एक विशेष  योगदान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्रकाशस्तंभनाभिद लौह 8 &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मूल रूप से यह लौह (material) "अंशु बोधिनी" की पांडुलिपि में पृष्ठ ७६ पर  वर्णित है जिसका स्वरूप निम्नांकित है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अ) स्तंभनामुखलोहेषुपश्चाद्न्दशकस्यच।&lt;br /&gt;क्रमात्खचराख्यलोहस्याष्टभागांशकंतथा।।&lt;br /&gt;भूचक्रसुरमित्रादिक्षारपञ्चकमेवच।&lt;br /&gt;अयस्कांतस्यचत्वारिषड्भागोरुरुकस्यच।।&lt;br /&gt;एतान्संमेळ्यविधिवत्तत्तद्भागानुसारत:।&lt;br /&gt;(ब) पश्चाद्भ्रामणिकमूषामुखमध्येप्रपूर्यच।।&lt;br /&gt;पञ्चषष्ट्युत्तरद्विशतकक्ष्योष्णप्रमाणत:।&lt;br /&gt;(स) गालयित्वातिवेगेनयंत्रास्येसंपूरयेत्।।&lt;br /&gt;(द) एतद्भवेत्कृतकलोह:प्रकाशस्तंभनाभिद:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें चार द्रव्यों-"खचर लौह", "भूचक्रसुरमित्रादि क्षार", "अयस्कांत" तथा  "रुरुक" का उल्लेख है जिनकी लेखक के द्वारा क्रमश: सिलिका (silica - SiO२),  लाइम (lime - CaO), लोड स्टोन (lode stone - Fe३O४) एवं हरिणशावक  अस्थिक्षार (deer bone ash - Ca३P२O८) के रूप में पहचान की गयी है।&lt;br /&gt;टिप्पणि- उपर्युक्त उद्धरण का हिन्दी अनुवाद अर्थपूर्ण हो सके एतदर्थ हम  सर्वप्रथम उपर्युक्त उद्धरित चार द्रव्यों, नामत: १. खचर, २.  भूचक्रसुरमित्रादि क्षार, ३. अयस्कान्त तथा ४. रुरुक पर विचार करते हैं एवं  उनकी आधुनिक वैज्ञानिक विश्व को ज्ञात संगत लौहों (material) के साथ पहचान  की कोशिश करते हैं।&lt;br /&gt;क-१ उनमें प्रथम खचर (अंतरिक्ष में भ्रमण करने वाले) को हम अपने ग्रह  'पृथ्वी' के संदर्भ से सूर्य की अत्यंत प्रमुख नक्षत्र (star) के रूप में  मान्य करते हैं। यहाँ पर सूर्य के लिये प्रतिनिधि लौह से तात्पर्य है जो कि  भारतीय पुराणों के अनुसार स्फटिक (Quartz or silica SiO२) होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क-२ अगला द्रव्य भूचक्र या सुरमित्र है। पहला शब्द 'भूचक्र' संकेत देता है  कि यह बाह्य तल सर्पिल (spiral) आकृति लिये हुए भौमिक द्रव्य है। दूसरा  पर्यायवाची शब्द सुरमित्र (हिन्दू देवताओं का मित्र) को विष्णु के रूप में  ग्रहण कर सकते हैं, जिसका प्रतिनिधि द्रव्य शालिग्राम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में फाइलम सीफैलोपोडा एम्नोनॉयडिया (phylum cephalopoda amnonoidea)  वंश का यह जीवाश्म (Fossil) जुरैसिक काल का स्पीति शेल (spiti shale) है,  जिसकी रासायनिक संरचना कैलशियम कार्बोनेट (calcium - CO३) है। संस्कृत पाठ  इस लौह के क्षार भस्म के प्रयोग करने का निर्देश देता है। अत: इस द्रव्य का  पाकज लौह (calcination product) को चूना या कैलशियम ऑक्साइड (Calcium  oxide - CaO) है।&lt;br /&gt;क-३ तीसरा लोहे को आकर्षित करने वाला लौह अयस्कान्त है। स्पष्ट है कि यह  मैग्नेटाइट या लोड स्टोन (magnetite or lode stone) है जिसकी रासायनिक  संरचना फेरेसोफेरिक ऑक्साइड (Ferresoferric oxide - Fe३O४) है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क-४ अंतिम द्रव्य 'रुरुक' है। रुरु का अर्थ मृग शावक होता है अत: रुरुक का  तात्पर्य मृग-शावक से प्राप्त होने वाला लौह है। काँच बनाने में प्रयुक्त  प्रधान घटकों में से एक घटक अस्थिभस्म (bone ash) है। अस्थिभस्म मुख्यरूप  से ट्राइकैलशियम फाँस्फेट (tricalcium phosphate - Ca३P२O८) है। प्राचीन  काल में भारतीय वनों में बहुतायत से हरिण (मृग) थे तथा भारतीय पुराणों में  सामान्य रूप से यत्र-तत्र इनका वर्णन मिलता है।&lt;br /&gt;उपर्यक्त टिप्पणी के पश्चात् विचाराधीन संस्कृत श्लोकों का अनुवाद  निम्नांकित रूप में कर सकते हैं-&lt;br /&gt;क. तत्पश्चात् तम-स्तंभक (radiation absorbing) लौहों की सूची में से  बारहवाँ खचर लौह (silica -Si O२) का ८ भाग, भूचक्र सुरमित्रादि क्षार (lime  - CaO) के पाँच भाग, अयस्कान्त (lode stone - Fe३O४) के चार भाग तथा रुरुक  (deer bone ash - Ca३P२O८) के छह भाग उपर्युक्त अनुपात में विधिवत् मिलाये  जाते हैं।&lt;br /&gt;ख. इसके पश्चात् भ्रामणिकमूषा (घूमने वाली घरिया - rotating crucible) में  प्राचीन स्पर्शमान पैमाने पर २६५ कक्ष्य (लगभग ९४०ºc) पर पिघलाते हैं और तब&lt;br /&gt;ग. अतिशीघ्रता से यंत्रास्य (सांचे - कलम) में उडेलते हैं, तो&lt;br /&gt;घ. इस प्रकार प्रकाश स्तंभनाभिद लौह अर्थात् दृश्य प्रकाश का  अवशोषक/अनुरक्त प्रकाश का संचारक काँच (light absorbing / heat  transmilting material) तैयार होता है।क्योंकि ये लौह ८, ५, ४, तथा ६ भाग,  भार के अनुपात में मिश्रित करने हैं, अत: सर्वप्रथम एक भाग के तुल्य भार  मान को विनिश्वित करना होता है।&lt;br /&gt;पूर्व के अध्ययन 9 से ज्ञात होता है कि मुष्टि किंवा लौह पल का भार ४८ माष  (५४.२४ ग्राम) है। किसी उत्पादित लौह का मानक (standard) भार प्राप्त करने  के लिये उत्पादन के पूर्व उत्पादन-प्रक्रिया के समय होने वाली भार में  क्षतियों को ध्यान में रखना होता है। यदि १०% की कुल मिलाकर भार में क्षति  होने की संभावना हो तो उत्पादक (manufacturer) की इकाई ५४.२४ ग्राम के  स्थान पर ६०.३ ग्राम होगी। अत:, जैसा कि निम्नांकित तालिका में दिखाया गया  है, ८, ५, ४, तथा ६ भागों को लगभग उचित भार मान में अभिव्यक्त कर सकते हैं।&lt;br /&gt;"प्रकाश स्तंभनाभिद लौह की संरचना" विवेचनलौह की रासायनिक संरचना की पहचान  एवं अयस्क में प्रतिशत उपस्थिति संस्कृत पाठ में उद्धृत अनुपात संगत भार=  ६०.३ x अनुपात ग्राम(Gms) अणु भार निकटतम पूर्णांक में अनुमानित अणु संख्या  सापेक्ष अनुपात के साथ अणुओं की संख्या&lt;br /&gt;(१) (२) (३) (४) (५) (६)&lt;br /&gt;खचर लौह ८ ४८२.४ ६०.३ ८~८ ८(SiO२३७%&lt;br /&gt;भूचक्रसुरमित्रादिक्षार ५ ३०१.५ ५६.१ ५.३७~५ ५(CaO)२१.५%&lt;br /&gt;अयस्कान्त ४ २४१.२ २३१.४ १.०४~१ (Fe३O४)१७.७%&lt;br /&gt;रुरुक ६ ३६१.८ ३१०.३ १.१७~१ (Ca३P२O८)२३.८%&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत तालिका में स्तम्भ (१) रासायनिक संरचना की पहचान के साथ घटक लौह, स्तम्भ  (२) में उसका अनुपात, स्तम्भ (३) में संगत भार, स्तम्भ (४) में घटक अणु का  अणुभार, स्तम्भ (५) में निकटतम पूर्णाङ्क के साथ अनुमानित अणु संख्या तथा  अंतिम स्तंभ (६) में अंतिम पाकज लौह (product) में "प्रकाश स्तम्भनाभिद  लौह" की निर्मितीकारक घटक अणुओं के सापेक्ष प्रतिशत के साथ अणुओं की संख्या  दी गयी है जो कि इस लौह का आनुभविक सूत्र (empirical formula) के रूप में  ५(CaO.SiO२) . (Fe३O४.३SiO२) . (Ca३P२O८) निर्देशित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA), नई दिल्ली द्वारा वित्तपोषित  प्रकल्प (project) के अंतर्गत राष्ट्रीय-धातुकर्म-प्रयोगशाला (NML),  जमशेदपुर, भारत में यह लौह (काँच) निर्मित किया गया एवं इसकी संचरणकता  परीक्षा (transmittance test) की गयी। निकोलेट इंस्ट्रुमेंट कारपोरेशन  (Nicolet Instrument Corporation) के स्पेक्ट्रोफोटोमीटर  (spectrophotometer) की सहायता से वर्ण क्रमांकन (spectrogram) से यह  स्पष्ट है कि यह लौह ५००० सेंमी-१(२µ) पर या इससे अधिक पर संचरणकता ०.५% है  और लगभग २२०० सेमी-१(४.५५µ) तक लगातार बढकर ९.७२% होती है तदनन्तर १४००  सेमी-१(७ µ) के निकट तक घटकर शून्यमान तक आ जाती है। चित्र सं. २०&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह प्रकाश-स्तंभनाभिद लौह इस अर्थ में नवीन है कि गवाक्ष एवं मणियों  (windows and lenses) में प्रयुक्त किये जा सकने वाले इतर ज्ञात  अवरक्त-संचारक लौह (infrared transparent materials) यथा LiF२(६ µ तक)  CaF२(२ से ८.५ µ तक)ए NaCl (१५ µ तक), आदि, बुरी तरह से  आर्द्रता-प्रभाव-ग्रसित होते हैं तथा उन्हें कार्यक्षम रखने के लिये शुष्क  वातावरण की आवश्यकता होती है जो कि सर्वथा प्रयोगशालाओं के लिए असंभव सा  कार्य है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-2514198005670937421?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2514198005670937421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2514198005670937421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9996.html' title='प्राचीन भारत में वर्णक्रम मापन  - २'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-2264839213052453296</id><published>2010-06-06T11:17:00.002+05:30</published><updated>2010-06-06T11:21:55.074+05:30</updated><title type='text'>प्राचीन भारत में वर्ण-मापन-विज्ञान (स्पेक्ट्रोस्कोपी) - १</title><content type='html'>इस सिंहावलोकनात्मक प्राक्कथन आलेख में हम प्राचीन वर्ण-क्रम-मापन विज्ञान  के नीचे दिये गये बिन्दुओं पर आज के परिप्रेक्ष्य में उनकी महत्ता एवं  उपादेयता का विवेचन करेंगे :&lt;br /&gt;(क) उस काल में 'वर्णक्रम मापक' जैसे जटिल (Sophisticated) यंत्र रहे हैं।&lt;br /&gt;(ख) उनका उपयोग सूर्य के प्रकाश में अवस्थित वर्णों के विक्षेपण  (dispersion) मापन में तथा 'ज्योतिष-भौतिकी' (Astrophysics) में जिस प्रकार  आज नक्षत्रों (stars) का वार्णिक वर्गीकरण (spectral classification) करते  हैं, उसी रूप में करते रहे हैं।&lt;br /&gt;(ग)यंत्र में प्रयुक्त होने वाले मणियों एवं गवाक्षों (lenses: prisms and  windows) के निमित्त उपयुक्त लौहों (materials) को बनाने की विधियों एवं  गुणों को भी जानते रहे हैं।&lt;br /&gt;'प्राच्य संस्थान, बड़ोदरा' (Oriental Institute, Varodara), बड़ोदा के  पुस्तकालय में बोधानन्द की व्याख्या से युक्त महर्षि भरद्वाज द्वारा प्रणीत  'अंशुबोधिनी' 1 की प्राप्त पांडुलिपि (manuscript) के 'विषय वस्तु' (Text)  में 'घ्वान्त-प्रमापकऱ्यंत्र के नाम से संबोधित 'वर्णक्रम मापक'  (Spectrometer / monochromator) का वर्णन है। तदुपरांत सूर्य के प्रकाश का  मणि (prism) द्वारा विक्षेपित (dispersed) विभिन्न तम-किरणों (rays of  various radiation) के विभिन्न 'सांकतों' (symbols) के संगत प्राचीन कोण की  इकाई कक्ष्य (१ कक्ष्य = १०.४ रेडियन) में अभिव्यक्त कोण परिमाणों (सांकेत  संख्या) को क्रम से गिनाते हुए वर्णित किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तुत समस्या के समाधान हेतु संभवत: भौतिकी के सिद्धांताधीन गणना से  उपर्युक्त आँकड़े पुनरुत्पादित करने में हम समर्थ रहे हैं, जिस कारण  निम्नांकित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं :&lt;br /&gt;(१) वर्णक्रम मापी की विशिष्ट रूप से ऊर्ध्वाधर रचना अंतरिक्ष से आगत  ध्वांत /तम (radiation) को ग्रहण कर सकने की आवश्यकता के अनुकूल है।&lt;br /&gt;(२) भौतिकी सिद्धान्त की सहायता से आँकड़ों (data) के पुनरुत्पादित करने के  लिये प्रस्तुत परिस्थिति में एक लिंट कांच (Flint glass) का ३०º आधार कोण  वाला शंक्वाकार मणि (prism) जिसकी समतल सतह अंतरिक्ष से आपतित समानान्तर  कृत (collimated) ध्वान्त किरणों के लम्बवत् हो। यह मणि संयोजन (prism  setting) सभी तरंग दैर्ध्यवाली रश्मियों के लिये एक-कालिक (simultaniously)  न्यूनतम विचलन (minimum deviation) किंवा सार्वत्रिक (universal) संयोजन  के तुल्य है, जिसे प्रयुक्त किया है जो कि सर्वथा आधुनिकविज्ञान के लिये  नये प्रकार का संयोजन विधान है।&lt;br /&gt;(३) सूर्य प्रकाश के लगभग पूरे दृश्य परास (visible rang) में प्रसरित A से  K तक की फ्राँउनहॉफर रेखाओं (Fraunhoffer lines) के तरंग दैर्ध्य एवं संगत  'कक्षा' इकाई में प्रदत्त 'संकेत संख्या' भली तरह से मेल खाती है।&lt;br /&gt;(४) संकतों' (symbols) की क्रमवार सूची, नक्षत्रों के आधुनिक 'वार्णिक  वर्गीकरण' (spectroscopic classification) के समानान्तर ही परिलक्षित होती  है।&lt;br /&gt;इस अध्ययन क्रम से न केवल प्राचीन काल में 'वर्णक्रम मापन विज्ञान'  (spectyroscopy) के अस्तित्व का ज्ञान होता है अपितु आधुनिक विज्ञान के  ज्ञान की अभिवृद्धि में निमांकित बिन्दुओं पर योगदान प्राप्त हो सकता है।&lt;br /&gt;आधुनिक भौतिकी में योगदान -&lt;br /&gt;i. शंक्वाकार मणि (conical prism) से सभी तरंग दैर्ध्य की रश्मियों (rays  of all wave lengths) को एक साथ न्यूनतम विचलन (minimum deviation) की  स्थिति में समंजित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;ii. प्राचीन आँकड़ों के पुनरुत्पादित करने हेतु गणित के द्वारा विचलन एवं  तरंग दैर्ध्य के मध्य एक सरल सूत्र प्राप्त हुवा है जिससे सीधे ही ज्ञात  विचलन के आधार पर तरंग दैर्ध्य की गणना की जा सकती है।&lt;br /&gt;iii. अवरक्त किरणों (Infrared rays) के लिये एक पारदर्शी विशिष्ट कांच  "प्रकाश स्तंभनाभिद लौह" की खोज हुयी है जो कि पूर्णरूप से आद्रता से  अप्रभावी है। आधुनिक विज्ञान में अभी तक ज्ञात नहीं है। यह कांच ईस्वी सन्  १९९८ में राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला, जमशेदपुर में निर्मित की जा चुकी  है।&lt;br /&gt;वर्णक्र्रम मापक /'ध्वान्त प्रमापक यंत्र' (Spectrometer) 2&lt;br /&gt;प्राच्य संस्थान, बडोदरा (Oriental Institute, Vadodara) के पुस्तकालय से  बोधानन्द की टीका के साथ 'अंशुबोधिनी' शीर्षक की महर्षि भरद्वाज रचित एक  पांडुलिपि प्राप्त हुयी है। वास्तव में प्राप्त पांडुलिपि भरद्वाज के १२  अध्याय वाले ग्रंथ में से केवल पहला अध्याय है। जिसका शीर्षक  "सृष्ट्याधिकार" (Evolution of Universe) है जिसमें महाविस्फोट (Big-bang)  से अपने सौर मंडल के सूर्य की उत्पत्ति तक का वर्णन किया गया है, जिसमें  उपर्युक्त यंत्र जो कि संभवत: उस समय प्रचलित पाँच प्रकार के वर्णक्रम मापक  यंत्रों में से एक है जिसे "तम" व्यापक अर्थ में (radiation) के तीन  प्रकाशकीय परास (Optical region) अर्थात् अंधतम/पराबैंगनी, गूढ़तम/दृश्य एवं  तम (ultraviolet, visible and infrared regions) के मापन में प्रयुक्त  होता रहा है।&lt;br /&gt;चितिचैत्यस्पन्दनेन सृष्टयाद्यतेकमेवहि।&lt;br /&gt;तम: प्रादुरभूद्वेगात्तम स्पृष्टवैवकेवलम्।।&lt;br /&gt;तमेवमूलप्रकृतिरित्यार्हुज्ञानवित्तमा:।&lt;br /&gt;तम आसीदितिप्राहतमेवहिसनातनी।।&lt;br /&gt;पश्चात्तस्मिन्चितप्रकाशस्स्वभावात्प्रतिबिंबित  :।&lt;br /&gt;तत्सानिध्यबलातन्मूलप्रकृत्यामतिवेगत:।।&lt;br /&gt;अन्धंतमोगूढंतमस्तमश्चेतियथाक्रमम्।&lt;br /&gt;तमांसित्रीण्यजायन्तचित्प्रभामिश्रितानिहि।।&lt;br /&gt;त्रिगुणाइतितान्येवप्रवदन्तिमनीषिण:।&lt;br /&gt;सत्वंरजस्तमइतिगुणा: प्रकृतिसंभव:।।&lt;br /&gt;पृष्ठ ८५, अंशुबोधिनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् तम/विकीरण (radiation) के लिये ध्वान्त कारण (instrumental reason)  है। व्यापक अर्थ में तम आवरण (संभवत: positron) 'कंचुक-आवरण' (electron)  की चित् (दनबसमंत बवतम) की उपस्थिति के कारण अत्यंत वेग (force) से भ्रमण  करने लगती है, जिससे तीन प्रकार के 'तम व कंचुक-आवरण के मिश्रण से त्रिगुण  (तम, सत्त्व, रज) उत्त्पन्न होते हैं। जिन्हें हम क्रमश: अंधतम, गूढ़तम एवं  तम (Ultraviolet, Visible, infrared) कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेषुशारिकनाथोक्तध्वान्तविज्ञानभास्करे।&lt;br /&gt;तमप्रमापकविधौसन्ति शास्त्राणिपंचधा।।&lt;br /&gt;तदेवात्रसमासेनयथाशास्त्रंनिरूप्यते।&lt;br /&gt;तमप्रमापकविधिर्यथोक्तंस्वानुभूतित:।।&lt;br /&gt;ध्वान्तप्रमापकंयन्त्रंनवोत्तरशतात्मकम्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शारिकानाथ: -&lt;br /&gt;उक्तंहियन्त्रसर्वस्वेभरद्वाजेनधीमता।&lt;br /&gt;द्वात्रिंशदंगसंयुक्तंतमोभेदप्रदर्शकम्।।&lt;br /&gt;तस्मादत्रसमासेन तदंगंप्रविविच्यते।&lt;br /&gt;तस्यत्रयोदशांगेनप्रमातुंतमसोभवेत्।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शारिकनाथ के "ध्वान्त विज्ञान भास्कर" नामक ग्रन्थ में उल्लेख है कि  भरद्वाज के ग्रंथ "यंत्र सर्वस्य" में १०९ वे यंत्र के रूप में "ध्वान्त  प्रमापक यंत्र", जो कि ३२ यंत्रांगो (ancillary components) से बना है,  व्यापक रूप से 'ध्वांत' का विवेचन करने में समर्थ है। तथापि शारिकनाथ के  अनुसार 'तम' (radiation) विवेचन के लिये १३ यंत्रांग ही पर्याप्त हैं, अत:  हम उन्हीं पर विचार करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्वान्त प्रमापक यंत्र (spectrometer) के तेरह यंत्रांगों के विवरण:&lt;br /&gt;यंत्रांग १ एवं २&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रस्थद्वादशांगस्यपूर्वभागेस्थितेक्रमात्।&lt;br /&gt;चतुस्श्रेयथाशास्त्रंवर्तुलंभारवर्जितम्।&lt;br /&gt;वितसस्तिदशकायामंसुदृढंचसुसूक्ष्मकम्।।&lt;br /&gt;छायापकर्षणादर्शषडुत्तरशतात्मकम्।&lt;br /&gt;शास्त्रोक्तविधिनासम्यक्स्थापयेत्सुदृढंत्तथा।।&lt;br /&gt;पश्चाच्छायापकर्षणदर्पणे शास्त्र:क्रमात् -&lt;br /&gt;शंकुस्थानाद्दक्षवामपार्श्वयोरुभयोरपि।&lt;br /&gt;त्रिंशत्त्रिंशल्लिखेद्रेखादर्पणान्तावधिक्रमात्।।&lt;br /&gt;अह:प्रमाणघटिकान्दक्षरेखास्तयो:क्रमात्।&lt;br /&gt;रात्रिप्रमाणघटिकान्वामरेखस्तस्थैवहि।।&lt;br /&gt;प्रदर्शयन्तिसंख्यात:तथाविघटिकान्क्रमात्।&lt;br /&gt;तेषुदर्शयितुंरेखाश्चतुष्षष्ठिर्विलेखयेत्।।&lt;br /&gt;सर्वत्र रेखान्त्यभागेबिन्दुनेकसमन्वितान्।&lt;br /&gt;स्फुटंविलेखयेत्तद्वत्तदन्तस्सूक्ष्मतस्तथा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वप्रथम प्रथम यंत्राग के रूप में उपयुक्त दृढता के १२० x १२० अंगुल के  चतुश्रेय/वर्गाकार आधार पर अन्य बचे हुये १२ यंत्रागों में से दूसरे  यंत्रांग के रूप में दर्पण योग्य (छायापकर्षणादर्श) कांचों में क्रमांक १०६  वाले पतले काँच का १२० अंगुल व्यास का चक्र दृढ़ता के साथ जमाया जाय।  तदनंतर मेरुस्तंभ (शंकु) के अगल-बगल अर्थात् छायापकर्षणादर्श चक्र के  क्रमश: दाँये-बाँये घटियंत्र की तरह रेखायें खींचकर दिन व रात के  प्रविभागों के अंत में बिन्दु आदि से चिह्नित किया जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग ३ (Ancillary Component ३)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चतुरंगुलमायामषड्वितस्त्युन्नतंतथा।&lt;br /&gt;इतरांगैस्समाहृतविद्युत्तत्र्यादिभिर्युतम्।।&lt;br /&gt;स्वमध्यादन्तपर्यन्तंवितस्तैकान्तरंयथा।&lt;br /&gt;रंध्रात्रयेणसंयुक्तंशिलाकाचविनिर्मितम्।।&lt;br /&gt;मेरुस्तंभाख्यशंकुंतन्मध्येसंस्थापयेद्दृढम्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके पश्चात् शिला-कांच (stony glass) से निर्मित ४ अंगुल व्यास एवं ७२  अंगुल आयाम (ऊँचाई) का शंकु, जिस पर केन्द्र व केन्द्र से प्रारंभ होकर  अंतिम छोर तक १२ -१२ अंगुल (वितस्ति) की दूरी पर तीन रंध्र (छिद्र) एवम्  अन्य यंत्रांगों से जोड़ने वाले 'विद्युत तंत्र' (electrical wiring) से  युक्त हो, जिसे 'मेरुस्तम्भ' (principal pillar) भी कहते हैं, को आधार के  मध्य में सुदृढ़ता से स्थिर किया जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग ४, ५ और ६ (Ancillary Component ४, ५ and ६)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दृढंदशांगुलायामंक्रमात्यष्ट्यंगुलोन्नतम्।&lt;br /&gt;पश्चातृतीयरंध्रस्यपार्श्वयोरुभयोरपि।।&lt;br /&gt;तथाद्वितीयरंध्रस्यपार्श्वयोरुभयोरपि।&lt;br /&gt;शास्त्रोक्तविधिनादंडमेकंसंधारयेद्दृढम्।।&lt;br /&gt;दण्डंसंधारयेतद्वत्सुदृढंकाचनिर्मितम्।&lt;br /&gt;क्रमादष्टाङ्गुलायामंपंचाशदंगुलोन्नतम्।।&lt;br /&gt;चत्वारिंशत्यंगुलोन्नतमायामेषडंगुलम्।&lt;br /&gt;एवंप्रथमरंध्रस्यपार्श्वयोरुभयोरपि।।&lt;br /&gt;दंडप्रमाणमुभयोस्समानमपिपार्श्वयो:।&lt;br /&gt;दंडंसंयोजयेत्पूर्ववद्दृढंकाचनिर्मितम्।।&lt;br /&gt;तथासंधारयेत्तेषुदंडानित्रीण्ययथाक्रमम्।&lt;br /&gt;किंचिदूर्ध्वभवेद्दक्षेवामेथस्थात्स्थितिर्यथा।  ।&lt;br /&gt;दंडानांमूलदेशेसंधारयेत्पार्श्वयो: क्रमात्।&lt;br /&gt;पूर्वोक्ततंत्रिभिर्युक्तचक्रकीलान्यथाविधि।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तत्पश्चात् 'तृतीय रंध्र' के दोनों ओर, मेरुस्तंभ से १०-१० अंगुल की दूरी  पर कांच से निर्मित ६० अंगुल लंबाई के स्तंभ, यंत्रांग-४ के रूप में तथा  द्वितीय रंध्र के दोनों ओर भी मेरुस्तम्भ से ८-८ अंगुल की दूरी पर ५० अंगुल  के स्तंभ यंत्रांग-५ के रूप में स्थिर किये जाँय।&lt;br /&gt;यद्यपि दोनों ओर के स्तम्भऱ्युगलों की लम्बाईयाँ बराबर हैं परन्तु दाहिनी  ओर के स्तम्भ की ऊँचाई उसके संगत बायीं ओर के स्तम्भ से कुछ अधिक होगी। यह  स्थिति सभी स्तम्भ युगलों की होगी। मेरु स्तम्भ के अगल-बगल के दंडों पर भी  विद्युत तंत्र्य (electrical wiring) तथा स्तंभ के छोर एवं आधार पर चरखी व  डोरी (rope and axel) का संयोजन होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग ७ (Ancillary cemponent-७)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंचाशदंगुलायामंविस्तीर्णतावदेवहि।&lt;br /&gt;त्रिंशद्रेखांचितंपश्चादनुलोमविलोमत:।।&lt;br /&gt;स्वरूपेभानुवद्भासमानंस्वकिरणैस्स्वत:।&lt;br /&gt;प्रभाकरमणिं शुद्धमष्ठाशीत्यात्मकंलघु।।&lt;br /&gt;धारयन्तंमध्यभागे आतपोष्णादिभिर्युतम्।&lt;br /&gt;प्रभाकरादर्शचक्रंसूर्यप्रतिनिधिंदृढ़म्।।&lt;br /&gt;मेरोस्तृतीयरंध्रस्थदण्डान्त्यकेन्द्रके।&lt;br /&gt;त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेद्भ्राम्यतेयथा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तदुपरान्त ३०-३० रेखाओं से दोनों ओर चिह्नित, ५० अंगुल व्यास के  प्रभाकर/दिवाकर चक्र (circular glass plate) जिसपर मणि संख्या ८० वाला  सूर्य जैसा चटक "प्रभाकर मणि" (probably a collimating lens) जड़ दिया गया  हो, तृतीय रन्ध्र पर इस प्रकार स्थापित करें जिससे दाहिने स्तंभ पर लगी ३  घिर्री-डोरी के संयोजन के द्वारा घुमाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग ८ (Ancillary component ८)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चाद्दिवाकरादर्शवद्रेखाबिन्दुभिर्युतम्।&lt;br /&gt;सुधाद्रवशशोषादिद्रावकेश्चसुसंस्कृतम्।।&lt;br /&gt;एतत्संस्कारतश्श्वेताभ्रवद्भास्वरमद्भुतम्।&lt;br /&gt;आकारेणांशुभिश्चैवचन्द्रमण्डलवत्स्थितम्।।&lt;br /&gt;भ्राजमानसप्तपंचाशदुत्तरशतात्मकम्।&lt;br /&gt;किरणग्राहकमणिदधानमध्यकेन्द्रके।।&lt;br /&gt;पंचचत्वारिंशदंगुलायामंवर्तुलंतथा।&lt;br /&gt;षोडशोतरद्विशतसंख्याकसुद्ढंलघु।।&lt;br /&gt;निशाकरादर्शचक्रचन्द्रपतिनिधिक्रमात्।&lt;br /&gt;पूर्ववत्तृतीयरंध्रवामदण्डान्त्यकेन्द्रके।।&lt;br /&gt;संधारयेत्कीलकाद्यैस्स्वतस्संचाल्यतेयथा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुन: दिवाकर दर्शन के समान चिह्नित एवं (भवत:) सुधाद्रव (CaOH२) तथा  शशोशादि द्रावक (phosphoric acids) के द्वारा वासित शुभ्र, २०६ क्रमांक का  २४ अंगुल व्यास का निशाकर दर्शचक्र, किरण-ग्राहक-मणि से युक्त मेरुस्तंभ के  ऊपर तीसरे रंध्र पर इस प्रकार स्थापित करें जिससे बाँई ओर के स्तम्भ पर  स्थित चरखी-डोर के संयोजन के द्वारा घुमाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग ९ (Ancillary component ९)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उष्णापकर्षकंनामलोहंस्यात्कृत्कंतत:।&lt;br /&gt;तेनप्रकल्पिह्यतंभानुफलकंमधुवर्णकम्।।&lt;br /&gt;निशाकरादर्शचक्रादपिन्यूनषडंगुलम्।&lt;br /&gt;बिन्दुरेखांकनैर्युक्तं अवटद्वयसंयुतम्।।&lt;br /&gt;प्रथमावटमध्यस्थपारदेसन्निवेशितम्।&lt;br /&gt;चतुषष्ट्युत्तरशतसंख्याकंभारवर्जितम्।।&lt;br /&gt;घर्मपहारकमणिंबिन्दुरेखांकनैर्युतम्।&lt;br /&gt;दधानंसुदृढ़सूक्ष्ममेरोरूर्ध्वंयथाविधि।।&lt;br /&gt;क्रमाद्द्वितीयरंध्रस्थदक्षदंडान्त्यकेन्द्रके।&lt;br /&gt;त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेद्भ्राम्यतेयथा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तत्पश्चात् 'ऊष्मापकर्षक लौह' से बना मधुवर्ण का निशाकरदर्श चक्र से ६  अंगुल कम व्यास का, रेखाओं, बिन्दुओं व संकेतों से चिह्नित 'भानुफलक',  जिसके मध्य व किनारे दो अवट (Cavity) हों तथा जिसमें से प्रथम पारद से  पूरित अवट में १६४ क्रमांक का 'घर्मापहारक मणि' (infrared sensitive glass)  निमज्जित हो, द्वितीय रंध्र पर स्थापित करें जिससे कि मेरुस्तंभ की दाँई  ओर के स्तम्भ पर लगी चरखी-डोर के समंजन से इसे स्वतंत्रतापूर्वक घुमा सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग १० (Ancillary component १०)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चाच्चतुर्दशोत्तरद्विशतेनयथाविधि।&lt;br /&gt;तमोगर्भाख्यमणिनायोजितंभारवर्जितम्।।&lt;br /&gt;त्रिसप्तत्युत्तरशतात्मकंधूम्राकृतिंतत:।&lt;br /&gt;छायामुखादर्शचक्रबिन्दुरेखांकनैर्युतम्।।&lt;br /&gt;मेरोर्द्वितीयरंध्रस्थवामदण्डान्त्यकेन्द्रके।&lt;br /&gt;निशाकरादर्शस्याधस्थात्स्थापयेदृढ़म्।।&lt;br /&gt;एतत्सूर्यप्रकाशस्थतमछायाप्रकर्षणम्।&lt;br /&gt;कृत्वाविनिश्चीयतेतत्प्रमाणंचांकनादिभि:।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके पश्चात् बिन्दु, रेखा आदि से अंकित, १७३ क्रमांक वाले धूम के रंग के  काँच का 'छाया मुखदर्शचक्र जो कि २१४ क्रमांक वाले "तमोगर्भ मणि" (a lens  suitable to ultraviolate radiation) से विधिपूर्वक सज्जित, द्वितीय रंध्र  के नीचे इस प्रकार नियोजित करें जिससे मेरु स्तंभ के बाँई ओर के दण्ड पर  चरखी-डोर की सहायता से घुमाया जा सके। यह सूर्य प्रकाश में स्थित तमछाया  (ultraviolet radiation) को आवर्तित (अपकर्षण) कर अंकन आदि (graduations)  से उनका परिमाण निर्धारित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग ११ (Ancillary component ११)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चाद्द्विचत्वारिंशतिकप्रभामणिनायुतम्।&lt;br /&gt;भागर्भादर्शवर्गस्थंषण्णवत्यात्मकंतत:।।&lt;br /&gt;स्वच्छंप्रभामुखादर्शबिंदुर्रेखांकनैर्युतम्।&lt;br /&gt;मेरुस्तंभप्रथमरंध्रदक्षदण्डान्त्यकेन्द्रके।।&lt;br /&gt;त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेद्भ्राम्यतेयथा।&lt;br /&gt;किरणोष्णप्रकाशांशंसूर्यस्येतत्स्वभावत:।।&lt;br /&gt;पूर्वोक्तभानुफलकात्समाकृष्यस्वशक्तित:।&lt;br /&gt;निश्चीयतेतत्प्रकाशप्रमाणस्वांकनादिभि:।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुन: अंशांकित ९६ क्रमांक के कांच से निर्मित "भानुगर्भदर्शचक्र" जो कि ४२  क्रमांक वाले "प्रभाकर मणि" से युक्त हो प्रथम रंध्र के ऊपर मेरुस्तंभ से  दाहिनी ओर के दंड पर अवास्थित तीन चरखी-अक्ष पर ठीक से संयोजन करें, जिससे  ठीक तरह से घुमाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग १२ (Ancillary component १२)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एतद्भवेत्कृतकलोह:प्रकाशस्तंभनाभिद:।&lt;br /&gt;तेनप्रकल्पितंचक्रंबिन्दुरेखांकनैर्युतम्।।&lt;br /&gt;नवसंख्याकमणिनावल्लभाख्येनराजितम्।&lt;br /&gt;प्रकाशस्तंभनाचक्रंपंचाशीत्यात्मकंलघु।।&lt;br /&gt;मेरुस्तंभप्रथमकेन्द्रवामदण्डान्त्यकेन्द्रके।&lt;br /&gt;त्रिचक्रकीलकैस्सम्यक्स्थापयेत्सुदृढ़ंयथा।।&lt;br /&gt;भागर्भदर्पणस्थितकिरणोष्णप्रकाशकम्।&lt;br /&gt;एतत्स्वशक्त्याबध्नात्यस्पंदनंस्याद्यथाक्रमम्।  ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पूर्व में उल्लिखित विधि से बनाये गये क्रमांक ९६ वाले) "प्रकाश  स्तंभनाभिद लौह" नामक विशिष्ट काँच से निर्मित तथा बिन्दु, रेखा आदि से  अंकित "प्रकाशस्तंभनचक्र", जिसपर ९ क्रमांक वाला "वल्लभ मणि" बैठाया गया  हो, प्रथम रंध्र के नीचे मेरुस्तंभ के बाँयी ओर के दण्ड पर तीन चरखी-अक्ष  संयोजन को ठीक तरह से सुदृढ़ता पूर्वक स्थापित किया जाय, जिससे 'भागर्भ  दर्पण' के गुणों के कारण प्रकाश में स्थित किरणों का मापन हो सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रांग १३ (Ancillary component १३)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छायाप्रभाविभाजकलौहस्यात्कृतकस्तत:।&lt;br /&gt;तेनप्रकल्पितंछायाप्रभाविभाजकपट्टिकाम्।।&lt;br /&gt;यावत्प्रमाणंचक्राणांषण्णामुभयपार्श्वयो:।&lt;br /&gt;तावत्प्रमाणंसंक्लृप्तांपट्टिकांभारवर्जिताम्।।&lt;br /&gt;मेरूस्तंभप्रथमरंध्राधोभागेयथाविधि।&lt;br /&gt;पार्श्वद्वयस्थचक्राणांसंधिस्थानंन्यसेत्तत:।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तत्पश्चात् "छाया-प्रभा विभाजक लौह" (ultraviolet-visible differentiating  glass) से निर्मित "छाया-प्रभा विभाजक पट्टिका", जो कृति में दो गोलाकार  फलकों के अगल-बगल आपस में जुड़ने से प्राप्त होती है, इस प्रकार की हो ताकि  मेरुस्तंभ के दोनों ओर के सभी चक्रों के क्षैतिज तल में उर्ध्वाधर  प्रक्षेप को समेटने योग्य हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्र संख्या १७&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि भरद्वाज का नवीनता से परिपूर्ण "ध्वान्त-प्रमापकऱ्यंत्र" (A Novel  Spectrometer Monochromator) का रेखा-चित्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अंशुबोधिनी" के उपलब्ध पाठ में उपर्युक्त यंत्र के वर्णन को दृष्टिगत रखते  हुए, इस लेख के लेखक के द्वारा संभावित रेखाचित्र अभिकल्पित किया है, जो  कि अंशुबोधिनी के पाठ के अनुसार उस समय ज्ञात पाँच प्रकार के यंत्रों में  से एक है, चित्र संख्या-१७ में दर्शाया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-2264839213052453296?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2264839213052453296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2264839213052453296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_06.html' title='प्राचीन भारत में वर्ण-मापन-विज्ञान (स्पेक्ट्रोस्कोपी) - १'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-9161718270961596972</id><published>2010-06-05T11:43:00.009+05:30</published><updated>2010-08-21T18:45:20.220+05:30</updated><title type='text'>लेख-सूची</title><content type='html'>&lt;ul class="posts"&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post.html"&gt;परिचय&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_01.html"&gt;भारत   : अतीत एवं वर्तमान&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_1673.html"&gt;क्यों   आत्मविस्मृत  हुए  हम?&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5775.html"&gt;पश्चिम  की विज्ञान-दृष्टि और अंधश्रद्धा&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7393.html"&gt;पश्चिम   का विज्ञान : एक अस्पष्ट से दूसरे अस्पष्ट तक...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html"&gt;&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विज्ञान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जन्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पश्चिम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; ?&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7954.html"&gt;भारत   ने ही सोचा - मनुष्य जन्म ही क्यों?&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_2664.html"&gt;भारत   की श्रेष्ठतम देन है - एकात्म विज्ञान दृष्टि&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul class="posts"&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9123.html"&gt;भारत   में तर्क व प्रयोगों के प्रति दृष्टि&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_6612.html"&gt;विज्ञान  : पश्चिम  व भारतीय धारणा&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5884.html"&gt;कितना   वैज्ञानिक  है डार्विन का विकासवाद?&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_6037.html"&gt;रसायन   शास्त्र : धातु, आसव, तत्व - सब भारतीय सत्य&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3755.html"&gt;धातु   विज्ञान का चमत्कार&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul class="posts"&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_8173.html"&gt;प्राचीन    भारत  में  रसायन  की परंपरा - १&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5846.html"&gt;प्राचीन    भारत  में  रसायन  की परम्परा-२ : आश्चर्यचकित  ...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5628.html"&gt;प्राचीन    भारत  में  रसायन  की परम्परा -  ३ :  हमारे  प्रा...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_03.html"&gt;अगस्त्य    संहिता  का विद्युत्‌  शास्त्र&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_8995.html"&gt;मैकेनिक्स    (कायनेटिक्स)  एवं  यंत्र  विज्ञान&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_8111.html"&gt;विमान   शास्त्र का भारतीय इतिहास-१&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7377.html"&gt;विमानशास्त्र    का  भारतीय  इतिहास-२&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3974.html"&gt;नौका   शास्त्र&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7961.html"&gt;वस्त्र उद्योग&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/07/blog-post.html"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;गणित शास्त्र - १ : &lt;/a&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/07/blog-post.html"&gt;भारत  की विश्व को देन&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_498.html"&gt;गणित   शास्त्र-२ : जब विश्व १०,००० जानता था, तब भारत...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7047.html"&gt;गणित   शास्त्र-३ : पाइथागोरस  से पहले आर्यभट्ट,  न्यूट...&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;h3 style="font-weight: normal;" class="post-title entry-title"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html"&gt;वैदिक गणित के सोलह सूत्र एवं उपसूत्र&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h3&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul class="posts"&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9549.html"&gt;कालगणना-१   : काल का खगोल से सम्बंध&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5629.html"&gt;कालगणना-२   : पश्चिमी और भारतीय कालगणना का अंतर&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5312.html"&gt;कालगणना-३   : आदि से अंत तक जानने की अनूठी भारतीय वि...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_1859.html"&gt;संवत्सर  की  वैज्ञानिकता&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul class="posts"&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_226.html"&gt;खगोल   विज्ञान-१ : न्यूटन से पहले भास्कराचार्य  ने बत...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7859.html"&gt;खगोल   विज्ञान-२ : आर्यभट्ट ने खंगाला खगोल&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3314.html"&gt;स्थापत्य    शास्त्र-१ : नगर रचना के श्रेष्ठतम उदाहरण&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3608.html"&gt;स्थापत्य    शास्त्र-२ : अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराह...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9397.html"&gt;वृक्ष   आयुर्वेद से मिला ज्ञान&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9898.html"&gt;वनस्पति   विज्ञान-२  : भारत ने ही बताया- पौधों में ज...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5230.html"&gt;कृषि   में हमेशा ही अग्रणी रहा है भारत&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5106.html"&gt;प्राणि   विज्ञान का गूढ़ ज्ञान&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3095.html"&gt;स्वास्थ्य    विज्ञान  -१  त्रिदोष का महत्व&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3075.html"&gt;स्वास्थ्य    विज्ञान  -२ :  सर्जरी  के सर्जक हम ही हैं!&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5586.html"&gt;ध्वनि   तथा वाणी विज्ञान : सात सुरों का भारतीय संसार...&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9341.html"&gt;ध्वनि   शास्त्र पर आधारित भारतीय लिपि&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_06.html"&gt;&lt;span&gt;प्राचीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्णक्रम&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;मापन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;विज्ञान&lt;/span&gt; - &lt;span&gt;१&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9996.html"&gt;&lt;span&gt;प्राचीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्णक्रम&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;मापन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;विज्ञान&lt;/span&gt; - २&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-9161718270961596972?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/9161718270961596972'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/9161718270961596972'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_04.html' title='लेख-सूची'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-8467412641937122194</id><published>2010-06-03T15:16:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:17:33.401+05:30</updated><title type='text'>भारत की श्रेष्ठतम देन है - एकात्म विज्ञान दृष्टि</title><content type='html'>&lt;div id=":18" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt; &lt;span&gt;&lt;br /&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt; महर्षि कपिल ने कहा कि सृष्टि पूर्व की जो अवस्था है उसमें जब प्रकृति  अव्यक्तावस्था में रहती है, तब सभी गुण साम्यावस्था में रहते हैं। यह  साम्यावस्था टूटती है मूल तत्व के संकल्प से, जिसका वर्णन उपनिषदों ने  किया- एकोऽहं बहुस्याम - यह संकल्प ही इच्छाशक्ति है। इससे गुणों की  साम्यावस्था भंग होती है तथा उस अव्यक्त प्रकृति में क्षोभ उत्पन्न होता है  तथा इसी के साथ सृष्टि व्यक्त होने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। उसका  प्रथम विकास महत्‌ अथवा विराट्‌ बुद्धि शक्ति के रूप में होता है, यही  ज्ञान शक्ति है। एक मूलभूत ज्ञान शक्ति सूक्ष्म परमाणु से लेकर संपूर्ण  व्रह्माण्ड तक का नियमन कर रही है, इसकी पुष्टि निम्न तथ्यों से प्रतीत  होती है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) विराट्‌ रचनाओं में आकाश गंगा की रचना सर्पिल भुजाओं  (च्द्रत्द्धठ्ठथ्‌ द्मन्र्थ्र्थ्र्ड्ढद्यद्धन्र् दृढ ठ्ठ ढ़ठ्ठथ्ठ्ठन्न्र्‌)  जैसी है। दूसरी ओर सूक्ष्मतम गुणवाहक (क्रड्ढदड्ढ) का भी सर्पिल द्विभुज  मॉडल (क़्दृद्वडथ्ड्ढ ण्ड्ढथ्त्न्‌ द्मन्र्द्मद्यड्ढथ्र्‌) है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) ‘क्ष्दढत्दत्द्यड्ढ त्द ठ्ठथ्थ्‌ क़्त्द्धड्ढड़द्यत्दृद‘ नामक  अपनी पुस्तक में फ्र्ीमैन डायसन कहते हैं, ‘एक अद्भुत साम्य आकार की दृष्टि  दुनिया में दिखाई देती है। इसे चार संदर्भों में देखें तो यह स्पष्ट हो  जाएगा। (१)सम्पूर्ण दृश्य विश्व (२) हमारी पृथ्वी (३) परमाणु का केन्द्रक  या दद्वड़थ्ड्ढद्वद्म (४) अधिसूत्र या च्द्वद्रड्ढद्ध च्द्यद्धत्दढ़। इसमें  हमारी पृथ्वी ज्ञात विश्व से १०२० गुना छोटी है। परमाणु केन्द्रक का आकार  पृथ्वी के अनुपात में १०२० गुना छोटा है तथा अधिसूत्र परमाणु केन्द्रक से  १०२० गुना छोटा है।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांख्य कहता है, महत्‌ से अहंकार उत्पन्न होता है, जिसके तीन रूप  हैं- वैकारी अहंकार तेजस्‌ अहंकार और भूताहि अहंकार। इनसे पंचतन्मात्रा तथा  उनसे विभिन्न इन्द्रियां तथा जगत्‌ के विभिन्न पदार्थ बनते हैं।  सृष्टिचक्र गतिमान होता है तथा प्रलय काल में पुन: इसी क्रम से उसका लोप हो  जाता है। यह विभिन्न शक्तियां, उनसे सृष्टि का चक्र गतिमान होना, फिर लोप  होना, यह क्या है, तो वेदान्त कहता है- ‘कम्पनात्‌‘ अर्थात्‌ निर्माण या  विध्वंस। सबमें कंपन है, स्पंदन है। भगवान बुद्ध कहते हैं सम्पूर्ण जगत  प्रकम्पन है- ‘सब्बोप्रज्जालितो लोको, सब्बो लोको प्रकम्पितो‘। जगत में ठोस  जैसा कुछ नहीं है, केवल प्रकम्पन ही है। आदि शंकराचार्य कहते हैं- परमाणु  से लेकर व्रह्मलोक तक तथा सामान्य शक्ति से लेकर प्राणशक्ति तक सब स्पन्दन  है। स्वामी विवेकानंद भी कहते थे, ‘संपूर्ण जगत कम्पन है, स्पन्दन है। इतना  ही है कि मन तीव्र कम्पन है तथा स्थूल या जिसे जड़ कहा जाता है, वह मंद  कम्पन है।‘ व्रह्माण्ड का सृजन और लोप कम्पन का ही परिणाम है। कम्पन समुद्र  की लहरों के समान है। जैसे समुद्र की सतह के ऊपर हलचल रहती है पर नीचे का  आधार शांत रहता है, उसी प्रकार जगत्‌ का मूलाधार व्रह्म है, कम्पन तो ऊपरी  सतह पर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार व्रह्माण्ड के विवेचन में उन्होंने जाना कि जगत्‌ एवं उस  जगत्‌ के द्रष्टा के तीन स्तर हैं। पहला स्थूल जगत है, जिसकी अनुभूति हम  जागृत अवस्था में करते हैं। दूसरा सूक्ष्म जगत है, जिसका अनुभव हम  स्वप्नावस्था में करते हैं। दोनों जगत्‌ की रचना भिन्न है, जागृत जगत्‌  भौतिक परमाणुओं का समुच्चय है तो स्वप्न जगत भावमय परमाणुओं का। दोनों में  काल का मापन भिन्न है, या कह सकते हैं कि सापेक्ष है। एक और तीसरा जगत है  जिसे कारण जगत्‌ कहा गया, जिसकी अनुभूति प्रगाढ़ निद्रा में होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार व्रह्माण्ड के विविध रूप, विविध शक्तियां तथा इनका  द्रष्टा, इन सबका समन्वय निम्न रूप में किया- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;तीन जगत्‌- (१) स्थूल (२) सूक्ष्म (३) कारण&lt;br /&gt;तीन अवस्थाएं- (१) जागृत (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन शक्तियां- (१) क्रिया (२) ज्ञान (३) इच्छा। ये सभी जिस मूल  आधार से उद्भूत हैं, उसे ही व्रह्म कहा गया। इसकी अनुभूति चतुर्थ  अवस्था-तुरीय अवस्था में होती है।&lt;br /&gt;विराट समुद्र की गहराई में निश्चल जल रहता है, पर उसके ऊपर छोटी-बड़ी  लहरें उठती हैं। इसी प्रकार सम्पूर्ण व्रह्माण्ड व्रह्म समुद्र में लहरों  के समान उठते और विलीन होते रहते हैं। इसी को व्रह्म कहा गया, अन्तिम सत्य  कहा गया तथा जिसके वर्णन की चेष्टा भिन्न-भिन्न रूपों में भारतीय वांगमय  में प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;(१) ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह‘&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(तै.उ. १२-४-१)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌-जहां से वाणी मन सहित लौटकर आ जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;(२) यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;येन यत्‌ प्रयन्त्यभिसंविशंन्ति तद्विजिज्ञासस्व च तद्व्रह्मेति।  (तै.उ.३-१-१) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌- जिससे सभी भूत उत्पन्न होते हैं, जिसमें रहते हैं तथा  जिसमें विलीन हो जाते हैं, उसे जानो। वही व्रह्म है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;(३) स यथा उर्णनाभि: तन्तुना उच्यरेत्‌ यथा अग्ने:&lt;br /&gt;क्षुद्रा: विस्फुलिंगा: व्युच्चरन्ति एवम्‌ एव अस्मात्‌&lt;br /&gt;आत्मन: सर्वे प्राणा: सर्वे लोका: सर्वे देवाऽ सर्वांणि&lt;br /&gt;भूतानि व्युच्चरन्ति तस्य उपनिषद्‌ सत्यस्य सत्यं&lt;br /&gt;इति प्राणा: वै सत्यं तेषां एष: सत्यम्‌।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(बृहदारण्यक उपनिषद्‌ २-१-२०)&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌- जिस प्रकार मकड़ी के अंदर से जाल निकलता है, जिस प्रकार  अग्नि में से छोटे-छोटे स्फुल्लिंग निकलते हैं, उसी प्रकार इस आत्मा से सभी  प्रकार की शक्तियां, सभी प्रकार के लोक, सभी प्रकार के देव तथा सम्पूर्ण  स्थूल जगत उत्पन्न होते हैं। उसको जानो, उसके निकट जाओ, वह सत्य का भी सत्य  है। मूलभूत ऊर्जा सत्य है, परन्तु वह इसका भी सत्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार भारतीय प्रज्ञा के मत में चेतना के अनंत समुद्र की  क्षणिक अभिव्यक्ति ही यह व्रह्मांड है। अनेक पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी इस  विषय में सोचा है। २५ जनवरी, १९३१ के ऑब्जर्वर में जे.डब्ल्यू. एन-सुलिवान  द्वारा मैक्सप्लांक से लिया गया साक्षात्कार छपा है। इसमें सुलिवान प्रश्न  पूछता है कि क्या चेतना की व्याख्या पदार्थ और उसके नियमों के तहत की जा  सकती है? उत्तर में मैक्सप्लांक ने कहा ‘मैं ऐसा नहीं सोचता। मेरी दृष्टि  में चेतना मौलिक है और पदार्थ उसका परिणाम है। पदार्थ चेतना का विस्तार  है।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वामी विवेकानंद ने इसे अलग तरह से अभिव्यक्त किया। वे कहते हैं  ‘ऐसा लगता है कि चेतना का प्रवाह अभ्यंतर से उत्सर्जित होकर भौतिक दुनिया  की ओर सतत प्रवाहित हो रहा है।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्पूर्ण जगत्‌ में निर्जीव व सजीव ऐसा कोई निरपेक्ष विभाजन नहीं  हो सकता, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में एकत्व है। इसे जगदीश चन्द्र बसु ने १०  मई, १९०१ को रॉयल इन्स्टीट्यूट में प्रयोगों के द्वारा विश्व के  वैज्ञानिकों के समक्ष सिद्ध किया। टीन के टुकड़े पर कॉस्टिक पोटाश की विष  उत्पन्नकारी खुराक देने पर उसकी विद्युत धड़कन बंद हुई, जैसे सजीव कोशिका  में होती है। साथ ही विष हरणवाली सुई लगाने पर धातु में पुन: सामान्य  प्रतिक्रिया आने लगी। इस प्रभाव के अनेक प्रदर्शन के बाद सजीव और निर्जीव  की थकावट के इतिहास के स्वत: प्राप्त रिकार्डों के प्रमाण प्रस्तुत कर बोस  ने अपना भाषण निम्नलिखित शब्दों में समाप्त किया-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘इस प्रकार के प्राकृतिक तथ्यों में क्या हम भौतिकीय प्रक्रिया और  शरीर पर होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया के बीच कोई सीमा रेखा खींच सकते है?  ऐसी कोई भी सीमा रेखा नहीं होती।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जब मैंने अपने आप बने रिकार्डों के मूक साक्ष्य को देखा और कण, जो  प्रकाश की लहरों में कंपित होता है, हमारी पृथ्वी का जीवन और प्रकाशवान  सूर्य, जो हमारे ऊपर चमक रहा है, उन सभी वस्तुओं में व्याप्त एकता का  अवलोकन किया, तभी मैं पहली बार उस संदेश को कुछ-कुछ समझ सका जिसकी घोषणा  मेरे पूर्वजों ने गंगा के सुरम्य तटों पर तीन हजार वर्ष पहले की थी, कि इस  विश्व के सभी परिवर्तनशील स्वरूपों में एक ही सत्य है, केवल एक-और कुछ  नहीं।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तिम सत्य जानने का साधन- एक बार अनिश्चितता सिद्धान्त के जनक  हीजेनबर्ग ने परमाणु के ग्रहीय मॉडल का प्रतिपादन करने वाले महान विज्ञानी  नील्स बोर से पूछा, यदि परमाणु की आन्तरिक बनावट इस प्रकार वर्णनातीत है  जैसा आप कह रहे हैं तथा इसे अभिव्यक्त करने के लिए हमारे पास कोई भाषा नहीं  है, तो इसे कभी समझ पाने की आशा हम कैसे करें? इस पर कुछ देर चुप रहकर कुछ  झिझक के साथ नील्स बोर बोले ‘इस सबके बाद भी हम समझ सकते हैं, पर हमें  समझने का अर्थ सीखना पड़ेगा।‘ बोर के इस कथन में गहराई है। यह समझना कैसे  होगा। इस सन्दर्भ में आइंस्टीन का एक वाक्य स्मरण आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने आइंस्टीन से पूछा कि जगत्‌ की अंतिम वास्तिवकता (रियालिटी)  को कैसे जानें, तो आइंस्टीन ने कहा, हम जिन उपकरणों (इन्द्रीय तथा बुद्धि  आदि) के द्वारा जगत्‌ को जानने का प्रयत्न करते हैं, वह इस जगत्‌ का ही  हिस्सा है।  वह भी देश (च्द्रठ्ठड़ड्ढ), काल (च्र्त्थ्र्ड्ढ) तथा निमित्त  (ड़ठ्ठद्वद्मड्ढद्म द्धड्ढथ्ठ्ठद्यत्दृद) की परिधि में हैं तथा सत्य इस  परिधि के परे है। अत: उन्होंने कहा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ख्द्वथ्र्द्र ठ्ठडदृध्ड्ढ न्र्दृद्वद्ध दृध्र्द थ्र्त्दड्ड‘  अर्थात्‌ अपने मन के परे छलांग लगाओ। पर यह छलांग कैसे लगानी है, यह पश्चिम  को ज्ञात नहीं। हमारे यहां की योग साधना तथा अन्यान्य साधना पद्धतियों में  देश, काल और निमित्त की परिधि के परे कालातीत अवस्था में पहुंचने की विधि  का भी प्रतिपादन किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्वेताश्वर उपनिषद्‌ में वर्णन आता है कि जगत क्या है? उसका कारण  क्या है? इसके विश्लेषण में किसी ने काल को कारण माना, किसी ने स्वभाव को,  किसी ने आकस्मिक संयोग को, किसी ने प्रकृति को, किसी ने भूत समुच्चय को,  किसी ने पुरुष को तो किसी ने इस सबके योग को। पर अंतिम सत्य न मिला, तब  क्या किया जाए। इसके उत्तर में उपनिषद्‌ कहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्‌&lt;br /&gt;देवात्मशक्तिं स्वगुणै र्निग्ढ़ाम्‌।&lt;br /&gt;य: कारणानि निखिलानि तानि&lt;br /&gt;कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येक।&lt;/b&gt; (श्वेताश्वर उपनिषद्‌ १-३) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ तब उन्होंने ध्यान योग का आश्रय ले, आन्तरिक गहराइयों में  उतरकर उस परम शक्ति का साक्षात्कार किया, जो काल सहित इस सम्पूर्ण जगत्‌  का कारण है। और जब यह साक्षात्कार होता है तब हम अनुभव करते हैं कि सब कुछ  ज्ञात-अज्ञात उस एक की ही अभिव्यक्ति है तथा सम्पूर्ण जगत्‌, उसकी  शक्तियां, पशु, पक्षी, कीट, पतंगे, वृक्ष, मानव सब उसी एक तत्व के विभिन्न  रूप हैं। इस अनुभूति में से एक एकात्मदृष्टि उत्पन्न होती है। यह एकात्म  विज्ञान दृष्टि भारत की श्रेष्ठतम देन है, जो जीव और निर्जीव के भेद को  समाप्त कर देती है तथा जगत्‌ और उसके सबसे बड़े रहस्य मानव की सभी समस्याओं  का समाधान करती है। इस एकात्म विज्ञान दृष्टि की देन दुनिया को भारत ही दे  सकता है। &lt;/span&gt; &lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-8467412641937122194?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/8467412641937122194'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/8467412641937122194'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_2664.html' title='भारत की श्रेष्ठतम देन है - एकात्म विज्ञान दृष्टि'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-4458118379729104622</id><published>2010-06-03T15:15:00.001+05:30</published><updated>2010-06-03T15:15:55.970+05:30</updated><title type='text'>भारत ने ही सोचा - मनुष्य जन्म ही क्यों?</title><content type='html'>&lt;div id=":1g" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt; &lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;   &lt;span&gt; आइंस्टीन ने अपने विशिष्ट सापेक्षता सिद्धांत में पदार्थ व ऊर्जा का एकीकरण  किया। उन्होंने कहा कि ऊर्जा की स्थूल अभिव्यक्ति पदार्थ है तथा अपने  प्रसिद्ध समीकरण कउथ्र्ड़२ द्वारा सिद्ध किया कि दोनों एक-दूसरे में  परिवर्तित हो सकते हैं। न्यूटन ने कहा था कि स्पेश (अन्तराल) चारों ओर एक  रस है और काल सरल रैखिक है। पर आइंस्टीन ने कहा, व्रह्माण्ड मात्र यंत्र  नहीं है। उसकी गतिविधियां यांत्रिक नहीं है अपितु व्रह्माण्ड लचीला है व  विभिन्न बनावट वाला है। जहां भी पदार्थ व गति है वहां दिक्‌ (स्पेस) वक्र  हो जाता है जैसे समुद्र में तैरती मछली अपने आस-पास के पानी को काटती है  उसी प्रकार एक तारा या पुच्छल तारा या ज्योतिर्माला उस दिक्‌ काल की बनावट  में से, जिसमें से वह गुजरता है, परिवर्तन ला देता है। दिक्‌ और काल  अलग-अलग नहीं हैं, क्योंकि एक बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। घटनाओं के  बिना काल का अस्तित्व नहीं और काल के बिना घटनाओं की जानकारी नहीं। इस  प्रकार आइंस्टीन ने पदार्थ, ऊर्जा, दिक्‌, काल इनका एकीकरण किया। इस प्रकार  पश्चिम की सम्पूर्ण विज्ञान यात्रा को हम संक्षेप में इस प्रकार रख सकते  हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्त स्थूल जगत तत्वों से, तत्व परमाणुओं से तथा परमाणु सूक्ष्म  कणों से बने हैं। परन्तु ये कण हैं भी या नहीं, यह जानना कठिन है। अत: ये  सब प्रवाह हैं और प्रवाह बल या ऊर्जा रूप है। यह ऊर्जा चार प्रकार की है,  इसमें तीन का एकीकरण समझ में आता है। इनका व्यवहार दिक्‌ (स्पेस) में है और  दिक्‌ (स्पेस) तथा काल (टाइम) अलग नहीं है। अत: सम्पूर्ण जगत्‌ दिक्‌-काल  के चतु: आयामी क्षेत्र से उद्भूत है। इस एकीकरण में गुरुत्वाकर्षण शक्ति का  एकीकरण संभव नहीं हुआ है। जिस दिन यह हो जाएगा, उस दिन शायद भौतिकी का अंत  हो जाएगा। पश्चिम के सैद्धान्तिक क्षेत्र की विज्ञान यात्रा यहां तक हुई  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न उठता है, कल यदि गुरुत्वाकर्षण शक्ति का भी एकीकरण हो गया  तो क्या इस विश्व की पहेली सुलझ जाएगी? क्या विश्व का अंतिम सत्य जान लिया  जाएगा? लगता है नहीं। क्योंकि तब कुछ मूलभूत अन्य प्रश्न उठेंगे। मानव का  मन क्या है? बुद्धि क्या है? भावना क्या है? जिसे फ्र्ी विल या स्वतंत्र  इच्छा कहते हैं, वह क्या है? इसका और स्थूल सृष्टि व उसमें होने वाली घटना  का सम्बंध क्या है? सर्वोपरि, जिसे चेतना कहा जाता है, क्या है? क्योंकि  अभी तक विज्ञान ने मन, चेतना, बुद्धि आदि को अपनी परिधि में नहीं लिया है  और विज्ञान, भौतिक विज्ञान तथा जैव विज्ञान ऐसे अलग खेमों में बंटा हुआ है।  एक नई प्रकार की जाति व्यवस्था मानो खड़ी हुई है और आज की त्रासदी के पीछे  यह खंडित दृष्टि बहुत बड़ा कारण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;भारत की विज्ञान यात्रा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां प्राचीन काल से व्रह्मांड क्या है और कैसे उत्पन्न हुआ,  क्यों उत्पन्न हुआ इत्यादि प्रश्नों का विचार हुआ। पर जितना इनका विचार हुआ  उससे अधिक ये प्रश्न जिसमें उठते हैं, उस मनुष्य का भी विचार हुआ। ज्ञान  प्राप्ति का प्रथम माध्यम इन्द्रियां हैं। इनके द्वारा मनुष्य देखकर, चखकर,  सूंघकर, स्पर्श कर तथा सुनकर ज्ञान प्राप्त करता है। बाह्य जगत के ये  माध्यम हैं। विभिन्न उपकरण इन इंद्रियों को जानने की शक्ति बढ़ाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण माध्यम अन्तर्ज्ञान माना गया, जिसमें  शरीर को प्रयोगशाला बना समस्त विचार, भावना, इच्छा इनमें स्पन्दन शांत होने  पर सत्य अपने को उद्घाटित करता है। अत: ज्ञान प्राप्ति के ये दोनों माध्यम  रहे तथा मूल सत्य के निकट अन्तर्ज्ञान की अनुभूति से उपर्युक्त प्रश्नों  का उत्तर खोजने का प्रयत्न हुआ। यद्यपि वेदों, व्राह्मणों, उपनिषदों,  महाभारत, भागवत आदि में ऊपर उठाए प्रश्नों का विवेचन मिलता है, परन्तु  व्रह्माण्ड का विश्लेषण परमाणु विज्ञान की दृष्टि से सर्वप्रथम एक शास्त्र  के रूप में सूत्रबद्ध ढंग से महर्षि कणाद ने आज से हजारों वर्ष पूर्व अपने  वैशेषिक दर्शन में प्रतिपादित किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ मामलों में महर्षि कणाद का प्रतिपादन आज के विज्ञान से भी आगे  जाता है। महर्षि कणाद कहते हैं, द्रव्य को छोटा करते जाएंगे तो एक स्थिति  ऐसी आएगी जहां से उसे और छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि उससे अधिक  छोटा करने का प्रत्यन किया तो उसके पुराने गुणों का लोप हो जाएगा। दूसरी  बात वे कहते हैं कि द्रव्य की दो स्थितियां हैं- एक आणविक और दूसरी महत्‌।  आणविक स्थिति सूक्ष्मतम है तथा महत्‌ यानी विशाल व्रह्माण्ड। दूसरे, द्रव्य  की स्थिति एक समान नहीं रहती है। अत: कणाद कहते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;‘धर्म विशेष प्रसुदात द्रव्य&lt;br /&gt;गुण कर्म सामान्य विशेष समवायनां&lt;br /&gt;पदार्थानां साधर्य वैधर्यभ्यां&lt;br /&gt;तत्वज्ञाना नि:श्रेयसम वै.द.-४&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ धर्म विशेष में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष तथा  समवाय के साधर्य और वैधर्म्य के ज्ञान द्वारा उत्पन्न ज्ञान से नि:श्रेयस  की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्रव्य क्या है? इसकी महर्षि कणाद की व्याख्या बहुत व्यापक एवं  आश्चर्यजनक है। वे कहते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालोदिगात्मा मन इति द्रव्याणि&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;वै.द.   १/५&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा जीवात्मा तथा मन-  ये द्रव्य हैं। यहां पृथ्वी, जल आदि से कोई हमारी पृथ्वी, जल आदि का अर्थ  लेते हैं। पर ध्यान रखें इस सम्पूर्ण व्रह्माण्ड में ये नौ द्रव्य कहे गए,  अत: स्थूल पृथ्वी से यहां अर्थ नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे कहते हैं, पृथ्वी यानी द्रव्य का ठोस (च्दृथ्त्ड्ड) रूप, जल  यानी द्रव्य (ख्त्द्र्दद्वत्ड्ड) रूप तथा वायु (क्रठ्ठद्म) रूप, यह तो  सामान्यत: दुनिया में पहले से ज्ञात था, पर महर्षि कणाद कहते हैं कि तेज भी  द्रव्य है। जबकि पदार्थ व ऊर्जा एक है यह ज्ञान २०वीं सदी में आया है।  इसके अतिरिक्त वे कहते हैं- आकाश भी द्रव्य है तथा आकाश परमाणु रहित है और  सारी गति आकाश के सहारे ही होती है, क्योंकि परमाणु के भ्रमण में हरेक के  बीच अवकाश या प्रभाव क्षेत्र रहता है। अत: हमारे यहां घटाकाश, महाकाश,  हृदयाकाश आदि शब्दों का प्रयोग होता है। महर्षि कणाद कहते हैं- दिक्‌  (च्द्रठ्ठड़ड्ढ) तथा काल (च्र्त्थ्र्ड्ढ) यह भी द्रव्य है, जबकि पश्चिम से  इसकी अवधारणा आइंस्टीन के सापेक्षतावाद के प्रतिपादन के बाद आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि कणाद के मत में मन तथा आत्मा भी द्रव्य हैं। इस अवधारणा को  मानने की मानसिकता आज के विज्ञान में भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रत्येक द्रव्य की स्थित आणविक है। वे गतिशील हैं तथा  परिमण्डलाकार उनकी स्थिति है। अत: उनका सूत्र है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘नित्यं परिमण्डलम्‌‘ वै.द. ७/२०&lt;br /&gt;परमाणु छोटे-बड़े रहते हैं, इस विषय में महर्षि कणाद कहते हैं-&lt;br /&gt;एतेन दीर्घत्वहृस्वत्वे व्याख्याते (वै.द.) ७-१-१७&lt;br /&gt;आकर्षण-विकर्षण से अणुओं में छोटापन और बड़ापन उत्पन्न होता है। इसी  प्रकार व्रह्मसूत्र में कहा गया-&lt;br /&gt;महद्‌ दीर्घवद्वा हृस्वपरिमण्डलाभ्याम्‌ (व्र.सूत्र २-२-११)&lt;br /&gt;अर्थात्‌ महद्‌ से हृस्व तथा दीर्घ परिमण्डल बनते हैं।&lt;br /&gt;परमाणु प्रभावित कैसे होते हैं तो महर्षि कणाद कहते हैं-&lt;br /&gt;विभवान्महानाकाशस्तथा च आत्मा (वै.द. ७-२२)&lt;br /&gt;अर्थात्‌ उच्च ऊर्जा, आकाश व आत्मा के प्रभाव से। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परमाणुओं से सृष्टि की प्रक्रिया कैसे होती है, तो महर्षि कणाद  कहते हैं कि पाकज क्रिया के द्वारा। इसे पीलुपाक क्रिया भी कहते हैं।  अर्थात्‌ अग्नि या ताप के द्वारा परमाणुओं का संयोजन होता है। दो परमाणु  मिलकर द्वयणुक बनते हैं। तीन द्वयणुक से एक त्रयणुक, चार त्रयणुक से एक  चतुर्णुक तथा इस प्रकार स्थूल पदार्थों की निर्मित होती है। वे कुछ समय  रहते हैं तथा बाद में पुन: उनका क्षरण होता है और मूल रूप में लौटते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि कणाद ने परमाणु को ही अंतिम तत्व माना। कहते हैं कि जीवन के  अंत में उनके शिष्यों ने उनकी अंतिम अवस्था में प्रार्थना की कि कम से कम  इस समय तो परमात्मा का नाम लें, तो कणाद ऋषि के मुख से निकला पीलव: पीलव:  पीलव: अर्थात्‌ परमाणु, परमाणु, परमाणु।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि कपिल थोड़ा और गहराई में गए तथा कपिल का सांख्य दर्शन जगत्‌  की अत्यंत वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। महर्षि कपिल ने कहा- जिसकी  भी कुछ आन्तरिक रचना है उनके भिन्न-भिन्न रूप हैं। अत: निश्चयात्मक रूप से  यह जगत्‌ मूल रूप से जिनसे बना है, उसके आकार के बारे में नहीं कह सकते।  इतना कह सकते हैं कि वे सूक्ष्म हैं तथा उनका एक विशेष प्रकार का गुण है।  अत: उन्होंने कहा- जगत्‌ त्रिगुणात्मक है और ये तीन गुण हैं सतोगुण, रजोगुण  तथा तमोगुण। महर्षि कपिल की व्याख्या आश्चर्यजनक है, वे कहते हैं कि ये  तीनों गुण हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) लध्वादिधर्म: साधर्म्यं वैधर्यं च गुणानाम्‌ (सांख्य  दर्शन-१-१२८)अर्थात्‌ सूक्ष्मता की दृष्टि से इनमें समानता है परन्तु  विशेषता या गुण की दृष्टि से इनमें भिन्नता है। गुण क्या हैं? वे कहते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रीत्यप्रीतिविषादाद्यैर्गुणा&lt;wbr&gt;नामन्योऽन्यं वैधर्म्यम्‌&lt;br /&gt;(सां.द.१-१२७)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्रीति (ॠद्यद्यद्धठ्ठड़द्यत्दृद), अप्रीति (ङड्ढद्रद्वथ्द्मत्दृद) तथा  विषाद (ग़्ड्ढद्वद्यद्धठ्ठथ्‌)- ये भिन्न-भिन्न विशेषता इन गुणों की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें भी जो गति होती है वह आकर्षण व विकर्षण के कारण ही होती है।  अत: सांख्य दर्शन कहता है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;‘रागविरागयोर्योग: सृष्टि:‘ (सां.द. २-९)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आकर्षण और विकर्षण का योग सृष्टि है। सम्पूर्ण सृष्टि आकर्षण और  विकर्षण का ही खेल है और यह सब जिस शक्ति द्वारा होता है उसे क्रिया शक्ति  कहा जाता है और समस्त भौतिक शक्तियों का इसमें एकीकरण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परन्तु यह सब जानने की जिसमें इच्छा है तथा जिसमें प्रश्न उठते हैं  वह मानव, उसका मन, उसके संशय ये सब क्या हैं और अंतिम एकीकरण कहां जाकर  होगा, इसका युक्तियुक्त विश्लेषण तथा अनुभव सांख्य के साथ वेदान्त ने किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-4458118379729104622?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4458118379729104622'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4458118379729104622'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7954.html' title='भारत ने ही सोचा - मनुष्य जन्म ही क्यों?'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-4357928180000297070</id><published>2010-06-03T15:14:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:15:01.703+05:30</updated><title type='text'>पश्चिम का विज्ञान : एक अस्पष्ट से दूसरे अस्पष्ट तक</title><content type='html'>&lt;div id=":1k" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;  &lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; विज्ञान का एक दूसरा रूप है जिसे प्योर साइंस कहा गया है। इसके अन्तर्गत  कुछ मूलभूत प्रश्नों के संदर्भ में विचार किया गया। व्रह्माण्ड क्या है?   इसका अंतिम सत्य क्या  है व्रह्माण्ड की विभिन्न इकाइयों का स्वरूप क्या है  तथा उनका आपसी सम्बंध क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त मूलभूत प्रश्नों पर पश्चिम और भारत-दोनों ही जगह विचार  किया गया, विश्लेषण किया गया, निष्कर्ष निकाले गए। परन्तु दोनों के मार्ग  भिन्न थे। जैसा स्वामी विवेकानंद ने कहा, ‘पश्चिमी विज्ञान बहिर्जगत्‌ के  व्यापक विश्लेषण और प्रयोग द्वारा इन प्रश्नों के उत्तर पाने की दिशा में  बढ़ा और भारत बहिर्जगत्‌ का सामान्य परन्तु अन्तर्जगत्‌ का विशेष रूप से  अवलोकन करते हुए आगे बढ़ा।‘ दोनों ने इस खोज यात्रा के निष्कर्ष निकाले, उस  आधार पर उनकी एक विश्व दृष्टि और जीवन दृष्टि बनी, जिसने सम्पूर्ण जगत के  विभिन्न पारस्परिक व्यवहारों को प्रभावित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत का वैज्ञानिक चिंतन की अंतिम कड़ियों में हम पश्चिम और भारत की  इस खोज यात्रा और उसके परिणामों का विश्लेषण करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पश्चिम की विज्ञान यात्रा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;(क) प्राचीन ग्रीक दार्शनिकों के अनुसार जगत पृथ्वी, जल, वायु और  अग्नि-इन चार तत्वों से बना है। कुछ दार्शनिकों ने यह माना कि जगत अणुमय  है। इन सभी का संसार के प्रति जैविक दृष्टिकोण था। यह धारणा सन्‌ १५०० तक  पश्चिम में प्रभावी रही परन्तु सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में पश्चिम में  विज्ञान के क्षेत्र में मूलभूत परिवर्तन हुए, जिन्होंने आज तक चली आ रही  धारणाओं को जड़-मूल से हिला दिया। इस परिवर्तन के सूत्रधार थे फ्र्ांसिस  बेकन, रेने देकार्ते, गैलीलियो एवं न्यूटन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ख) जगत के ज्ञान की प्राप्ति हेतु फ्र्ांसिस बेकन ने गणितीय  पद्धति का प्रतिपादन किया। उसके अनुसार पहले प्रयोग करना फिर सामान्य  निष्कर्ष निकालना तथा पुन: प्रयोग से जांचना, इससे जो ठीक निकलेगा वह ठीक  और बाकी गलत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेने देकार्ते ने ज्ञान की पारंपरिक विधि न मानते हुए कहा कि समस्त  ज्ञान, जिसमें संभावना की बात कही गई हो, अस्वीकार करने योग्य है। केवल  वही ज्ञान स्वीकार्य है जो निश्चयात्मक और संशयातीत हो। इस प्रकार का ज्ञान  प्राप्त करने का तरीका उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कोर्स ऑन मेथड‘ में  बताया। इस पुस्तक में उन्होंने प्रतिपादित किया कि किसी समस्या को जानना  है तो उसके छोटे से छोटे टुकड़े करते जाएं, फिर उनका तार्किक संयोजन करें।  यह विश्लेषणात्मक पद्धति उसकी आधुनिक विज्ञान को बड़ी देन बनी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गैलीलियो ने यंत्रों के प्रयोग से निरीक्षण करने का प्रयत्न किया  और ग्रहों के निरीक्षण के आधार पर उस समय की भू-केन्द्रक विश्व की अवधारणा  को चुनौती दी और प्रतिपादित किया कि सूर्य पृथ्वी का नहीं अपितु पृथ्वी  सूर्य का चक्कर लगाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार देकार्ते ने विश्व को छोटे से छोटे टुकड़े कर समझने की  बात कही तो गैलीलियो ने विशाल अंतरिक्ष के निरीक्षण का द्वार खोला और आगे  चलकर पश्चिम की विज्ञान यात्रा व्रह्माण्ड के सूक्ष्मतम अंश की खोज और उसकी  विशालता को मापने की दिशा में अग्रसर हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्रह्माण्ड के सूक्ष्मतम भाग की खोज में पहले माना गया कि यह जगत  तत्व (एलीमेंट) यौगिक (कम्पाऊन्ड) तथा मिश्रण (मिक्सचर) का समुच्चय है। फिर  खोज आगे बढ़ी तब कहा कि मूल तत्व एलीमेंट हैं और वह अविभाज्य है। लगभग ९२  प्रकार के तत्व खोजे गए और माना गया कि जगत इनका समुच्चय है। परन्तु  एवगेड्रो और डाल्टन ने प्रतिपादित किया कि तत्व (एलीमेंट) मूल नहीं हैं  बल्कि ये छोटे-छोटे अविभाज्य कणों से बने हैं जिन्हें अणु और परमाणु कहा  गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यूटन ने इन समस्त वैज्ञानिक तथ्यों का संयोजन करते हुए सम्पूर्ण  व्रह्माण्ड की कल्पना प्रस्तुत की। उसने अपनी प्रतिभा से एक नयी गणितीय  पद्धति, जिसे डिफरेंशियल कैलकुलस कहा जाता है, का विकास किया तथा उसके  द्वारा केप्लर के ग्रहीय गति (प्लेनेटरी मोशन) के नियमों तथा गैलीलियो के  गिरती वस्तु के नियम (लॉ ऑफ फालिंग बॉडीज) को अपने सामान्य गति के नियमों  में समाहित किया, जिसके द्वारा सामान्य पत्थर से लेकर सौर मंडलों और तारों  तक के नियंत्रण और गति की व्याख्या हो सकती थी। इस आधार पर न्यूटन ने अपना  एक व्रह्माण्डीय मॉडल प्रस्तुत किया। न्यूटन के अनुसार सम्पूर्ण व्रह्माण्ड  में दिक्‌ और काल अनंत है इनमें दिक्‌ एक रस है व काल सरल रैखिक है। इसी  देश-काल से सामान्य रेत के कण से लेकर विराट ग्रह व नक्षत्र सब बने हैं।  इनका निर्माण छोटे-छोटे अविभाज्य कणों के द्वारा हुआ है और कणों को गति  गुरुत्व शक्ति से मिलती है। न्यूटन ने अपने गति संबंधी नियमों से  व्रह्माण्ड की गति की व्याख्या प्रस्तुत की तथा प्रतिपादित किया कि  सम्पूर्ण व्रह्माण्ड इन नियमों से चलता है। आगे लगभग ३०० वर्षों तक न्यूटन  की व्रह्माण्डीय मशीन की अवधारणा सम्पूर्ण पश्चिमी जगत पर हावी रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ग) १९वीं सदी के अंत तथा २०वीं सदी के प्रारंभ में विज्ञान के  क्षेत्र में दो बड़ी सैद्धान्तिक प्रणालियां अस्तित्व में आएं जिन्होंने  न्यूटन के मशीनी व्रह्माण्ड तथा इस जगत का निर्माण मूलभूत कणों से हुआ है,  इस अवधारणा को जड़-मूल से हिला दिया। ये सैद्धान्तिक प्रणालियां थीं ऊर्जा  पुंज सिद्धान्त (क्वांटम थ्योरी) जिसका सम्बन्ध शक्ति की बुनियादी इकाई से  था। तथा सापेक्षता सिद्धान्त (थ्योरी ऑफ रिलेटीविटी) जिसका सम्बंध दिक्‌  (स्पेस) काल (टाइम) तथा सम्प्पूर्ण व्रह्माण्ड की बनावट से था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊर्जापुंज सिद्धान्त के प्रतिपादन में मैक्सवेल, मैक्सप्लांक,  मैडमक्यूरी, रदर फोर्ड, नील्स बोर, हीजनबर्ग, जेम्स चाडविक, लुई डी  व्रोगली, इरविन श्रोडिंगर आदि का योगदान रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) १८वीं सदी के मध्य तक परमाणु अविभाज्य माना गया। परन्तु  हेम्होस नामक जर्मन भौतिकविद्‌ ने यह अवधारणा रखी कि विद्युत ऋण और धन आवेश  युक्त होती है और जैसे तत्व परमाणु से बने हैं, उसी प्रकार विद्युत भी  कणों से बनी होगी। आगे चलकर थामसन, हर्ट आदि ने प्रयोगों से सिद्ध किया कि  विद्युत इलेक्ट्रान नामक सूक्ष्म कणों से बना है। ये कण परमाणु के नाभिक के  आस-पास चक्कर लगाते हैं। रदरफोर्ड और नील्सबोर ने परमाणु के ग्रहीय रूप का  प्रतिपादन किया। आगे चलकर परमाणु का नाभिक टूटा और घन आवेशित प्रोटान और  बिना आवेश के न्यूट्रान ऋण की खोज हुई। आइंस्टीन ने प्रतिपादित किया कि  प्रकाश फोटोन नामक कणों का प्रवाह है जो विद्युत चुम्बकीय कणों से भिन्न  है। इस खोज की प्रक्रिया में १९६३ तक परमाणु के अंदर मेसोन, पायोन न्यूयॉन,  हाइपरान, न्यूट्रीनों आदि २०० प्रकार के सूक्ष्म कणों की खोज हुई और मानो  कणों का जंगल खड़ा हो गया। अनेकानेक कण खोजे गए, परन्तु इन कणों का सत्य  क्या है, यह जानने जब विज्ञान निकला तो एक बाधा आई, जिसका समाधान आज तक  नहीं हो पाया। क्योंकि यदि हम इलेक्ट्रॉन की आन्तरिक रचना जानना चाहते हैं  तो हमें इलेक्ट्रॉन की गति तथा दिशा का ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा। उसकी  दिशा जानने के लिए गामा किरण का प्रयोग करना पड़ेगा। पर इलेक्ट्रान, जो  प्रकाश के साधारण फोटोन से टकराकर अपना रूप बदल देता है, गामा किरण से  टकराने के साथ ही भिन्न रूप में आ जाएगा। तब समस्या यह आई कि जिसकी आन्तरिक  रचना जानना है उसे देखते हैं तो वह वही नहीं रहता। इसे वर्नर हीजनबर्ग ने  अनिश्चितता का सिद्धान्त कहा और कहा कि इलेक्ट्रान कोई वस्तु नहीं है, इसकी  अन्तरिक रचना जानना कठिन है। तब प्रश्न उठा कि फिर जानने का माध्यम क्या?  इस प्रश्न के उत्तर की खोज में ध्यान में आया कि मूल तत्व कण है या तरंग,  यह हम नहीं जानते। परन्तु कभी ये एक इकाई के रूप अकेले नहीं अपितु एक  प्रवाह के रूप में व्यवहार करते हैं। कभी वे कण रूप में भासित होते हैं तथा  कभी तरंग रूप में, और यह अनुभूति वास्तविक है। तो ध्यान में आया कि कण या  तरंग रूप का अनुभव उस प्रक्रिया पर निर्भर है जिसका उपयोग जानने के लिए  किया गया है। इस प्रकार इन सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति दृष्टा या आब्जर्वर  तथा उसके द्वारा अपनाये जाने वाली प्रक्रिया पर आश्रित हो गई। आज का  वैज्ञानिक असंख्य कणों को न जानते हुए भी उनके स्वभाव के आधार पर उनसे  व्यवहार करता है। इसका उल्लेख करते हुए सर जेम्स जीन्स अपनी पुस्तक ‘न्यू  बैकग्राउण्ड ऑफ साइंस‘ में कहते हैं ‘आज के भौतिक विज्ञान के इलेक्ट्रान,  प्रोटान, फोटान वैसे ही हैं, जैसे किसी बालक के पास बीज गणित के क,ख,ग। आज  अधिक से अधिक यह हो रहा है कि बिना यह जाने कि यह कण क्या है हम इनसे  व्यवहार कर कुशलतापूर्वक आविष्कार करने में सक्षम हुए हैं।‘ इससे  व्रह्माण्ड के अंतिम सत्य को जानने की विज्ञान यात्रा आइंस्टीन के शब्दों  में ‘एक अस्पष्ट से दूसरे अस्पष्ट को निकालना मात्र रह गई है।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) विज्ञान ने व्रह्माण्ड के मूल तत्व की खोज की यात्रा में पाया  कि अन्त: पारमाण्विक जगत के कण या तरंग अकेले व्यवहार नहीं करते अपितु उनका  प्रवाह रहता है और यह प्रवाह ऊर्जा रूप है और हम उन ऊर्जाओं के साथ  व्यवहार करते हैं। पूर्व में प्रकाश, ताप, चुम्बकत्व, विद्युत, ध्वनि आदि  विविध शक्तियां भिन्न-भिन्न मानी जाती थीं। परन्तु बाद में नवीन खोजों से  शक्तियों के एकीकरण की प्रक्रिया चली और इसमें से माना गया कि चार मूलभूत  बल हैं। (१) गुरुत्वाकर्षण बल-यह सभी मुख्य कणों इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा  न्यूट्रोनों के बीच है तथा पृथ्वी सहित समस्त व्रह्माण्ड पर नियमन करने  वाला बल है। पर इसका कारण माने जाने वाले ग्रेविटोन को अभी तक जाना नहीं जा  सका है। (२) विद्युत चुम्बकीय बल, इलेक्ट्रोमेग्नेटिक फोर्स। अब यह सिद्ध  हो गया है कि ताप, विद्युत, ध्वनि, चुम्बकत्व और अन्य सब शक्तियां विभिन्न  तरंगदैध्य वाली विद्युत चुम्बकीय शक्ति ही हैं। (३) प्रबल नाभिकीय बल, यह  परमाणु के नाभिक में प्रोट्रॉन और न्यूट्रॉन को बांधे रखने वाला बल है। यह  विद्युत चुम्बकीय बल से दस लाख गुना प्रबल है। (४) निर्बल नाभिकीय बल  (ध्र्ड्ढड्ढत्त्‌ त्दद्यड्ढद्धद्मठ्ठड़द्यत्दृद)। इन चार बातों में सब कुछ  समाहित है। इसमें विद्युत चुम्बकीय तथा प्रबल और निर्बल नाभिकीय बलों का  समन्वय वाइनबर्ग एवं पाकिस्तान के अब्दुस सलाम ने किया है। परन्तु अभी  गुरुत्व बल को इसमें नहीं जोड़ा जा सका है। (जारी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) आइंस्टीन ने अपने विशिष्ट सापेक्षिता सिद्धांत में पदार्थ व  ऊर्जा का एकीकरण किया। उन्होंने कहा ऊर्जा की स्थूल अभिव्यक्ति पदार्थ है  तथा अपने प्रसिद्ध समीकरण कउथ्र्ड़२ द्वारा सिद्ध किया कि दोनों एक-दूसरे  में परिवर्तित हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-4357928180000297070?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4357928180000297070'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4357928180000297070'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7393.html' title='पश्चिम का विज्ञान : एक अस्पष्ट से दूसरे अस्पष्ट तक'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-5353327324815373163</id><published>2010-06-03T15:13:00.001+05:30</published><updated>2010-06-03T15:13:52.001+05:30</updated><title type='text'>ध्वनि शास्त्र पर आधारित भारतीय लिपि</title><content type='html'>&lt;div id=":1o" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;लेखक &lt;span&gt;- सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;span&gt; १८वीं -१९वीं सदी के अनेक पाश्चात्य संशोधकों ने यह भ्रमपूर्ण धारणा फैलाने  का प्रयत्न किया कि भारत के प्राचीन ऋषि लेखन कला से अनभिज्ञ थे तथा ईसा  से ३००-४०० वर्ष पूर्व भारत में विकसित व्राह्मी लिपि का मूल भारत से बाहर  था। इस संदर्भ में डा. ओरफ्र्ीड व म्युएलर ने प्रतिपादित किया कि भारत को  लेखन विद्या ग्रीकों से मिली। सर विलियम जोन्स ने कहा कि भारतीय व्राह्मी  लिपि सेमेटिक लिपि से उत्पन्न हुई। प्रो. बेवर ने यह तथ्य स्थापित करने का  प्रयत्न किया कि व्राह्मी का मूल फोनेशियन लिपि है। डा. डेव्हिड डिरिंजर ने  अनुमान किया कि अरेमिक लिपि से व्राह्मी उत्पन्न हुई। मैक्समूलर ने  संस्कृत साहित्य का इतिहास लिखते समय लिपि के विकास के संदर्भ में अपना यह  मत प्रतिपादित किया कि लिखने की कला भारत में ईसा से ४०० वर्ष पूर्व  अस्तित्व में आई। दुर्भाग्य से बाद के समय में भारतीय विद्वानों ने भी  पाश्चात्य संशोधकों के स्वर में स्वर मिलाते हुए उन्हीं निष्कर्षों का  प्रतिपादन किया। इस सारी प्रक्रिया में अपने देश की परम्परा व ग्रंथों में  लिपि के विकास की गाथा जानने का विशेष प्रयत्न नहीं हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;देखें कि वास्तविकता क्या है?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्रसिद्ध पुरातत्ववेता और लिपि विशेषज्ञ अ.ब. वालावलकर तथा लिपिकार  लक्ष्मण श्रीधर वाकणकर ने अपने संशोधन से यह सिद्ध किया कि भारतीय लिपि का  उद्गम भारत में ही हुआ है तथा ध्वन्यात्मक आधार पर लेखन परम्परा वेद काल से  विद्यमान थी, जिसकी पुष्टि अनेक पुरातत्वीय साक्ष्यों से भी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आदर्श ध्वन्यात्मक लेखन की बाधाओं का वर्णन एरिक गिल अपने   टाइपोग्राफी (च्र्न्र्द्रदृढ़द्धठ्ठद्रण्न्र्&lt;wbr&gt;) पर लिखे निबंध में कहते  हैं  कि किसी समय कोई अक्षर किसी ध्वनि का पर्यायवाची रहा होगा, परन्तु रोमन  लिपि के अध्ययन से अमुक अक्षर हमेशा व हर जगह अमुक ध्वनि का पर्याय है, यह  तथ्य ध्यान में नहीं आता। उदाहरण के तौर पर दृद्वढ़ण्‌- ये चार अक्षर ७  भिन्न-भिन्न प्रकार व भिन्न-भिन्न ध्वनि से उच्चारित होते हैं- ‘ओड, अफ,  ऑफ, आऊ, औ, ऊ, ऑ‘। यह लिखने के बाद अपने निष्कर्ष के रूप में गिल कहते हैं  कि मेरा स्पष्ट विचार है, ‘हमारे रोमन अक्षर ध्वनि का लेखन, मुद्रण ठीक  प्रकार से करते हैं, यह कहना मूर्खतापूर्ण होगा।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर भारत में ध्वन्यात्मक लेखन परंपरा युगों से रही है। इसके  कुछ प्रमाण हमारे प्राचीन वाङ्मय में प्राप्त होते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. यजु तैत्तरीय संहिता में एक कथा आती है कि देवताओं के सामने एक  समस्या थी कि वाणी बोली जाने के बाद अदृश्य हो जाती है। अत: इस निराकार  वाणी को साकार कैसे करें? अत: वे इन्द्र के पास गए और कहा ‘वाचंव्या  कुर्वीत‘ अर्थात्‌ वाणी को आकार प्रदान करो। तब इन्द्र ने कहा मुझे वायु का  सहयोग लेना पड़ेगा। देवताओं ने इसे मान्य किया और इन्द्र ने वाणी को आकार  दिया। वाणी को आकार देना यानी लेखन विद्या। यही इन्द्र वायव्य व्याकरण के  नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में अधिक हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. अथर्ववेद में गणक ऋषिकृत सूक्त गणपति अथर्वशीर्ष की निम्न  पंक्तियां लेखन विद्या की उत्पत्ति का स्पष्ट प्रमाण देती हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्‌। अनुस्वार: परतर:।  अर्धेन्दुलसितम्‌। तोरण रुद्धम्‌। एतत्तवमनुस्वरूपम्‌। गकार: पूर्वरूपम्‌।  अकारो मध्यरूपम्‌ अनुस्वारश्र्चान्त्यरूपम्‌। बिन्दुरुत्तररूपम। नाद:  संधानम्‌। संहिता संधि:। सैषा गणेश विद्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ पहले ध्वनि के गण का उच्चारण करना फिर उसी क्रम में वर्ण  (रंग की सहायता से) बाद में लिखना तत्पश्चात्‌ अक्षर पर अनुस्वार देना, वह  अर्ध चंद्रयुक्त हो। इस प्रकार हे गणेश आपका स्वरूप, चित्र इस प्रकार होगा  ग्‌ यानी व्यंजन तथा बीच का स्वर का भाग यानी आकार रूपदंड तथा अंत मुक्त  अनुस्वार। इसका नाद व संधिरूप उच्चारण करना यही गणेश विद्या है, जिसे गणपति  जानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. ध्वनि सूत्रों को देने वाले भगवाने शिव थे। भिन्न-भिन्न वेद की  शाखाएं बोलने वालों की मृत्यु के कारण लुप्त होने लगीं। अत: उसे बचाने की  प्रार्थना लेकर सनकादि सिद्ध दक्षिण में चिदम्बरम्‌ में भगवान शिव के पास  गए। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने अपने स्वर्गिक नृत्य के अन्तराल में  अपने डमरू को नौ और पांच अर्थात्‌ चौदह बार बजाया। उसी से १४ ध्वनि सूत्र  निकले, जो माहेश्वर सूत्र कहलाये। इसका वर्णन करते हुए कहा गया है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नृत्तावसाने नटराजराजो&lt;br /&gt;ननाद ढक्कां नवपंचवारम्‌।&lt;br /&gt;उद्धर्तुकाम: सनकादिसिद्धान्‌ एतद्विमर्षे शिवसूत्रजालम्‌।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;कौशिक सूत्र-१&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौदह माहेश्वर सूत्रों का उल्लेख पाणिनी निम्न प्रकार से करते हैं।  (१) अ इ उ ण्‌ (२) ऋ लृ क्‌ (३) ए ओ ङ्‌  (४) ऐ औ च्‌ (५) ह य व र ट्‌ (६)  ल ण्‌ (७) ञ म ङ ण न म्‌ (८) झ भ ञ्‌ (९) ध ठ घ ष्‌ (१०) ज ब ग ड द श्‌  (११) ख फ छ ठ थ च ट त्र य्‌ (१२) क प य्‌ (१३) श ष स र्‌ (१४) ह ल्‌ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४. वेदों के स्मरण व उनकी शुद्धता बनी रहे इस हेतु विभिन्न ऋषियों  ने जटा, माला, शिखा, रेखा, दण्ड, रथ, ध्वज, तथा घन पाठ की जटिल पद्धतियां  विकसित कीं, जो बिना लिखे सुरक्षित रखना कठिन था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५. महाभारतकार व्यास मुनि जब महाभारत लिखने का विचार कर रहे थे तब  उनके सामने समस्या थी कि इसे लिखे कौन, तब उन्होंने उसके समाधान हेतु  गणेशजी का स्मरण किया- ‘काव्यस्य लेखनार्थाय गणेशं स्मर्यताम्‌ मुने‘। जब  गणेश जी आए तो व्यास मुनि ने उनसे कहा ‘लेखको भारतस्यास्य भव गणनायक:,  अर्थात्‌ ‘आप भारत ग्रंथ के लेखक बनें।‘ इसका अर्थ है गणपति उस समय के  मूर्धन्य लिपिकार थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाणिनी ने ऋग्वेद्‌ शिक्षा में विवेचन किया है कि वाणी अपने चार  पदों में से चौथे पद वैखरी में आती है, तब मनुष्य के शरीर के पंच अंग के  सहारे ध्वनि उत्पन्न होती है। इस आधार पर स्वर व व्यजंनों का सम्बंध जिस  अंग में आता है उसका वर्गीकरण निम्न प्रकार है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. कंठ्य-श्वास कंठ से निकलता है तब तो ध्वनि निकलती है उसके  अर्न्तगत निम्न अक्षर आते हैं- अ,आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह और विसर्ग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. तालव्य- कंठ से थोड़ा ऊपर दांतों के निकट कठोर तालु पर से जब  श्वास निकलती है तो वह ध्वनि इ,ई,च,छ,ज,झ,ञ,य और श के द्वारा अभिव्यक्त  होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. मूर्धन्य-जीभ थोड़ी पीछे लेकर कोमल तालु में लगाकर ध्वनि निकालने  पर वह निम्न अक्षरों में व्यक्त होती है-ऋ,ट,ठ.ड,द,ण,ष।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४. दंत्य-जीभ दांतों से लगती है तब जिन अक्षरों का उच्चारण होता है  वह हैं लृ,ल,त,थ,द,ध,न,स।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५. ओष्ठ्य-दोनों ओठों के सहारे जिन अक्षरों का उच्चारण होता है वह  हैं- उ,ऊ,प,फ,ब,भ, म, और व। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;इनके अतिरिक्त ए,ऐ,ओ,औ,अं,अ: यह मिश्रित स्वर हैं।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त ध्वनि शास्त्र के आधार पर लिपि विकसित हुई और काल के प्रवाह  में लिपियां बदलती रहीं, पर उनका आधार ध्वनि शास्त्र का मूलभूत सिद्धान्त  ही रहा। प्रख्यात पुरातत्वविद्‌ वालावलकर जी ने प्राचीन मुद्राओं में  प्राप्त लिपियों का अध्ययन कर प्रमाणित किया कि मूल रूप में माहेश्वरी लिपि  थी जो वैदिक लिपि रही। इसी से आगे चलकर व्राह्मी तथा नागरी आदि लिपियां  विकसित हुएं। प्रख्यात लिपिकार वाकणकर द्वारा निर्मित तालिका में हम इसे  देख सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पुरातत्वीय प्रमाण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;लिपि के विकास एवं पुरातत्वीय प्रमाणों पर आधारित वालावलकर एवं वाकणकर  के संशोधनों एवं प्रतिपादनों का उल्लेख करते हुए डा. मुरली मनोहर जोशी ने  अपने लेख ‘लिपि विधाता गणेश‘ में जो विचार व्यक्त किए हैं वे यह सिद्ध करते  हैं कि प्राचीन काल से लिपि की कला का भारत में अस्तित्व था और वह  पूर्णतया ध्वनि शास्त्र पर आधारित था, जो विश्व की अन्य लिपियों में नहीं  दिखाई देता है। डा. जोशी के शब्दों में-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘व्रिटिश म्यूजियम में एक सील (क्र. ३१-११-३६६/१०६७-४७३६७-१८८१)  रखी है जिसकी अनुकृति नीचे चित्र में प्रदर्शित है। ईसापूर्व छठी शताब्दी  की इस सील में बेबीलोनी कीलाक्षर लिपि एवं व्राह्मी लिपि दोनों एक साथ  विद्यमान हैं। कीलाक्षरों को तो १९३६ में ही पढ़ लिया गया था किन्तु बीच की  एक पंक्ति को कोई अज्ञात लिपि मानकर यों ही छोड़ दिया गया था। पुरालेखविद्‌  वालावलकर ने ही इस अज्ञात लिपि को पढ़कर यूरोपीय विद्वानों की मान्यता कि  भारत ने लिपि कहीं बाहर से उधार ली, झुठला दी। उनके अनुसार यह सील अशोक  पूर्व माहेश्वरी लिपि में लिखी संस्कृत का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। इस  पंक्ति का पाठ है- ‘अवखेज्ञराख नु औहर्मनुभ्य: ददतु‘ जो कीलाक्षरों में  लिखे अनुबंध की संस्कृत में की गयी संपुष्टि है-इस साक्ष्य से मैक्डोनल एवं  ब्यूहलर की स्थापनाएं कि भारत ने ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में लिपि बाहर  से उधार ली थी, निस्सार सिद्ध हो जाती है। इसी तरह एक अन्य महत्वपूर्ण  साक्ष्य है पेरिस के लूण्रे म्यूजियम में ईसा पूर्व (३०००-२४००) की एक  पेलेस्टाइन में उत्खनन के समय सार्गन राजा के यहां से उपलब्ध हुई सील है।  इस सील  चित्र को देखकर जॉन मार्शल ने कहा था कि इस सील के पुरातत्वीय  परिणाम बेहद चौंकाने वाले हैं। इस सील के सिंधु घाटी सील के साथ साम्य ने  यूरोपीय विद्वानों की भारतीय लिपि के बाहरी उद्गम सम्बंधी स्थापनाओं पर  अनेक प्रश्नचिन्ह लगा दिए। अब कम-से-कम हमारे मनीषियों द्वारा लिपि बाहर से  उधार लेने का शोर मचाया जाना तो मंद पड़ ही गया है। लेकिन भारतीय लिपि की  प्राचीनता सम्बंधी प्रश्नों पर अभी भी अंग्रेजीदां प्राच्यविद्‌ चुप्पी  लगाए हैं।‘ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वैदिक ओंकार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;‘इसी क्रम में छठी शताब्दी ईसा पूर्व के सोहगरा ताम्र अभिलेख (चित्र-४)  पर भी दृष्टिपात करना आवश्यक है। इसकी प्रथम पंक्ति में वही चित्र बना हुआ  है जिसे वालावलकर की तालिका में वैदिक ओंकार बताया गया है। चित्र-५,६ व ७  को भी देखिए। ये सब सिक्कों के चित्र हैं, जिनमें वैदिक ओंकार तथा  स्वास्तिक जैसे आध्यात्मिक प्रतीक अंकित हैं। प्रश्न यह है कि वैदिक ओंकार  की आकृति ऐसी क्यों मान ली जाए। ज्ञानेश्वरी में ओंकार रचना का वर्णन करते  हुए लिखा है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अ- कार चरणयुगल। उ-कार उदर विशाल।&lt;br /&gt;म-कार महामंडल। मस्तका-कारे॥११॥&lt;br /&gt;हे तिन्ही एकवटले। तेच शब्दव्रह्म कवत्तल।&lt;br /&gt;ते मियां गुरुकृपा नमिले। आदि बीज ॥२०॥ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘शब्द व्रह्म या एकाक्षर व्रह्म, प्रण की आकृति का ज्ञानेश्वरी में  किया गया वर्णन महत्व का है। वर्तमान देवनागरी में लिखे जाने वाले ॐ से इस  वर्णन का मेल स्पष्ट नहीं होता। किन्तु वालावलकर के वैदिक ओंकार से अवश्य  इसका साम्य है। यदि माहेश्वरी सूत्रों के अर्धेंदु सिद्धांत पर गौर किया  जाए तो यह गुत्थी सुलझ जाती है। दाएं चित्र देखिए-सबसे नीचे दो अर्धेंदु  हैं जो ‘अ‘ के प्रतीक हैं; उसके ऊपर फिर एक अर्धेंदु खण्ड है जो ‘उ‘ को  व्यक्त करता है, सबसे ऊपर एक वृत्त एवं अर्धेंदु बिंदु है जो ‘म‘ को  प्रदर्शित करता है। इस प्रकार ज्ञानेश्वरी का ओंकार, गीता एवं  उपनिषदों का  एकाक्षर व्रह्म या प्रणव जो भी कहिए; वह माहेश्वरी सूत्रों के अर्धेंदु  सिद्धांत के अनुसार निश्चित आकारों को, जो निश्चित ध्वनियों के प्रतीक हैं,  जिन्हें क्रमानुसार जोड़ने से बनी एक निश्चित आकृति है। देवनागरी के ॐ में  भी यही सिद्धांत परिलक्षित होता है। यदि वैदिक ओंकार को ऊपर चित्र की भांति  नब्बे अंश से घड़ी की सुई की दिशा में घुमा दें, देवनागरी आकृति से अदभुत  साम्य हो जाता है। एक दृष्टि से वैदिक ओंकार के देवनागरी ॐ में रूपांतरण तक  की यात्रा भारतीय लिपि के विकास की कहानी है। इसे ऋग्वेद से लेकर  पद्मपुराण तक खोजा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-5353327324815373163?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/5353327324815373163'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/5353327324815373163'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9341.html' title='ध्वनि शास्त्र पर आधारित भारतीय लिपि'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-503891645322991309</id><published>2010-06-03T15:12:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:13:12.487+05:30</updated><title type='text'>ध्वनि तथा वाणी विज्ञान : सात सुरों का भारतीय संसार</title><content type='html'>&lt;div id=":1s" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक -  सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;span&gt; सृष्टि की उत्पत्ति की प्रक्रिया नाद के साथ हुई। जब प्रथम महास्फोट (बिग  बैंग) हुआ, तब आदि नाद उत्पन्न हुआ। उस मूल ध्वनि को जिसका प्रतीक ‘ॐ‘ है,  नादव्रह्म कहा जाता है। पांतजलि योगसूत्र में पातंजलि मुनि ने इसका वर्णन  ‘तस्य वाचक प्रणव:‘ की अभिव्यक्ति ॐ के रूप में है, ऐसा कहा है।  माण्डूक्योपनिषद्‌ में कहा है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ओमित्येतदक्षरमिदम्‌ सर्वं तस्योपव्याख्यानं&lt;br /&gt;भूतं भवद्भविष्यदिपि सर्वमोड्‌◌ंकार एवं&lt;br /&gt;यच्यान्यत्‌ त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;माण्डूक्योपनिषद्‌-१॥&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ ॐ अक्षर अविनाशी स्वरूप है। यह संम्पूर्ण जगत का ही  उपव्याख्यान है। जो हो चुका है, जो है तथा जो होने वाला है, यह सबका सब जगत  ओंकार ही है तथा जो ऊपर कहे हुए तीनों कालों से अतीत अन्य तत्व है, वह भी  ओंकार ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वाणी का स्वरूप&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां वाणी विज्ञान का बहुत गहराई से विचार किया गया। ऋग्वेद में  एक ऋचा आती है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चत्वारि वाक्‌ परिमिता पदानि&lt;br /&gt;तानि विदुर्व्राह्मणा ये मनीषिण:&lt;br /&gt;गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति&lt;br /&gt;तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;ऋग्वेद १-१६४-४५&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ वाणी के चार पाद होते हैं, जिन्हें विद्वान मनीषी जानते  हैं। इनमें से तीन शरीर के अंदर होने से गुप्त हैं परन्तु चौथे को अनुभव कर  सकते हैं। इसकी विस्तृत व्याख्या करते हुए पाणिनी कहते हैं, वाणी के चार  पाद या रूप हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. परा, २. पश्यन्ती, ३. मध्यमा, ४. वैखरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वाणी की उत्पत्ति&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वाणी कहां से उत्पन्न होती है, इसकी गहराई में जाकर अनुभूति की गई है।  इस आधार पर पाणिनी कहते हैं, आत्मा वह मूल आधार है जहां से ध्वनि उत्पन्न  होती है। वह इसका पहला रूप है। यह अनुभूति का विषय है। किसी यंत्र के  द्वारा सुनाई नहीं देती। ध्वनि के इस रूप को परा कहा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे जब आत्मा, बुद्धि तथा अर्थ की सहायता से मन: पटल पर कर्ता,  कर्म या क्रिया का चित्र देखता है, वाणी का यह रूप पश्यन्ती कहलाता है,  जिसे आजकल घ्त्ड़द्यदृद्धत्ठ्ठथ्‌ कहते हैं। हम जो कुछ बोलते हैं, पहले उसका  चित्र हमारे मन में बनता है। इस कारण दूसरा चरण पश्यन्ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके आगे मन व शरीर की ऊर्जा को प्रेरित कर न सुनाई देने वाला  ध्वनि का बुद्बुद् उत्पन्न करता है। वह बुद्बुद् ऊपर उठता है तथा छाती से  नि:श्वास की सहायता से कण्ठ तक आता है। वाणी के इस रूप को मध्यमा कहा जाता  है। ये तीनों रूप सुनाई नहीं देते हैं। इसके आगे यह बुद्बुद् कंठ के ऊपर  पांच स्पर्श स्थानों की सहायता से सर्वस्वर, व्यंजन, युग्माक्षर और मात्रा  द्वारा भिन्न-भिन्न रूप में वाणी के रूप में अभिव्यक्त होता है। यही सुनाई  देने वाली वाणी वैखरी कहलाती है और इस वैखरी वाणी से ही सम्पूर्ण ज्ञान,  विज्ञान, जीवन व्यवहार तथा बोलचाल की अभिव्यक्ति संभव है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वाणी की अभिव्यक्ति&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;यहां हम देखते हैं कि कितनी सूक्ष्मता से उन्होंने मुख से निकलने वाली  वाणी का निरीक्षण किया तथा क से ज्ञ तक वर्ण किस अंग की सहायता से निकलते  हैं, इसका उन्होंने जो विश्लेषण किया वह इतना विज्ञान सम्मत है कि उसके  अतिरिक्त अन्य ढंग से आप वह ध्वनि निकाल ही नहीं सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क, ख, ग, घ, ङ-  कंठव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय ध्वनि  कंठ से निकलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;च, छ, ज, झ,ञ-  तालव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ  लालू से लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट, ठ, ड, ढ , ण-  मूर्धन्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के  मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त, थ, द, ध, न-  दंतीय कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ  दांतों से लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के  मिलने पर ही होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;स्वर विज्ञान&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सभी वर्ण, संयुक्ताक्षर, मात्रा आदि के उच्चारण का मूल ‘स्वर‘ हैं। अत:  उसका भी गहराई से अध्ययन तथा अनुभव किया गया। इसके निष्कर्ष के रूप में  प्रतिपादित किया गया कि स्वर तीन प्रकार के हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदात्त-उच्च स्वर&lt;br /&gt;अनुदात्त-नीचे का स्वर&lt;br /&gt;स्वरित- मध्यम स्वर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनका और सूक्ष्म विश्लेषण किया गया, जो संगीत शास्त्र का आधार बना।  संगीत शास्त्र में सात स्वर माने गए जिन्हें सा रे ग म प ध नि के प्रतीक  चिन्हों से जाना जाता है। इन सात स्वरों का मूल तीन स्वरों में विभाजन किया  गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उच्चैर्निषाद, गांधारौ नीचै ऋर्षभधैवतौ।&lt;br /&gt;शेषास्तु स्वरिता ज्ञेया:, षड्ज मध्यमपंचमा:॥ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ निषाद तथा गांधार (नि ग) स्वर उदात्त हैं। ऋषभ और धैवत  (रे, ध) अनुदात्त। षड्ज, मध्यम और पंचम (सा, म, प) ये स्वरित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सातों स्वरों के विभिन्न प्रकार के समायोजन से विभिन्न रागों के  रूप बने और उन रागों के गायन में उत्पन्न विभिन्न ध्वनि तरंगों का परिणाम  मानव, पशु प्रकृति सब पर पड़ता है। इसका भी बहुत सूक्ष्म निरीक्षण हमारे  यहां किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विशिष्ट मंत्रों के विशिष्ट ढंग से उच्चारण से वायुमण्डल में विशेष  प्रकार के कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनका विशेष परिणाम होता है। यह  मंत्रविज्ञान का आधार है। इसकी अनुभूति वेद मंत्रों के श्रवण या मंदिर के  गुंबज के नीचे मंत्रपाठ के समय अनुभव में आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां विभिन्न रागों के गायन व परिणाम के अनेक उल्लेख  प्राचीनकाल से मिलते हैं। सुबह, शाम, हर्ष, शोक, उत्साह, करुणा-भिन्न-भिन्न  प्रसंगों के भिन्न-भिन्न राग हैं। दीपक से दीपक जलना और मेघ मल्हार से  वर्षा होना आदि उल्लेख मिलते हैं। वर्तमान में भी कुछ उदाहरण मिलते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अनुभव&lt;br /&gt;(१) प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. ओंकार नाथ ठाकुर १९३३ में फ्लोरेन्स (इटली)  में आयोजित अखिल विश्व संगीत सम्मेलन में भाग लेने गए। उस समय मुसोलिनी  वहां का तानाशाह था। उस प्रवास में मुसोलिनी से मुलाकात के समय पंडित जी ने  भारतीय रागों के महत्व के बारे में बताया। इस पर मुसोलिनी ने कहा, मुझे  कुछ दिनों से नींद नहीं आ रही है। यदि आपके संगीत में कुछ विशेषता हो, तो  बताइये। इस पर पं. ओंकार नाथ ठाकुर ने तानपूरा लिया और राग ‘पूरिया‘ (कोमल  धैवत का) गाने लगे। कुछ समय के अंदर मुसोलिनी को प्रगाढ़ निद्रा आ गई। बाद  में उसने भारतीय संगीत की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक  के प्राचार्य को पंडित जी के संगीत के स्वर एवं लिपि को रिकार्ड करने का  आदेश दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. आजकल पाश्चात्य जीवन मूल्य, आचार तथा व्यवहार का प्रभाव पड़ने के  साथ युवा पीढ़ी में पाश्चात्य पॉप म्यूजिक का भी आकर्षण बढ़ रहा है। पॉप  म्यूजिक आन्तरिक व्यक्तित्व को कुंठित और निम्न भावनाओं को बढ़ाने का कारण  बनता है, जबकि भारतीय संगीत जीवन में संतुलन तथा उदात्त भावनाओं को विकसित  करने का माध्यम है। इसे निम्न अनुभव प्रयोग स्पष्ट कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांडिचेरी स्थित श्री अरविंद आश्रम में श्रीमां ने एक प्रयोग किया।  एक मैदान में दो स्थानों पर एक ही प्रकार के बीज बोये गये तथा उनमें से एक  के आगे पॉप म्यूजिक बजाया गया तथा दूसरे के आगे भारतीय संगीत। समय के साथ  अंकुर फूटा और पौधा बढ़ने लगा। परन्तु आश्चर्य यह था कि जहां पॉप म्यूजिक  बजता था, वह पौधा असंतुलित तथा उसके पत्ते कटे-फटे थे। जहां भारतीय संगीत  बजता था, वह पौधा संतुलित तथा उसके पत्ते पूर्ण आकार के और विकसित थे। यह  देखकर श्रीमां ने कहा, दोनों संगीतों का प्रभाव मानव के आन्तरिक व्यक्तित्व  पर भी उसी प्रकार पड़ता है जिस प्रकार इन पौधों पर पड़ा दिखाई देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) हम लोग संगीत सुनते हैं तो एक बात का सूक्ष्मता से निरीक्षण  करें, इससे पाश्चात्य तथा भारतीय संगीत की प्रकृति तथा परिणाम का सूक्ष्मता  से ज्ञान हो सकता है। जब कभी किसी संगीत सभा में पं. भीमसेन जोशी, पं.  जसराज या अन्य किसी का गायन होता है और उस शास्त्रीय गायन में जब श्रोता  उससे एकाकार हो जाते हैं तो उनका मन उसमें मस्त हो जाता है, तब प्राप्त  आनन्द की अनुभूति में वे सिर हिलाते हैं। दूसरी ओर जब पाश्चात्य संगीत बजता  है, कोई माइकेल जैक्सन, मैडोना का चीखते-चिल्लाते स्वरों के आरोह-अवरोह  चालू होते हैं तो उसके साथ ही श्रोता के पैर थिरकने लगते हैं। अत: ध्यान  में आता है कि भारतीय संगीत मानव की नाभि के ऊपर की भावनाएं विकसित करता है  और पाश्चात्य पॉप म्यूजिक नाभि के नीचे की भावनाएं बढ़ाता है जो मानव के  आन्तरिक व्यक्तित्व को विखंडित कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्वनि कम्पन (च्दृद्वदड्ड ज्त्डद्धठ्ठद्यत्दृद) किसी घंटी पर  प्रहार करते हैं तो उसकी ध्वनि देर तक सुनाई देती है। इसकी प्रक्रिया क्या  है? इसकी व्याख्या में वात्स्यायन तथा उद्योतकर कहते हैं कि आघात में कुछ  ध्वनि परमाणु अपनी जगह छोड़कर और संस्कार जिसे कम्प संतान-संस्कार कहते हैं,  से एक प्रकार का कम्पन पैदा होता है और वायु के सहारे वह आगे बढ़ता है तथा  मन्द तथा मन्दतर इस रूप में अविच्छिन्न रूप से सुनाई देता है। इसकी  उत्पत्ति का कारण स्पन्दन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिध्वनि : विज्ञान भिक्षु अपने प्रवचन भाष्य अध्याय १ सूत्र ७  में कहते हैं कि प्रतिध्वनि (कड़ण्दृ) क्या है? इसकी व्याख्या में कहा गया  कि जैसे पानी या दर्पण में चित्र दिखता है, वह प्रतिबिम्ब है। इसी प्रकार  ध्वनि टकराकर पुन: सुनाई देती है, वह प्रतिध्वनि है। जैसे जल या दर्पण का  बिम्ब वास्तविक चित्र नहीं है, उसी प्रकार प्रतिध्वनि भी वास्तविक ध्वनि  नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूपवत्त्वं च न सामान्य त: प्रतिबिम्ब प्रयोजकं&lt;br /&gt;शब्दास्यापि प्रतिध्वनि रूप प्रतिबिम्ब दर्शनात्‌॥&lt;br /&gt;विज्ञान भिक्षु, प्रवचन भाष्य अ. १ सूत्र-४७ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घ्त्ड़ण्‌ क्ष्दद्यड्ढदद्मत्द्यन्र्‌ ठ्ठदड्ड  च्र्त्थ्र्डद्धड्ढ-वाचस्पति मिश्र के अनुसार ‘शब्दस्य असाधारण धर्म:‘- शब्द  के अनेक असाधारण गुण होते हैं। गंगेश उपाध्याय जी ने ‘तत्व चिंतामणि‘ में  कहा- ‘वायोरेव मन्दतर तमादिक्रमेण मन्दादि शब्दात्पत्ति।‘ वायु की सहायता  से मन्द-तीव्र शब्द उत्पन्न होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाचस्पति, जैमिनी, उदयन आदि आचार्यों ने बहुत विस्तारपूर्वक अपने  ग्रंथों में ध्वनि की उत्पत्ति, कम्पन, प्रतिध्वनि, उसकी तीव्रता, मन्दता,  उनके परिणाम आदि का हजारों वर्ष पूर्व किया जो विश्लेषण है, वह आज भी  चमत्कृत करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-503891645322991309?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/503891645322991309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/503891645322991309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5586.html' title='ध्वनि तथा वाणी विज्ञान : सात सुरों का भारतीय संसार'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-5952577171127023512</id><published>2010-06-03T15:11:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:12:22.071+05:30</updated><title type='text'>स्वास्थ्य विज्ञान -२ : सर्जरी के सर्जक हम ही हैं!</title><content type='html'>&lt;div id=":1w" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt; आयुर्वेद चिकित्सा दो प्रकार से की जाती थी-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अ) शोधन-पंचकर्म द्वारा, ये निम्न हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) वमन- मुंह से उल्टी करके दोष दूर करना, (२) विरेचन-मुख्यत:  गुदा मार्ग से दोष निकालना, (३) बस्ति (एनीमा) (४) रक्तमोक्षण-जहरीली चीज  काटने पर या शरीर में खराब रक्त कहीं हो, तो उसे निकालना। (५) नस्य- नाक  द्वारा स्निग्ध चीज देना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ब) शमन- औषधि द्वारा चिकित्सा, इसकी परिधि बहुत व्याप्त थी। आठ  प्रकार की चिकित्साएं बताई गई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१)  काय चिकित्सा-सामान्य चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) कौमार भृत्यम्‌-बालरोग चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) भूत विद्या- मनोरोग चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) शालाक्य तंत्र- उर्ध्वांग अर्थात्‌ नाक, कान, गला  आदि की  चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५) शल्य तंत्र-शल्य चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(६) अगद तंत्र-विष चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(७) रसायन-रसायन चिकित्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(८) बाजीकरण-पुरुषत्व वर्धन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औषधियां:- चरक ने कहा, जो जहां रहता है, उसी के आसपास प्रकृति ने  रोगों की औषधियां दे रखी हैं। अत: वे अपने आसपास के पौधों, वनस्पतियों का  निरीक्षण व प्रयोग करने का आग्रह करते थे। एक समय विश्व के अनेक आचार्य  एकत्रित हुए, विचार-विमर्श हुआ और उसकी फलश्रुति आगे चलकर ‘चरक संहिता‘ के  रूप में सामने आई। इस संहिता में औषधि की दृष्टि से ३४१ वनस्पतिजन्य, १७७  प्राणिजन्य, ६४ खनिज द्रव्यों का उल्लेख है। इसी प्रकार सुश्रुत संहिता में  ३८५ वनस्पतिजन्य, ५७ प्राणिजन्य तथा ६४ खनिज द्रव्यों से औषधीय प्रयोग व  विधियों का वर्णन है। इनसे चूर्ण, आसव, काढ़ा, अवलेह आदि अनेक में रूपों  औषधियां तैयार होती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पूर्वकाल में भी ग्रंथों में कुछ अद्भुत औषधियों का वर्णन  मिलता है। जैसे बाल्मीकी रामायण में राम-रावण युद्ध के समय जब लक्ष्मण पर  प्राणांतक आघात हुआ और वे मूर्छित हो गए, उस समय इलाज हेतु जामवन्त ने  हनुमान जी के पास हिमालय में प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का  वर्णन किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृत संजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि।&lt;br /&gt;सुवर्णकरणीं चैव सन्धानी च महौषधीम्‌॥&lt;br /&gt;युद्धकाण्ड ७४-३३ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) विशल्यकरणी-शरीर में घुसे अस्त्र निकालने वाली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) सन्धानी- घाव भरने वाली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) सुवर्णकरणी-त्वचा का रंग ठीक रखने वाली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) मृतसंजीवनी-पुनर्जीवन देने वाली &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरक के बाद बौद्धकाल में नागार्जुन, वाग्भट्ट आदि अनेक लोगों के  प्रयत्न से रस शास्त्र विकसित हुआ। इसमें पारे को शुद्ध कर उसका औषधीय  उपयोग अत्यंत परिणामकारक रहा। इसके अतिरिक्त धातुओं, यथा-लौह, ताम्र,  स्वर्ण, रजत, जस्त को विविध रसों में डालना और गरम करना-इस प्रक्रिया से  उन्हें भस्म में परिवर्तित करने की विद्या विकसित हुई। यह भस्म और पादपजन्य  औषधियां भी रोग निदान में काम आती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शल्य चिकित्सा- कुछ वर्षों पूर्व इंग्लैण्ड के शल्य चिकित्सकों के  विश्व प्रसिद्ध संगठन ने एक कैलेण्डर निकाला, उसमें विश्व के अब तक के  श्रेष्ठ शल्य चिकित्सकों (सर्जन) के चित्र दिए गए थे। उसमें पहला चित्र  आचार्य सुश्रुत का था तथा उन्हें विश्व का पहला शल्य चिकित्सक बताया गया  था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भारतीय परम्परा में शल्य चिकित्सा का इतिहास बहुत प्राचीन है।  भारतीय चिकित्सा के देवता धन्वंतरि को शल्य क्रिया का भी जनक माना जाता  है। प्राचीनकाल में  इस क्षेत्र में हमारे देश के चिकित्सकों ने अच्छी  प्रगति की थी। अनेक ग्रंथ रचे गए। ऐसे ग्रंथों के रचनाकारों में सुश्रुत,  पुष्कलावत, गोपरक्षित, भोज, विदेह, निमि, कंकायन, गार्ग्य, गालव, जीवक,  पर्वतक, हिरण्याक्ष, कश्यप आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इन रचनाकारों  के अलावा अनेक प्राचीन ग्रंथों से इस क्षेत्र में भारतीयों की प्रगति का  ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में दिल, पेट तथा वृक्कों के विकारों का विवरण  है। इसी तरह शरीर में नवद्वारों तथा दस छिद्रों का विवरण दिया गया है।  वैदिक काल के शल्य चिकित्सक मस्तिष्क की शल्य क्रिया में निपुण थे। ऋग्वेद  (८-८६-२) के अनुसार जब विमना और विश्वक ऋषि उद्भ्रान्त हो गए थे, तब शल्य  क्रिया द्वारा उनका रोग दूर किया गया। इसी ग्रंथ में नार्षद ऋषि का भी  विवरण है। जब वे पूर्ण रूप से बधिर हो गए तब अश्विनी कुमारों ने उपचार करके  उनकी श्रवण शक्ति वापस लौटा दी थी। नेत्र जैसे कोमल अंग की चिकित्सा  तत्कालीन चिकित्सक कुशलता से कर लेते थे। ऋग्वेद (१-११६-११) में शल्य  क्रिया द्वारा वन्दन ऋषि की ज्योति वापस लाने का उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शल्य क्रिया के क्षेत्र में बौद्ध काल में भी तीव्र गति से प्रगति  हुई। ‘विनय पिटक‘ के अनुसार राजगृह के एक श्रेष्ठी के सर में कीड़े पड़ गए  थे। तब वैद्यराज जीवक ने शल्य क्रिया से न केवल वे कीड़े निकाले बल्कि इससे  बने घावों को ठीक करने के लिए उन पर औषधि का लेप किया था। हमारे पुराणों  में भी शल्य क्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई। ‘शिव पुराण‘ के  अनुसार जब शिव जी ने दक्ष का सर काट दिया था तब अश्विनी कुमारों ने उनको  नया सर लगाया था। इसी तरह गणेश जी का मस्तक कट जाने पर उनके धड़ पर हाथी का  सर जोड़ा गया था। ‘रामायण‘ तथा ‘महाभारत‘ में भी ऐसे कुछ उदाहरण मिलते हैं।  ‘रामायण‘ में एक स्थान पर कहा है कि ‘याजमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना  ददौ।‘ अर्थात्‌ आवश्यकता पड़ने पर एक मनुष्य की आंख निकालकर दूसरे को लगा दी  जाती थी। (बा.रा.-२-१६-५) ‘महाभारत‘ के सभा पर्व में युधिष्ठिर व नारद के  संवाद से शल्य चिकित्सा के ८ अंगों का परिचय मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैद्य सबल सिंह भाटी कहते हैं कि सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा  का प्रशिक्षण गुरुशिष्य परम्परा के माध्यम से दिया जाता था। मुर्दों तथा  पुतलों का विच्छेदन करके व्यावहारिक ज्ञान दिया जाता था। प्रशिक्षित  शल्यज्ञ विभिन्न उपकरणों तथा अग्नि के माध्यम से तमाम क्रियाएं सम्पन्न  करते थे। जरूरत पड़ने पर रोगी को खून भी चढ़ाया जाता था। इसके लिए तेज धार  वाले उपकरण शिरावेध का उपयोग होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठ प्रकार की शल्य क्रियाएं- सुश्रुत द्वारा वर्णित शल्य क्रियाओं  के नाम इस प्रकार हैं (१) छेद्य (छेदन हेतु) (२) भेद्य (भेदन हेतु) (३)  लेख्य (अलग करने हेतु) (४) वेध्य (शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के  लिए) (५) ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए) (६) अहार्य (हानिकारक  उत्पत्तियों को निकालने के लिए) (७) विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए) (८)  सीव्य (घाव सिलने के लिए)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुश्रुत संहिता में शस्त्र क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों  (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। आजकल  की शल्य क्रिया में ‘फौरसेप्स‘ तथा ‘संदस‘ यंत्र फौरसेप्स तथा टोंग से  मिलते-जुलते हैं। सुश्रुत के महान ग्रन्थ में २४ प्रकार के स्वास्तिकों, २  प्रकार के संदसों, २८ प्रकार की शलाकाओं तथा २० प्रकार की नाड़ियों (नलिका)  का उल्लेख हुआ है। इनके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक अंग की शस्त्र-क्रिया के  लिए बीस प्रकार के शस्त्रों (उपकरणों) का भी वर्णन किया गया है। पूर्व में  जिन आठ प्रकार की शल्य क्रियाओं का संदर्भ आया है, वे विभिन्न साधनों व  उपकरणों से की जाती थीं। उपकरणों (शस्त्रों) के नाम इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्द्धआधार, अतिमुख, अरा, बदिशा, दंत शंकु, एषणी, कर-पत्र,  कृतारिका, कुथारिका, कुश-पात्र, मण्डलाग्र, मुद्रिका, नख शस्त्र, शरारिमुख,  सूचि, त्रिकुर्चकर, उत्पल पत्र, वृध-पत्र, वृहिमुख तथा वेतस-पत्र।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व सुश्रुत ने सर्वोत्कृष्ट  इस्पात के उपकरण बनाये जाने की आवश्यकता बताई। आचार्य ने इस पर भी बल दिया  है कि उपकरण तेज धार वाले हों तथा इतने पैने कि उनसे बाल को भी दो हिस्सों  में काटा जा सके। शल्यक्रिया से पहले व बाद में वातावरण व उपकरणों की  शुद्धता (रोग-प्रतिरोधी वातावरण) पर सुश्रुत ने इतना जोर दिया है तथा इसके  लिए ऐसे साधनों का वर्णन किया है कि आज के शल्य चिकित्सक भी दंग रह जाएं।  शल्य चिकित्सा (सर्जरी) से पहले रोगी को संज्ञा-शून्य करने (एनेस्थेशिया)  की विधि व इसकी आवश्यकता भी बताई गई है। ‘भोज प्रबंध‘ (९२७ ईस्वी) में  बताया गया है कि राजा भोज को कपाल की शल्य-क्रिया के पूर्व ‘सम्मोहिनी‘  नामक चूर्ण सुंघाकर अचेत किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौदह प्रकार की पट्टियां- इन उपकरणों के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर  बांस, स्फटिक तथा कुछ विशेष प्रकार के प्रस्तर खण्डों का उपयोग भी शल्य  क्रिया में किया जाता था। शल्य क्रिया के मर्मज्ञ महर्षि सुश्रुत ने १४  प्रकार की पट्टियों का विवरण किया है। उन्होंने हड्डियों के खिसकने के छह  प्रकारों तथा अस्थि-भंग के १२ प्रकारों की विवेचना की है। यही नहीं, उनके  ग्रंथ में कान संबंधी बीमारियों के २८ प्रकार तथा नेत्र-रोगों के २६ प्रकार  बताए गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुश्रुत संहिता में मनुष्य की आंतों में कर्कट रोग (कैंसर) के कारण  उत्पन्न हानिकर तन्तुओं (टिश्युओं) को शल्य क्रिया से हटा देने का विवरण  है। शल्यक्रिया द्वारा शिशु-जन्म (सीजेरियन) की विधियों का वर्णन किया गया  है। ‘न्यूरो-सर्जरी‘ अर्थात्‌ रोग-मुक्ति के लिए नाड़ियों पर शल्य-क्रिया का  उल्लेख है तथा आधुनिक काल की सर्वाधिक पेचीदी क्रिया ‘प्लास्टिक सर्जरी‘  का सविस्तार वर्णन सुश्रुत के ग्रन्थ में है। आधुनिकतम विधियों का भी  उल्लेख इसमें है। कई विधियां तो ऐसी भी हैं जिनके सम्बंध में आज का  चिकित्सा शास्त्र भी अनभिज्ञ है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन  भारत में शल्य क्रिया अत्यंत उन्नत अवस्था में थी, जबकि शेष विश्व इस  विद्या से बिल्कुल अनभिज्ञ था।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;(क्रमश:)&lt;/span&gt; &lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-5952577171127023512?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/5952577171127023512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/5952577171127023512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3075.html' title='स्वास्थ्य विज्ञान -२ : सर्जरी के सर्जक हम ही हैं!'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-2719994774691275941</id><published>2010-06-03T15:10:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:11:28.748+05:30</updated><title type='text'>स्वास्थ्य विज्ञान -१  त्रिदोष का महत्व</title><content type='html'>&lt;div id=":20" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; एक बार प्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक पं. शिव शर्मा से एक ऐलौपैथी चिकित्सक  ने प्रश्न किया, ‘आयुर्वेद और एलोपैथी में क्या अंतर है?‘ इस प्रश्न के  उत्तर में पं. शिव शर्मा ने कहा, ‘जब आपके क्लीनिक में कोई व्यक्ति आता है  तो कहते हैं एक पेशेन्ट (रोगी) आया है। परन्तु वास्तव में उसका अर्थ है ठ्ठ  द्यदृद्वदढ़ड्ढ, ठ्ठद ड्ढठ्ठद्ध, ठ्ठ ददृद्मड्ढ, ठ्ठ द्मद्यदृथ्र्ठ्ठड़ण्‌,  ठ्ठ ण्ठ्ठदड्ड, ठ्ठ थ्ड्ढढ़ यानी एक अंग आता है। जबकि वैद्य के पास कोई रोगी  आता है तो वह व्यक्ति, उसका आहार-विहार, पृष्ठभूमि सब आता है।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वार्तालाप स्वास्थ्य विज्ञान का विचार करते समय भारतीय एवं  पाश्चात्य दृष्टि के अन्तर को स्पष्ट करता है। हमारे यहां स्वास्थ्य का  विचार करते समय मात्र शरीर ही नहीं अपितु स्वास्थ्य के साथ विचार, भावना,  जलवायु, परिवेश आदि सबका विचार किया गया। मनुष्य को दु:ख दोनों प्रकार का  होता है। शरीर में भी रोग होते हैं तथा मन में भी। अत: रोगों का विभाजन  किया गया- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) आधि- मन के रोग&lt;br /&gt;(२) व्याधि-शरीर के रोग &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वास्थ्य का विचार करते समय मात्र शरीर के धरातल पर सोचने से काम  नहीं चलेगा, अपितु अनेक स्तरों पर विचार करना पड़ेगा। योग वाशिष्ठ में रोगों  का विश्लेषण करते हुए महर्षि वशिष्ठ श्रीराम से कहते हैं- रोगों के दो  प्रकार होते हैं, एक आधीज है तथा दूसरे अनाधिज। आधीज रोगों के भी दो प्रकार  होते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) सामान्य-वे रोग जो दुनिया से दैनिक व्यवहार करते समय जो  बार-बार तनाव उत्पन्न होता है, उस तनाव के परिणामस्वरूप पैदा होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) सार-यानी जिसमें से सभी को गुजरना है, किसी को छूट नहीं है,  जैसे जन्म एवं मृत्यु।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनाधिज-वे रोग अनाधिज कहलाते हैं जो किसी मानसिक तनाव में उत्पन्न  नहीं होते, जैसे चोट (क्ष्दत्र्द्वद्धन्र्‌) संक्रमण (क्ष्दढड्ढड़द्यत्दृद,  च्र्दृन्त्दद्म), यह दवा के माध्यम से ठीक होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीराम के प्रश्न करने पर कि आधीज व्याधि में कैसे परिवर्तित होती  है। इसका उत्तर देते हुए महर्षि वशिष्ठ कहते हैं, ‘मनुष्य के मन में अनेक  लालसाएं, वासनायें रहती हैं, इनकी पूर्ति न होने पर मन क्षुब्ध होता है। मन  के क्षुब्ध होने से प्राण क्षुब्ध होता है। यह क्षु◌ुब्ध प्राण नाड़ी तंत्र  में असंयम रूप से प्रवाहित होता है, जैसे कोई घायल पशु अस्त-व्यस्त भागता  है। प्राण के इस प्रकार के व्यवहार के कारण स्नायु मंडल अव्यवस्थित हो जाता  है और फिर शरीर में कुजीर्णत्व (ध्र्द्धदृदढ़ ड्डत्ढ़ड्ढद्मद्यत्दृद),  अजीर्णत्व (ग़्दृद ड्डत्ढ़ड्ढद्मद्यत्दृद) होता है और इस कारण कालान्तर में  शरीर में खराबी आ जाती है। इसे ही व्याधि कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) भावना तथा विचार की शुद्धि व नियमन हेतु विशेष रूप से योग  विज्ञान सहयोगी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) शरीर के स्तर पर चिकित्सा हेतु आयुर्वेद एवं अन्य पद्धतियां  विकसित हुएं। आयुर्वेद में शरीर रचना, रोगोत्पत्ति के कारण, उनके प्रकार,  रोगी परीक्षण, औषधि योजना, औषधि निर्माण, शल्य चिकित्सा आदि के द्वारा  मनुष्य को निरोगी व सुखी करने हेतु प्रयत्न किए गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिकित्सा विज्ञान के विकास का इतिहास भारत में काफी पुराना है। चरक  संहिता के अनुसार व्रह्मा ने प्रजापति को सर्वप्रथम आयुर्वेद का ज्ञान  दिया (सूत्र स्थान-१/४५) और उनसे अश्विनी कुमारों को प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराणों में अश्विनी कुमार देवताओं के चिकित्सक के रूप में  प्रसिद्ध हैं। चिकित्सा विज्ञान में उनके अनेक कार्य प्रसिद्ध रहे हैं,  जैसे यज्ञ में कटे अश्व के सिर को पुन: जोड़ा, पूषन्‌ के दांत टूटने पर नए  लगाये, च्यवन ऋषि की नष्ट हुई नेत्रज्योति पुन: वापस दिलायी, उनका वार्धक्य  दूर किया आदि। अश्विनी कुमार से इन्द्र को तथा उनसे भारद्वाज ऋषि, उनसे  आत्रेय पुनर्वास, उनके शिष्य अग्निवेश, भेल, हारीत आदि को यह ज्ञान प्राप्त  हुआ और आगे भी यह परम्परा चलती रही। इस परम्परा को दो भागों में विभाजित  किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) धन्वंतरि परम्परा (२) आत्रेय परम्परा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्रेय परम्परा में काय चिकित्सा की प्रधानता है तथा इस विषय के  प्रसिद्ध आचार्य चरक हुए, जिनकी ‘चरक संहिता‘ प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्वंतरि परम्परा में शल्य चिकित्सा की प्रधानता रही तथा इस विषय  के प्रसिद्ध आचार्य सुश्रुत की ‘सुश्रुत संहिता‘ प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिकित्सा विज्ञान का विचार करते समय शरीर शास्त्र, औषधि निर्माण,  औषधियों के प्रकार, गुण आदि का गहरा विचार किया गया। उसकी कुछ जानकारी नीचे  दी जा रही है। इससे ध्यान में आएगा कि जब पाश्चात्य देशों में इस बारे में  सोचना संभव नहीं था, हमारे यहां उस समय कितना सूक्ष्म विश्लेषणं किया गया  था। कुछ प्रमुख बातों की संक्षेप में जानकारी हम यहां दे रहे हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) स्वास्थ्य- चरक संहिता में स्वस्थ मनुष्य की दी गई परिभाषा  आधुनिक चिकित्सा शास्त्र से अधिक व्यापक तथा उपयुक्त है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समदोष: समाग्निश्च समधातुमलक्रिय:।&lt;br /&gt;प्रसन्नात्मेन्द्रियमना: स्वस्थो इत्यमिधीयते॥ -चरक संहिता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌-जिसका त्रिदोष (वात, कफ, पित्त), सप्त धातु, मल प्रवृत्ति  आदि क्रियाएं सन्तुलित अवस्था में हो, साथ ही आत्मा, इन्द्रिय एवं मन  प्रसन्न स्थिति में हो, वही स्वस्थ मनुष्य कहलाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) शरीर रचना में सुश्रुत संहिता में सुश्रुत शारीरे ५,६ के  अनुसार शरीर रचना में मुख्य बातें निम्न हैं:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्वचा- (च्त्त्त्द-७), कला- (च्द्वडद्मद्यद्धठ्ठद्यठ्ठ दृढ  द्यण्ड्ढ ड्ढथ्ड्ढथ्र्ड्ढदद्यद्म दृढ ण्द्वथ्र्ठ्ठद डदृड्डन्र्‌-७), आशया-  (ङड्ढड़त्द्रत्ड्ढदद्य ध्ड्ढद्मद्मड्ढथ्द्म-७), धातु - (च्ण्ड्र्ढ  घ्द्धत्थ्र्ठ्ठद्धन्र्‌ ढथ्द्वत्ड्डद्म, ख्द्वत्ड़ड्ढद्म ठ्ठदड्ड  त्दढ़द्धड्ढड्डत्ड्ढदद्यद्म दृढ द्यण्ड्ढ डदृड्डन्र्‌-७), शिरा-  (ठ्ठद्धद्यड्ढद्धत्ड्ढद्म-७००), पेशी- (ठ्ठ त्त्त्दड्ड दृढ  थ्र्द्वद्मड़थ्ड्ढद्म-५००), स्नायु- (द्यड्ढदड्डदृदद्म-९००), अस्थीनि-  (एदृदड्ढद्म-३००), संधिया-(ख्दृत्दद्यद्म-२१०), मर्म-  (ज्त्द्यठ्ठथ्द्म-१०७), धमनियां- (ध्ड्ढत्दद्म-२४), दोष-  (क़्त्द्मदृद्धड्डड्ढद्ध दृढ द्यण्द्धड्ढड्ढ ण्द्वथ्र्दृद्वद्धद्म-३), मल-  (क्ष्थ्र्द्रद्वद्धड्ढ द्मड्ढड़द्यद्धद्यत्दृदद्म-३), स्रोतांस-  (ग़्द्वद्यद्धत्थ्र्ड्ढदद्य ड़ठ्ठदठ्ठथ्द्म-९), कण्डरा- (च्त्दड्ढध्र्द्म-६),  जाल- (ज़्दृध्ड्ढद द्यड्ढन्द्यद्वद्धड्ढद्म-१६), कूर्चा-(एद्वदड्डथ्ड्ढद्म  दृढ थ्र्द्वद्मड़द्वथ्ठ्ठद्ध डदृदड्ढद्म-१६), रज्जव- (ख्र्दृदढ़  द्धदृद्रड्ढ-४), शेवन्य - (च्द्यत्द्यड़ण्‌ थ्त्त्त्ड्ढ  ढदृद्धथ्र्ठ्ठद्यत्दृदद्म-७), संघात- (क्दृथ्थ्ड्ढड़द्यत्दृदद्म दृढ  डदृदड्ढद्म-१४), सीमन्त-(द्रठ्ठद्यत्दढ़ थ्त्दड्ढद्म-१४), योगवह स्रोतांसि-  (च्द्रड्ढड़त्ठ्ठथ्‌ ड़ठ्ठदठ्ठथ्द्म-२२) आंत्र-  (क्ष्दद्यड्ढद्मद्यत्दड्ढद्म-२)&lt;wbr&gt;, रोमकूप- (क्तठ्ठत्द्ध द्रदृद्धड्ढद्म  दृढ  द्यण्ड्ढ च्त्त्त्द ३१/२ क्द्धदृद्धड्ढ)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) हृदय के कार्य- हृदय के संबंध में पश्चिमी देशों का ज्ञान बहुत  अर्वाचीन काल का है। विलियम हार्वे नामक व्रिटिश वैज्ञानिक ने सन्‌ १६२८  में अपने प्रयोगों से यह प्रतिपादित किया था कि रक्त का पहुंचना हृदय के  लिए आवश्यक है। परन्तु वह यह नहीं बता सका कि रक्त कैसे पहुंचता है। कुछ  वर्षों बाद सन्‌ १६६९ में इटालियन वैज्ञानिक मार्शेलों मल्फीगी ने उस  प्रक्रिया को उद्घाटित किया, जिससे रक्त हृदय में पहुंचता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परन्तु भारत में ७ हजार से अधिक वर्षों पूर्व ‘शतपथ व्राह्मण‘ में  हृदय के द्वारा होने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया का वर्णन मिलता है। उसमें कहा  गया है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरतेर्दतातेरयतेर्हृदय शब्द:- निरुक्त&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌-लेना, देना तथा घुमाना इन तीन क्रियाओं को हृदय शब्द  अभिव्यक्त करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हृ (हरणे) उ द्यदृ द्धड्ढड़ड्ढत्ध्ड्ढ, द (दाने) उ द्यदृ  घ्द्धदृद्रड्ढथ्‌ य (इण-गतौ)। द्यदृ क्त्द्धड़द्वथ्ठ्ठद्यड्ढ उ हृदयम्‌-शतपथ  व्राह्मणम्‌ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार से नाड़ी ज्ञानम्‌ ग्रंथ में लिखा है-&lt;br /&gt;तत्संकोचं च विकासं च स्वत: कुर्यात्पुन: पुन: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌-हृदय स्वयं ही संकोच और फैलाव की क्रिया बारम्बार करता  रहेगा। एक-दूसरे ग्रंथ भेल संहिता में वर्णन आता है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हृदो रसो निस्सरित तस्मादेति च सर्वश:।&lt;br /&gt;सिराभिर्हृदयं वैति तस्मात्तत्प्रभवा: सिरा:॥ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌- हृदय से रक्त निकलता है, वहां से ही शरीर के सभी भागों  में जाता है, रक्त नलिकाओं के द्वारा हृदय को जाता है, रक्त नलिका भी उसी  से बनी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) रोग के कारण- आयुर्वेद में रोग निदान तथा चिकित्सा का आधार  त्रिदोष सिद्धांत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वात, पित्त और कफ जब संतुलित रहते हैं तो शरीर स्वस्थ रहता है। जब  असंतुलित होते हैं तो रोग का कारण बनते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह त्रिदोष समग्र शरीर में व्याप्त रहते हैं तथापि शरीर में कुछ  विशेष स्थान पर ये ज्यादा रहते हैं। क्रिया के आधार पर प्रत्येक दोष के  पांच भाग किए गये हैं और उनका परिणाम भी बताया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-वात - यह पांच प्रकार के कार्य करता है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) प्राण - मुख्यत: श्वासोच्छवास प्रवर्तक (२) उदान-मुख्यत:  वाक्प्रवर्तक (३) व्यान- शरीर रसों का वाहक (४) समान- अन्नपाचन आदि (५)  अपान-मल मूत्रादि विसर्जन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पित्त :- इसके भी पांच कार्य हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) पाचक- अन्न पाचन, सार का विभाजन तथा शरीर उष्णता, (२) रंजक-  अन्न रस का रक्त वर्ण कर रक्त के रूप में परिणत करने वाले (३) साधक-बुद्धि  और मेधावर्धक, (४) आलोचक- दृष्टि में सहायक, (५) भ्राजक-वर्ण प्रसाधनकर्ता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कफ:- इसके भी पांच कार्य हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) अवलम्बक-शक्ति और ऊर्जा प्रदाता, (२) क्लेदक- अन्न क्लेदन  कर्ता, (३) बोधक-रुचि का बोध कराने वाला, (४) तर्पक-नेत्र और ज्ञानेद्रियों  का नियंत्रक, (५) श्लेषक-सन्धि स्नेहन कर्ता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोग निवृत्ति हेतु दी जाने वाली वस्तु, वह चाहे प्राणी जन्य हो,  वनस्पति हो या खनिज जन्य हो, सबसे रस गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव-ये पांच  तत्व माने गए हैं और इनमें से प्रत्येक का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।  अन्न के शरीर में पाचन तथा विलयन कर रस बनता है जो आगे चलकर रक्त, मांस,  मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र आदि सप्त धातुओं में परिवर्तित होता है।  प्रत्येक धातु का शरीर में विलय या विसर्जन तीन रूप में होता है-स्थूल,  सूक्ष्म और मल। इससे शरीर धीरे-धीरे विकसित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस  सम्पूर्ण प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन चरक संहिता और सुश्रुत  संहिता में मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयुर्वेद चिकित्सा दो प्रकार से की जाती थी-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अ) शोधन-पंचकर्म द्वारा, ये निम्न हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(वमन)- मुंह से उल्टी करके दोष दूर करना, (२) विरेचन-मुख्यत: गुदा  मार्ग से दोष निकालना, बस्ति (एनीमा)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) रक्तमोक्षण-जहरीली कोई चीज काटने पर या शरीर में खराब रक्त  कहीं हो, तो उसे निकालना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५) नस्य- नाक द्वारा स्निग्ध चीज देना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ब) शमन- औषधि द्वारा चिकित्सा, इसकी परिधि बहुत व्याप्त थी। आठ  प्रकार की चिकित्साएं बताई हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;(क्रमश:) &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-2719994774691275941?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2719994774691275941'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2719994774691275941'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3095.html' title='स्वास्थ्य विज्ञान -१  त्रिदोष का महत्व'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-6886570785677986930</id><published>2010-06-03T15:09:00.001+05:30</published><updated>2010-06-03T15:09:42.657+05:30</updated><title type='text'>प्राणि विज्ञान का गूढ़ ज्ञान</title><content type='html'>&lt;div id=":24" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt; &lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; भारतीय परम्परा के अनुसार सृष्टि में जीवन का विकास क्रमिक रूप से हुआ है।  इसकी अभिव्यक्ति अनेक ग्रंथों में हुई है। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णन  आता है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्तया&lt;br /&gt;वृक्षान्‌ सरीसृपपशून्‌ खगदंशमत्स्यान्‌।&lt;br /&gt;तैस्तैर अतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय&lt;br /&gt;व्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव:॥ ११-९-२८ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व की मूलभूत शक्ति सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त हुई। इस क्रम  में वृक्ष, सरीसृप, पशु, पक्षी, कीड़े, मकोड़े, मत्स्य आदि अनेक रूपों में  सृजन हुआ। परन्तु उससे उस चेतना को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हुई, अत: मनुष्य  का निर्माण हुआ जो उस मूल तत्व का साक्षात्कार कर सकता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्राणियों का प्राचीन भारतीय वर्गीकरण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात, भारतीय परम्परा में जीवन के प्रारंभ से मानव तक की यात्रा  में ८४ लाख योनियों (द्मद्रड्ढड़त्ड्ढद्म) के बारे में कहा गया। आधुनिक  विज्ञान भी मानता है कि अमीबा से लेकर मानव तक की यात्रा में चेतना १ करोड़  ४४ लाख योनियों से गुजरी है। आज से हजारों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने यह  साक्षात्कार किया, यह आश्चर्यजनक है। अनेक आचार्यों ने इन ८४ लाख योनियों  का वर्गीकरण किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्त प्राणियों को दो भागों में बांटा गया है, योनिज तथा आयोनिज।  दो के संयोग से उत्पन्न या अपने आप ही अमीबा की तरह विकसित होने वाले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त स्थूल रूप से प्राणियों को तीन भागों में बांटा  गया:- &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;जलचर - जल में रहने वाले सभी प्राणी।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;थलचर  - पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी प्राणी।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;नभचर -  आकाश में विहार करने वाले सभी प्राणी।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; इसके अतिरिक्त प्राणियों की उत्पत्ति के आधार पर ८४ लाख योनियों को चार  प्रकार में वर्गीकृत किया गया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;जरायुज - माता के गर्भ से जन्म लेने वाले  मनुष्य, पशु जरायुज कहलाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;अण्डज - अण्डों से  उत्पन्न होने वाले प्राणी  अण्डज कहलाये।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;स्वदेज- मल, मूत्र, पसीना आदि से  उत्पन्न  क्षुद्र जन्तु स्वेदज कहलाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span&gt;उदि्भज- पृथ्वी से  उत्पन्न प्राणियों को  उदि्भज वर्ग में शामिल किया गया।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; बृहत्‌ विष्णु पुराण में संख्या के आधार पर विविध योनियों का वर्गीकरण किया  गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थावर - २० लाख प्रकार&lt;br /&gt;जलज - ९ लाख प्रकार&lt;br /&gt;कूर्म- भूमि व जल दोनों जगह गति ऐ ९ लाख प्रकार&lt;br /&gt;पक्षी- १० लाख प्रकार&lt;br /&gt;पशु- ३० लाख प्रकार&lt;br /&gt;वानर - ४ लाख प्रकार&lt;br /&gt;शेष मानव योनि में। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें एक-एक योनि का भी विस्तार से विचार हुआ। पशुओं को साधारणत:  दो भागों में बांटा (१) पालतू (२) जंगली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार शरीर रचना के आधार पर भी वर्गीकरण हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका उल्लेख विभिन्न आचार्यों के वर्गीकरण के सहारे ‘प्राचीन भारत  में विज्ञान और शिल्प‘ ग्रंथ में किया गया है। इसके अनुसार (१) एक शफ (एक  खुर वाले पशु) - खर (गधा), अश्व (घोड़ा), अश्वतर (खच्चर), गौर (एक प्रकार की  भैंस), हिरण इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) द्विशफ (दो खुल वाले पशु)- गाय, बकरी, भैंस, कृष्ण मृग आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) पंच अंगुल (पांच अंगुली) नखों (पंजों) वाले पशु- सिंह,  व्याघ्र, गज, भालू, श्वान (कुत्ता), श्रृगाल आदि। (प्राचीन भारत में  विज्ञान और शिल्प-पृ. सं. १०७-११०)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डा. विद्याधर शर्मा ‘गुलेरी‘ अपने ग्रंथ ‘संस्कृत में विज्ञान‘ में  चरक द्वारा किए गए प्राणियों के वर्गीकरण के बारे में    बताते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चरक का वर्गीकरण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;चरक ने भी प्राणियों को उनके जन्म के अनुसार जरायुज, अण्डज, स्वेदज और  उदि्भज वर्गों में विभाजित किया है (चरक संहिता, सूत्रस्थान, २७/३५-५४)  उन्होंने प्राणियों के आहार-विहार के आधार पर भी निम्न प्रकार से वर्गीकरण  किया है- &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;ol&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;१. प्रसह- जो बलात्‌ छीनकर  खाते हैं। इस वर्ग में गौ, गदहा, खच्चर, ऊंट, घोड़ा, चीता, सिंह, रीछ,  वानर, भेड़िया, व्याघ्र, पर्वतों के पास रहने वाले बहुत बालों वाले कुत्ते,  बभ्रु, मार्जार, कुत्ता, चूहा, लोमड़ी, गीदड़, बाघ, बाज, कौवा, शशघ्री (ऐसे  पक्षी जो शशक को भी अपने पंजों में पकड़ कर उठा ले जाते हैं) चील, भास,  गिद्ध, उल्लू, सामान्य घरेलू चिड़िया (गौरेया), कुरर (वह पक्षी जो जल स्थित  मछली को अपने नख से भेद कर उड़ा ले जाता है।)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;भूमिशय-बिलों में रहने  वाले जन्तु-सर्प (श्वेत-श्यामवर्ण का) चित्रपृष्ठ (जिसकी पृष्ठ चित्रित  होती है), काकुली मृग-एक विशेष प्रकार का सर्प- मालुयासर्प, मण्डूक (मेंढक)  गोह, सेह, गण्डक, कदली (व्याघ्र के आकार की बड़ी बिल्ली), नकुल (नेवला),  श्वावित्‌ (सेह का भेद), चूहा आदि।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;अनूपदेश  के पशु-अर्थात्‌  जल प्रधान देश में रहने वाले प्राणी। इन में सूकर (महा शूकर), चमर (जिनकी  पूंछ चंवर बनाने के काम आती है), गैण्डा, महिष (जंगली भैंसा), नीलगाय,  हाथी, हिरण , वराह (सुअर) बारहसिंगा- बहुत सिंगों वाले हिरण सम्मिलित हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;वारिशय-जल में रहने वाले  जन्तु-कछुआ, केकड़ा, मछली, शिशुमार (घड़ियाल, नक्र की एक जाति) पक्षी। हंस,   तिमिंगिल, शुक्ति (सीप का कीड़ा), शंख, ऊदबिलाव, कुम्भीर (घड़ियाल), मकर  (मगरमच्छ) आदि।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;वारिचारी-जल  में संचार  करने वाले पक्षी - हंस क्रौञ्च, बलाका, बगुला, कारण्डव (एक प्रकार का हंस),  प्लव, शरारी, केशरी, मानतुण्डका, मृणालण्ठ, मद्गु (जलकाक), कादम्ब  (कलहंस), काकतुण्डका (श्वेत कारण्डव-हंस की जाति) उत्क्रोश (कुरर पक्षी की  जाति) पुण्डरीकाक्ष, चातक, जलमुर्गा, नन्दी मुखी, समुख, सहचारी, रोहिणी,  सारस, चकवा आदि।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;जांगल पशु-  स्थल पर  उत्पन्न होने वाले तथा जंगल में संचार करने वाले पशु- चीतल, हिरण, शरभ (ऊंट  के सदृश बड़ा और आठ पैर वाला, जिसमें चार पैर पीठ पर होते हैं-ऐसा मृग),  चारुष्क (हरिण की जाति) लाल वर्ण का हरिण, एण (काला हिरण) शम्बर (हिरण भेद)  वरपोत (मृग भेद), ऋष्य आदि जंगली मृग।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;विष्किर पक्षी-जो अपनी  चोंच और पैरों से इधर-उधर बिखेर कर खाते हैं, वे विष्किर पक्षी हैं। इनमें  लावा (बटेर), तीतर, श्वेत तीतर, चकोर, उपचक्र (चकोर का एक भेद), लाल वर्ग  का कुक्कुभ (कुको), वर्तक, वर्तिका, मोर, मुर्गा, कंक, गिरिवर्तक, गोनर्द,  क्रनर और बारट आदि।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;प्रतुद  पक्षी-जो चोंच या  पंजों से बार-बार चोट लगाकर आहार को खाते हैं। कठफोड़ा भृंगराज (कृष्णवर्ण  का पक्षी विशेष), जीवंजीवक, (विष को देखने से ही इस पक्षी की मृत्यु हो  जाती है), कोकिल, कैरात (कोकिक का भेद), गोपपुत्र- प्रियात्मज, लट्वा,  बभ्रु, वटहा, डिण्डिमानक, जटायु, लौहपृष्ठ, बया, कपोत (घुग्घु), तोता,  सारंग (चातक), शिरटी, शरिका (मैना) कलविंक (गृहचटक अथवा लाल सिर और काली  गर्दन वाली गृहचटक सदृश चिड़ियां), चटक, बुलबुल, कबूतर आदि।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;  &lt;span&gt; उपर्युक्त वर्गीकरण के साथ चरक ने इन प्राणियों की मांस और उसके उपयोग के  साथ ही बात, पित्त और कफ पर उसके प्रभाव की भी विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की  है। चकोर, मुर्गी, मोर, बया और चिड़ियों के अंडों की भी आहार के रूप में  चर्चा की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही सुश्रुत की सुश्रुत संहिता, पाणिनि के अष्टाध्यायी, पतञ्जलि  के महाभाष्य, अमर सिंह के अमरकोष, दर्शन के प्रशस्तपादभाष्य आदि ग्रंथों  में प्राणियों के वर्गीकरण के विस्तृत विवरण मिलते हैं। (प्राचीन भारत में  विज्ञान और शिल्प-पृ.सं.११५-११७) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पशु-चिकित्सा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पुराणों के अन्य विषयों के साथ-साथ पशु-चिकित्सा के विषय में भी उल्लेख  मिलते हैं। अश्वों की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद का एक अलग विभाग था। इसका  ‘शालिहोत्र‘ नाम रखा गया। अश्वों के सामान्य परिचय, उनके चलने के प्रकार,  उनके रोग और उपचार आदि विषय पुराणों में वर्णित हैं। अग्निपुराण में  अश्वचालन और अश्वचिकित्सा का विस्तृत विवरण है। गजचिकित्सा के साथ ही  गजशान्ति के उपाय भी बताये गए हैं। गरुड़पुराण में भी पालकाप्य ऋषि के  हस्तिविद्या विषयक ग्रन्थ का उल्लेख है। अग्निपुराण में गायों की चिकित्सा  का विस्तृत विवरण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शालिहोत्र संहिता में अश्वचिकित्सा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मानव चिकित्सा क्षेत्र में चरक संहिता और सुश्रुतसंहिता जितनी  महत्वपूर्ण हैं, अश्वचिकित्सा क्षेत्र में शालिहोत्र संहिता उतनी ही  महत्वपूर्ण है। शालिहोत्र का काल ई।पू. लगभग ८०० वर्ष आंका जा सकता है।  उनकी संहिता ‘हय आयुर्वेद‘ एवं ‘तुरगशास्त्र‘ के नाम से भी प्रसिद्ध रही  है। मूल ग्रन्थ में १२,००० श्लोकों का समावेश है। यह आठ भागों में विभक्त  था। इस ग्रन्थ के कुछ ही भाग अब उपलब्ध हैं। इसमें अश्वों के लक्षण, उनके  सभी रोग और उनके निदान, चिकित्सा, औषधियों और उनके स्वास्थ्य रक्षण के  विचार विस्तार से बताए गए हैं। इस संहिता का अनुवाद अरबी, फारसी, तिब्बती  एवं अंग्रेजी भाषाओं में किया गया है। पशुचिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह  अश्व चिकित्सा के आधुनिक ग्रन्थ से भी उत्कृष्ट ग्रन्थ है। (प्राचीन भारत  में विज्ञान शिल्प- पृ. सं. १२५-१२६)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-6886570785677986930?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/6886570785677986930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/6886570785677986930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5106.html' title='प्राणि विज्ञान का गूढ़ ज्ञान'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-1003130264953695012</id><published>2010-06-03T15:08:00.001+05:30</published><updated>2010-06-03T15:08:51.684+05:30</updated><title type='text'>कृषि में हमेशा ही अग्रणी रहा है भारत</title><content type='html'>&lt;div id=":28" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय में एक वाक्य लिखा है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हल की नोक से खींची रेखा मानव इतिहास में जंगलीपन और सभ्यता के  बीच की विभाजक रेखा है।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में कृषि का गौरवपूर्ण उल्लेख  मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित्‌ कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमान:।  ऋग्वेद- ३४-१३&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ जुआ मत खेलो, कृषि करो और सम्मान के साथ धन पाओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(कृषि पाराशर-श्लोक-८)&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ कृषि सम्पत्ति और मेधा प्रदान करती है और कृषि ही मानव  जीवन का आधार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैदिक काल में ही बीजवपन, कटाई आदि क्रियाएं, हल, हंसिया, चलनी आदि  उपकरण तथा गेहूं, धान, जौ आदि अनेक धान्यों का उत्पादन होता था। चक्रीय  परती के द्वारा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की परम्परा के निर्माण का श्रेय उस  समय के कृषकों को जाता है। यूरोपीय वनस्पति विज्ञान के जनक रोम्सबर्ग के  अनुसार इस पद्धति को पश्चिम ने बाद के दिनों में अपनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौटिल्य अर्थशास्त्र में मौर्य राजाओं के काल में कृषि, कृषि  उत्पादन आदि को बढ़ावा देने हेतु कृषि अधिकारी की नियुक्ति का वर्णन मिलता  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि हेतु सिंचाई की व्यवस्था विकसित की गई। यूनानी यात्री  मेगस्थनीज ने लिखा है कि मुख्य नाले और उसकी शाखाओं में जल के समान वितरण  को निश्चित करने व नदी और कुओं के निरीक्षण के लिए राजा द्वारा अधिकारियों  की नियुक्ति की जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि के संदर्भ में नारदस्मृति, विष्णु धर्मोत्तर, अग्नि पुराण आदि  में उल्लेख मिलते हैं। कृषि पाराशर, कृषि के संदर्भ में एक संदर्भ ग्रंथ  बन गया। इस ग्रंथ में कुछ विशेष बातें कृषि के संदर्भ में कही गई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुताई- इसमें कितने क्षेत्र की जुताई करना, उस हेतु हल, उसके अंक  आदि का वर्णन है। इसी प्रकार जोतने वाले बैल, उनका रंग, प्रकृति तथा कृषि  कार्य करवाते समय उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखने का वर्णन भी इस ग्रंथ  में मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्षा के बारे में भविष्यवाणी- प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण,  ग्रहों की गति तथा प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का गहरा अभ्यास  प्राचीन काल के व्यक्तियों ने किया था, उसी आधार पर वे वर्षा की  भविष्यवाणियां करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस वर्ष में जो ग्रह प्रमुखता में रहेगा उस आधार पर क्या-क्या  परिणाम होते हैं, इसका वर्णन करते हुए पाराशर ऋषि कहते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जिस वर्ष सूर्य अधिपति होगा उस वर्ष में वर्षा कम होगी और मानवों  को कष्ट सहन करना पड़ेगा। जिस वर्ष का अधिपति चन्द्र होगा, उस वर्ष अच्छी  वर्षा और वनस्पति की वृद्धि होगी। लोग स्वस्थ रहेंगे। उसी प्रकार बुध,  बृहस्पति और शुक्र की वर्षाधिपति होने पर भी स्थिति ठीक रहेगी। परन्तु जिस  वर्ष शनि वर्षाधिपति होगा, हर जगह विपत्ति होगी।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुताई का समय-नक्षत्र तथा काल के निरीक्षण के आधार पर जुताई के लिए  कौन-सा समय उपयुक्त रहेगा, इसका निर्धारण उन्होंने किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजवपन- उत्तम बीज संग्रह हेतु पाराशर ऋषि, गर्ग ऋषि का मत प्रकट  करते हुए कहते हैं कि बीज को माघ (जनवरी-फरवरी) या फाल्गुन (फरवरी-मार्च)  माह में संग्रहित करके धूप में सुखाना चाहिए तथा उन बीजों को बाद में अच्छी  और सुरक्षित जगह रखना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्षा मापन- ‘कृषि पाराशर‘ में वर्षा को मापने का भी वर्णन मिलता  है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अथ जलाढक निर्णय:&lt;br /&gt;शतयोजनविस्तीर्णं त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितम्‌।&lt;br /&gt;अढकस्य भवेन्मानं मुनिभि: परिकीर्तितम्‌॥&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(कृषि पाराशर)&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌- पूर्व में ऋषियों ने वर्षा को मापने का पैमाना तय किया  है। अढक यानी सौ योजन विस्तीर्ण तथा ३०० योजन ऊंचाई में वर्षा के पानी की  मात्रा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योजन उ १ अंगुली की चौड़ाई&lt;br /&gt;१ द्रोण उ ४ अढक उ ६.४ से.मी.&lt;br /&gt;आजकल का वर्षा मापन भी इतना ही आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौटिल्य के अर्थशास्त्र में द्रोण के आधार पर वर्षा मापने का  उल्लेख तथा देश में कहां-कहां कितनी वर्षा होती है, इसका भी उल्लेख मिलता  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोपण (ग्राफ्टिंग)- वराहमिहिर अपनी बृहत्‌ संहिता में उपरोपण की  दो विधियां बताते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थ् जड़ से पेड़ को काटना और दूसरे को तने (द्यद्धद्वदत्त्) से काटकर  सन्निविष्ट (क्ष्दद्मड्ढद्धद्य) करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थ् क्ष्दद्मड्ढद्धद्यत्दढ़ द्यण्ड्ढ ड़द्वद्यद्यत्दढ़ दृढ ठ्ठ  द्यद्धड्ढड्ढ त्दद्यदृ द्यण्ड्ढ द्मद्यड्ढथ्र् दृढ ठ्ठददृद्यण्ड्ढद्ध जहां  दोनों जुड़ेंगे, वहां मिट्टी और गोबर से उनको बंद कर आच्छादित करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी के साथ वराहमिहिर किस मौसम में किस प्रकार के पौधे की उपरोपण  (ग्राफ्टिंग) करना, इसका भी उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशिर ऋतु (फरवरी-मार्च) में उन पौधों का उपरोपण करना चाहिए जिनकी  शाखाएं नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेमन्त ऋतु (दिसम्बर-जनवरी) तथा शरद ऋतु (अगस्त-सितम्बर) में उनका  उपरोपण करना चाहिए जिनकी शाखाएं बहुत हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस मौसम में कितना पानी प्रतिरोपण किए पौधों को देना, इसका उल्लेख  करते हुए वराहमिहिर कहते हैं ‘गरमी में प्रतिरोपण किए पौधे को प्रतिदिन  सुबह तथा शाम को पानी दिया जाए। शीत ऋतु में एक दिन छोड़कर तथा वर्षाकाल में  जब-जब मिट्टी सूखी हो।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन काल से भारत में कृषि एक  विज्ञान के रूप में विकसित हुई। जिसके कारण हजारों वर्ष बीतने के बाद भी  हमारे यहां भूमि की उर्वरा शक्ति अक्षुण्ण बनी रही, जबकि कुछ दशाब्दियों  में ही अमरीका में लाखों हेक्टेयर भूमि बंजर हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय कृषि पद्धति की विशेषता एवं इसके उपकरणों का जो  प्रशंसापूर्ण उल्लेख अंग्रेजों द्वारा किया गया, उसका उल्लेख श्री धर्मपाल  की पुस्तक ‘इन्डियन साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी इन दी एटीन्थ सेन्चुरी‘ में दिया  गया है। उस समय भारत कृषि के सुविकसित साधनों में दुनिया में अग्रणी था।  कृषि क्षेत्र में पंक्ति में बोने के तरीके को इस क्षेत्र में बहुत कुशल और  उपयोगी अनुसंधान माना जाता है। आस्ट्रिया में इसका प्रयोग सन्‌ १६६२ तथा  इंग्लैण्ड में १७३० में हुआ। हालांकि इसका व्यापक प्रचार-प्रसार वहां इसके  ५० वर्ष बाद हो पाया। पर मेजर जनरल अलेक्झेंडर वाकर के अनुसार पंक्ति में  बोने का प्रयोग भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से ही होता आया है। थॉमस  राल्काट ने १७९७ में इंग्लैण्ड के कृषि बोर्ड को लिखे एक पत्र में बताया  कि, भारत में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता रहा है। उसने बोर्ड को  पंक्तियुक्त हलों के तीन सेट लन्दन भेजे ताकि इन हलों की नकल अंग्रेज कर  सकें, क्योंकि ये अंग्रेजी हलों की अपेक्षा अधिक उपयोगी और सस्ते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय कृषि पद्धति की सराहना करते हुए सर वाकर लिखते हैं- ‘भारत  में शायद विश्व के किसी भी देश से अधिक किस्मों का अनाज बोया जाता है और  तरह-तरह की पौष्टिक जड़ों वाली फसलों का भी यहां प्रचलन है। मेरी समझ में  नहीं आता कि हम भारत को क्या दे सकते हैं, क्योंकि जो खाद्यान्न हमारे यहां  हैं, वे तो वहां हैं ही, और भी अनेक विशेष प्रकार के अन्न वहां हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-1003130264953695012?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/1003130264953695012'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/1003130264953695012'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_5230.html' title='कृषि में हमेशा ही अग्रणी रहा है भारत'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-2525948155936336311</id><published>2010-06-03T15:07:00.001+05:30</published><updated>2010-06-03T15:07:56.643+05:30</updated><title type='text'>वनस्पति विज्ञान-२  : भारत ने ही बताया- पौधों में जीवन है</title><content type='html'>&lt;div id=":2c" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;span&gt; सन्‌ १६६५ में राबर्ट हुक ने माइक्रोस्कोप के द्वारा जो वर्णन किया उससे  विस्तृत वर्णन महर्षि पाराशर हजारों वर्ष पूर्व करते हैं। वे कहते हैं, कोष  की रचना निम्न प्रकार है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) कलावेष्टन (ग्र्द्वद्यड्ढद्ध ध्र्ठ्ठथ्थ्‌)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२)रंजकयुक्त रसाश्रय (क्रठ्ठद्र ध्त्द्र्यण्‌ ठ्ठ  ड़दृथ्दृद्वद्धत्दढ़ थ्र्ठ्ठद्यद्यड्ढद्ध)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) सूक्ष्मपत्रक (क्ष्ददड्ढद्ध ध्र्ठ्ठथ्थ्‌)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) अण्वश्च (ग़्दृद्य ध्त्द्मत्डथ्ड्ढ द्यदृ द्यण्ड्ढ  दठ्ठत्त्ड्ढड्ड ड्ढन्र्ड्ढ)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यह सेल का वर्णन तो बिना माइक्रोस्कोप के संभव नहीं है। यानी  वृक्ष आयुर्वेद के लेखक को हजारों साल पहले माईक्रोस्कोप का ज्ञान रहा  होगा। तब पश्चिम में इसे कोई नहीं जनता था। यह वृक्ष आयुर्वेद की वैज्ञानिक  दृष्टि थी। विचार करने की विषय यह है कि अनुसंधान की परम्परा चलते रहने और  अंत में इतनी गहन वैज्ञानिक दृष्टि को पाने में कितने वर्ष लगे होंगे।  क्योंकि किसी और देश में वनस्पति शास्त्र का इतना प्राचीन और गहन अध्ययन  नहीं हुआ है जितना कि भारत में। परन्तु हमारे वनस्पति शास्त्र के विद्वान  इन सन्दभों को पाठ्य पुस्तकों में नहीं रखते, क्योंकि वे संस्कृत नहीं  जानते। वे संस्कृत स्वयं पढ़ें या न पढ़ें, परन्तु यदि विज्ञान के विद्यार्थी  के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य कर दें तो इस देश के ज्ञान-विज्ञान का  मार्ग स्वत: प्रशस्त हो जाएगा। जिसको संस्कृत का ज्ञान नहीं है उसे वृक्ष  आयुर्वेद का ज्ञान कहां से होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार-प्रसिद्ध ग्रंथ च्ड़त्ड्ढदड़द्यत्ढत्ड़  ण्ड्ढद्धत्द्यठ्ठढ़ड्ढ दृढ क्ष्दड्डत्ठ्ठ के पृष्ठ १६३ में वृक्षों का  विभिन्न वर्गीकरण, जो चरक, सुश्रुत, महर्षि पाराशर आदि ने किया है, उसका  वर्णन है। वह भी वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में भारत की प्रगति को दर्शाता  है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चरक का वर्गीकरण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;चरक अपनी ‘चरक संहिता‘ में वनस्पतियों का चार प्रकार से वर्गीकरण करते  हैं:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) जिनमें फूल के बिना ही फलों की उत्पत्ति होती है जैसे गूलर,  कटहल आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) वानस्पत्य- जिनमें फूल के बाद फल लगते हैं जैसे आम, अमरूद आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) औषधि-जो फल पकने के बाद स्वयं सूखकर गिर पड़ें, उन्हें औषधि  कहते हैं। जैसे गेंहू, जौ, चना आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) वीरुध- जिनके तन्तु निकलते हैं, उन्हें वीरुध कहते हैं, जैसे  लताएं, बेल, गुल्म आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार वनस्पति के प्रयोग के अनुसार भी कुछ वर्गीकरण हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अ) मूलिनी-जिसका मूल अन्य अंगों की अपेक्षा प्रायोगिक दृष्टि से  विशेष महत्वपूर्ण है। इनकी सोलह संख्या बताई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ब) फलनी- जिनका फल प्रयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें  उन्नीस प्रकार के पौधे बताये हैं। चरक ऋषि ने मानव के आहार योग्य  वनस्पतियों को सात भागों में बांटा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) शूक धान्य- जिन पर शूक (बाल) निकलते हैं जैसे गेहूं, जौ आदि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) शिम्बी धान्य-फली की जाति वाले, जिन पर छिलका रहता है। जैसे  सेम, मटर, मूंग, उड़द, अरहर आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) शाक वर्ग- पालक, मेथी, बथुआ आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) फल वर्ग-विभिन्न प्रकार के फल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५) हरित वर्ग- विभिन्न प्रकार की तरकारी, लौकी, तोरई आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(६) आहार योनि वर्ग-तिल, मसाले आदि जिनका आहार में उपयोग होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(७) इक्षु वर्ग- गन्ना और उसकी जातियां।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुश्रुत का वर्गीकरण: सुश्रुत ने शाकों को दस वर्गों में बांटा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) मूल- मूली आदि। (२) पत्र- जिनके पत्तों का उपयोग होता है। (३)  करीर - जिनके अंकुर का उपयोग होता है, जैसे बास। (४) अग्र-बेंत आदि। (५) फल  - सभी फलदार पौधे। (६) काण्ड - कृष्माण्ड आदि। (७) अधिरुढ़-लता आदि। (८)  त्वक्‌-मातुलुंग आदि। (९) पुष्प-कचनार आदि। (१०) कवक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि पाराशर का वर्गीकरण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि पराशर ने सपुष्प वनस्पतियों को विविध परिवारों में बांटा  है। जैसे शमीगणीय (फलियों वाले पौधे), पिपीलिका गणीय, स्वास्तिक गणीय,  त्रिपुण्डक्‌ गणीय, मल्लिका गणीय और कूर्च गणीय। आश्चर्य की बात यह है कि  जो विभाजन महर्षि पाराशर ने किया है, आधुनिक वनस्पति विज्ञान का विभाजन भी  इससे मिलता-जुलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए- शमीगणीय विभाजन देखें- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी तु तुण्दमण्डला विषमविदलास्मृता।&lt;br /&gt;पञ्चमुक्तदलैश्चैव युक्तजालकरुर्णितै:॥&lt;br /&gt;दशभि: केशरैर्विद्यात्‌ समि पुष्पस्य लक्षणम्‌।&lt;br /&gt;सभी सिम्बिफला ज्ञेया पार्श्च बीजा भवेत्‌ सा॥&lt;br /&gt;वक्रं विकर्णिकं पुष्पं शुकाख्य पुष्पमेव च&lt;br /&gt;एतैश्च पुष्पभेदैस्तु भिद्यन्ते समिजातय:॥&lt;br /&gt;&lt;em&gt;वृक्षायुर्वेद-पुष्पांगसूत्राध्&lt;wbr&gt;याय&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पराशर के अनुसार - आधुनिक मान्यता&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुण्डमण्डल - क़थ्दृध्र्ड्ढद्धद्म ण्न्र्द्रदृढ़ठ्ठथ्र्द्वद्म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विषम विदल - छदड्ढद्दद्वठ्ठथ्‌ ड़दृद्धदृथ्थ्ठ्ठ थ्दृडड्ढद्म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंच मुक्तदल - क़त्ध्ड्ढद्यद्धद्वड्ढ घ्ड्ढद्यठ्ठथ्द्म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युक्त जालिका - च्न्र्दड्ढद्मद्रण्ठ्ठथ्दृद्वद्&lt;wbr&gt;म  क्दृद्धदृथ्थ्ठ्ठ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दश प्रिकेसर - च्र्ड्ढद च्द्यठ्ठदथ्र्ड्ढदद्म &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार अन्य विभाजन भी हैं। संस्कृत भाषा में इन नामों की  उपयुक्तता और अभिव्यक्ति के कारण सर विलियम जोन्स ने कहा था ‘यदि लिनियस  (आधुनिक वर्गीकरण विज्ञान का जनक) ने संस्कृत सीख ली होती तो उसके द्वारा  वह अपनी नामकरण पद्धति का और अधिक विकास कर पाता।‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूल से जल का पीना-वृक्षों द्वारा द्रव आहार लेने का ज्ञान  भारतीयों को था। अत: उनका नाम पादप, जो मूल से पानी पीता है, रखा गया था।  महाभारत के शांतिपर्व में वर्णन आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;तथा पवनसंयुक्त: पादै: पिबति पादप:॥ जैसे कमल नाल को मुख में रखकर  अवचूषण करने से पानी पिया जा सकता है, ठीक वैसे ही पौधे वायु की सहायता से  मूलों के द्वारा पानी पीते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वनस्पतियों के रोग-वराह मिहिर की ‘बृहत्संहिता‘ में  चार प्रकार के  वनस्पतियों के रोगों का वर्णन है, आधुनिक विवरण भी उसकी पुष्टि करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बृहत्‌ संहिता             आधुनिक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) पाण्डु पत्रता - पर्णों की पाण्डुता&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(क्ण्दृथ्दृद्धदृद्मत्द्म दृढ थ्ड्ढठ्ठध्ड्ढद्म)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) प्रवाल अवृद्धि - कलियों का पतन&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(क़ठ्ठथ्थ्त्दढ़ दृढ डद्वड्डद्म)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) शाखा शोष - डालियों का सूखना&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(क़्द्धन्र्त्दढ़ द्वद्र दृढ एद्धठ्ठदड़ण्ड्ढद्म)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) रस स्रुति - रस नि:स्राव&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(कन्द्वड्डठ्ठद्यत्दृद दृढ द्मठ्ठद्र)&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनुवंशिकता- ॠ क्दृदड़त्द्मड्ढ क्तत्द्मद्यदृद्धन्र्‌ दृढ  च्ड़त्ड्ढदड़ड्ढ त्द क्ष्दड्डत्ठ्ठ में दिया गया है कि चरक और सुश्रुत ने  विवरण दिया है कि ‘फूल के फलित अंड में वनस्पति के सभी अंग सूक्ष्म रूप में  विद्यमान रहते हैं, जो बाद में एक-एक करके प्रकट होते हैं।‘ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जगदीश चन्द्र बसु का योगदान-&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अर्वाचीन काल में भी वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में जिनका अप्रतिम  योगदान रहा, उन महान विज्ञानी जगदीश चन्द्र बसु के बारे में देश कितना  जानता है? वर्तमान काल में जगदीश चन्द्र बसु ने सिद्ध किया कि चेतना केवल  मनुष्यों और पशुओं तक ही सीमित नहीं है, अपितु वह वृक्षों और जिन्हें  निर्जीव पदार्थ माना जाता है, उनके अंदर भी समाहित है। इस प्रकार उन्होंने  आधुनिक जगत के सामने जीवन के एकत्व को प्रकट किया। उन्होंने कहा कि निर्जीव  व सजीव दोनों निरपेक्ष नहीं, अपितु सापेक्ष हैं। उनमें अंतर केवल इतना ही  है कि धातुएं थोड़ी कम संवेदनशील होती हैं, वृक्ष कुछ अधिक संवेदनशील होते  हैं, पशु कुछ और अधिक तथा मनुष्य सर्वाधिक संवेदनशील होते हैं। इनमें  डिग्री का अंतर है, परन्तु चेतना सभी के अंदर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन्‌ १८९५ के आस-पास जगदीश चन्द्र बसु वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे थे।  उन्होंने धात्विक डिटेक्टर में तरंगे भेजीं। उसके परिणामस्वरूप डिटेक्टर  पर कुछ संकेत चित्र आए। यह प्रयोग बार-बार करने पर एक अंतर उनके ध्यान में  आया कि संकेत चित्र प्रारंभ में जितने स्पष्ट आ रहे थे, बार-बार प्रयोग  दोहराने पर वे थोड़ा मंद होने लगे। यह देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि जो  निर्जीव हैं, उनमें प्रतिसाद कम-ज्यादा नहीं होना चाहिए, वह तो यांत्रिक  होने के कारण एक जैसा होना चाहिए। प्रतिसाद का कम-ज्यादा होना तो पेशियों  का स्वभाव है। उनमें जब थकान आती है तो प्रतिसाद कम होता है तथा कुछ समय  आराम मिला तो प्रतिसाद अधिक होता है। अत: डिटेक्टर में प्रतिसाद कम- अधिक  देखकर उन्हें शंका हुई और उन्होंने डिटेक्टर को कुछ समय आराम देकर प्रयोग  को पुन: दोहराया और वे आश्चर्यचकित हो गए। क्योंकि आराम मिलने के बाद संकेत  चित्र पुन: वैसे ही आने लगे। वे सोचने लगे, यह क्यों है? अपने प्रयोग को  कई बार दोहराकर उन्होंने जांचा-परखा तथा यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि  निर्जीव के अंदर भी संवेदनशीलता है। अंतर केवल इतना है कि वह निश्चेष्ट  (इनर्ट) है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगदीश चन्द्र बसु ने जब यह सिद्ध किया, उस समय पश्चिम के  वैज्ञानिकों की क्या हालत थी, इसका अनुभव निम्न प्रसंग से किया जा सकता है।  रायल साइंटिफिक सोसायटी में जगदीश चन्द्र बसु का भाषण होने वाला था तो  इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध बायोलाजिस्ट हारटांग को हॉब्ज नामक विद्वान ने कहा,  आज जगदीश चन्द्र बसु का भाषण होने वाला है जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि  वनस्पतियों और निर्जीवों में भी जीवन रहता है। आप भाषण सुनने चलेंगे?  हारटांग की प्रथम प्रतिक्रिया थी ‘मैं अभी होश में हूं, मैंने पी नहीं रखी  है। आपने कैसे समझ लिया कि मैं ऐसी वाहियात बातों पर विश्वास करूंगा।‘ फिर  भी मजा देखने की मानसिकता से वे भाषण सुनने आए। और भी लोग हंसी उड़ाने की  मानसिकता से वहां आए। जगदीशचन्द्र बसु ने केवल मौखिक भाषण ही नहीं दिया  अपितु यंत्रों के सहारे प्रत्यक्ष प्रयोगों का प्रदर्शन करते हुए जब अपनी  बात सिद्ध करना प्रारंभ किया, तो हॉल में बैठे सभी विद्वान्‌ जो प्रारंभ  में उपेक्षा की नजर से देख रहे थे, १५ मिनट बीतते-बीतते तालियां बजाने लगे।  सारा हाल उनकी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। भाषण व प्रयोगों के अंत  में जब सभा के अध्यक्ष ने पूछा कि किसी को कोई शंका, कोई प्रश्न हो तो  वक्ता से पूछ सकते हैं। तीन बार दोहराने पर भी जब कोई नहीं बोला, तब प्रो.  हॉब्ज खड़े हुए और उन्होंने कहा कि कुछ भी पूछने लायक नहीं है। बसु महोदय ने  अत्यंत प्रामाणिकता से अपनी बात सिद्ध की है। उनके भाषण व प्रयोग को देखकर  मन में शंका उठती थी, परन्तु अगले ही क्षण दूसरे प्रयोग को देखकर उस शंका  का निरसन हो जाता था। रॉयल सोसायटी के अध्यक्ष ने भी जगदीशचन्द्र बसु के  जीवन के एकीकरण को सिद्ध करने की दिशा के सफल प्रयत्न के प्रति विश्वास  प्रकट किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे चलकर बसु महोदय ने वृक्षों के ऊपर बहुत गहराई से प्रयोग किए।  अपने साथ पौधों को लेकर दुनिया की यात्रा की। अनेक संवेदनशील यंत्र बनाये  जिनमें वृक्षों के अन्दर होने वाले सूक्ष्मतम परिवर्तन प्रत्यक्ष देखे जा  सकते थे। उन्होंने क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र बनाया, जो संवेदनाओं को एक  करोड़ गुना अधिक बड़ा कर बताता था। जब पौधों को वे यंत्र लगा दिए जाते थे, तो  पौधे दिन भर में क्या-क्या अनुभूतियां उन्हें हो रही हैं, इसकी कहानी  मानों वे स्वयं कहने लगते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने प्रयोगों और अनुभवों  को छदत्द्यन्र्‌ दृढ थ्त्ढड्ढ, ध्दृत्ड़ड्ढ दृढ थ्त्ढड्ढ आदि लेखों में  अभिव्यक्त किया तथा वनस्पति में, पशुओं में, पक्षियों में, कीड़े-मकोड़ों और  सारी सृष्टि में चेतना है, इस प्राचीन अवधारणा को आधुनिक युग में सिद्ध  किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-2525948155936336311?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2525948155936336311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/2525948155936336311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9898.html' title='वनस्पति विज्ञान-२  : भारत ने ही बताया- पौधों में जीवन है'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-4532349417837378256</id><published>2010-06-03T15:06:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:07:02.591+05:30</updated><title type='text'>वृक्ष आयुर्वेद से मिला ज्ञान</title><content type='html'>&lt;div id=":2g" class="ii gt"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक -  सुरेश सोनी&lt;/span&gt;  &lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt; वैदिक काल से ही भारत वर्ष में प्रकृति के निरीक्षण, परीक्षण एवं विश्लेषण  की प्रवृत्ति रही है। इसी प्रक्रिया में वनस्पति जगत का भी विश्लेषण किया  गया। प्राचीन वांगमय में इसके अनेक संदर्भ ज्ञात होते हैं। अथर्ववेद में  पौधों को आकृति तथा अन्य लक्षणों के आधार पर सात उपविभागों में बांटा गया,  यथा- (१) वृक्ष (२) तृण (३) औषधि (४) गुल्म (५) लता (६) अवतान (७) वनस्पति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे चलकर महाभारत, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, शुक्रनीति, वृहत्‌  संहिता, पाराशर, चरक, सुश्रुत, उदयन आदि द्वारा वनस्पति, उसकी उत्पत्ति,  उसके अंग, क्रिया, उनके विभिन्न प्रकार, उपयोग आदि का विस्तार से वर्णन  किया गया, जिसके कुछ उदाहरण हम निम्न संदर्भों में देख सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पौधों में जीवन&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पौधे जड़ नहीं होते अपितु उनमें जीवन होता है। वे चेतन जीव की तरह  सर्दी-गर्मी के प्रति संवेदनशील रहते हैं, उन्हें भी हर्ष और शोक होता है।  वे मूल से पानी पीते हैं, उन्हें भी रोग होता है इत्यादि तथ्य हजारों  वर्षों से हमारे यहां ज्ञात थे तथा अनेक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत के शांतिपर्व के १८४वें अध्याय में महर्षि भारद्वाज व भृगु  का संवाद है। उसमें महर्षि भारद्वाज पूछते हैं कि वृक्ष चूंकि न देखते  हैं, न सुनते हैं, न गन्ध व रस का अनुभव करते हैं, न ही उन्हें स्पर्श का  ज्ञान होता है, फिर वे पंच भौतिक व चेतन कैसे हैं? इसका उत्तर देते हुए  महर्षि भृगु कहते हैं- हे मुने, यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं तो भी उनमें  आकाश है, इसमें संशय नहीं है, इसी से इनमें नित्य प्रति फल-फूल आदि की  उत्पत्ति संभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृक्षों में जो ऊष्मा या गर्मी है, उसी से उनके पत्ते, छाल, फल,  फूल कुम्हलाते हैं, मुरझाकर झड़ जाते हैं। इससे उनमें स्पर्श ज्ञान का होना  भी सिद्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी देखा जाता है कि वायु, अग्नि, बिजली की कड़क आदि होने पर  वृक्षों के फल-फूल झड़कर गिर जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे सुनते भी  हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लता वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है और उसके ऊपरी भाग तक चढ़  जाती है। बिना देखे किसी को अपना मार्ग नहीं मिल सकता। अत: इससे सिद्ध है  कि वृक्ष देखते भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पवित्र और अपवित्र गन्ध से तथा नाना प्रकार के धूपों की गंध से  वृक्ष निरोग होकर फूलने लगते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वृक्ष सूंघते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृक्ष अपनी जड़ से जल पीते हैं और कोई रोग होने पर जड़ में औषधि  डालकर उनकी चिकित्सा भी की जाती है। इससे सिद्ध होता है कि वृक्ष में  रसनेन्द्रिय भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे मनुष्य कमल की नाल मुंह में लगाकर उसके द्वारा ऊपर को जल  खींचता है, उसी प्रकार वायु की सहायता से वृक्ष जड़ों द्वारा ऊपर की ओर पानी  खींचते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुखदु:खयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात्‌।&lt;br /&gt;जीवं पश्यामि वृक्षाणां चैतन्यं न विद्यते॥&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृक्ष कट जाने पर उनमें नया अंकुर उत्पन्न हो जाता है और वे सुख,  दु:ख को ग्रहण करते हैं। इससे मैं देखता हूं कि कि वृक्षों में भी जीवन है।  वे अचेतन नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृक्ष अपनी जड़ से जो जल खींचता है, उसे उसके अंदर रहने वाली वायु  और अग्नि पचाती है। आहार का परिपाक होने से वृक्ष में स्निग्धता आती है और  वे बढ़ते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त महर्षि चरक तथा उदयन आचार्य ने भी वृक्षों में चेतना  तथा चेतन होने वाली अनुभूतियों के संदर्भ में वर्णन किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;महर्षि चरक कहते हैं- ‘तच्येतनावद्‌ चेतनञ्च‘&lt;br /&gt;अर्थात्‌-प्राणियों की भांति उनमें (वृक्षों में) भी चेतना होती है।&lt;br /&gt;आगे कहते हैं ‘अत्र सेंद्रियत्वेन वृक्षादीनामपि चेतनत्वम्‌  बोद्धव्यम्‌‘&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌-वृक्षों की भी इन्द्रिय है, अत: इनमें चेतना है। इसको  जानना चाहिए। उसी प्रकार उदयन कहते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;‘वृक्षादय: प्रतिनियतभोक्त्रयधिष्ठिता:  जीवनमरणस्वप्नजागरणरोगभेषज&lt;br /&gt;प्रयोगबीजजातीयानुबन्धनुकूलोपगम प्रतिकूलापगमादिभ्य: प्रसिद्ध  शरीरवत्‌।‘&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(उदयन-पृथ्वीनिरुपणम्‌।)&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌-वृक्षों की भी मानव शरीर के समान निम्न अनुभव निश्चित  होते हैं- जीवन, मरण, स्वप्न, जागरण, रोग, औषधि प्रयोग, बीज, सजातीय  अनुबन्ध, अनुकूल वस्तु स्वीकार व प्रतिकूल वस्तु का अस्वीकार। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एक अद्भुत ग्रंथ-पाराशर वृक्ष आयुर्वेद&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बंगाल के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री डा. गिरिजा प्रसन्न मजूमदार ने  ‘हिस्ट्री ऑफ साइंस इन इंडिया‘ में वनस्पति शास्त्र से संबंधित अध्याय में  महामुनि पाराशर द्वारा रचित ग्रंथ ‘वृक्ष आयुर्वेद‘ का वर्णन किया है।  बंगाल के एन.एन. सरकार के पिता, जो आयुर्वेद के प्रसिद्ध विद्वान थे, ने  इसकी पांडुलिपि खोजी थी। मजूमदार महोदय ने जब इस प्राचीन ग्रंथ को पढ़ा तो  वे आश्चर्यचकित हो गए, क्योंकि उसमें बीज से वृक्ष बनने तक का इतना  वैज्ञानिक विश्लेषण था कि वह किसी भी पाठक को अभिभूत करता था। उन्होंने इस  ग्रंथ का सार अंग्रेजी में अनूदित किया। यह ग्रंथ हजारों वर्ष पूर्व की  भारतीय प्रज्ञा की गौरवमयी गाथा कहता है। इसका विश्लेषण जबलपुर में १९९२  में स्वदेशी प्राण विज्ञान पर संपन्न राष्ट्रीय संगोष्ठी में पूर्व  केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी ने किया। वे कहते  हैं ‘मैं एक पुस्तक का उल्लेख करना चाहता हूं, वह है वृक्ष आयुर्वेद। उसके  लेखक थे महामुनि पाराशर। इस ग्रंथ में जो वैज्ञानिक विवेचन है, वह  विस्मयकारी है। इस पुस्तक के ६ भाग हैं- (१) बीजोत्पत्ति काण्ड (२)  वानस्पत्य काण्ड (३) गुल्म काण्ड (४)वनस्पति काण्ड (५) विरुध वल्ली काण्ड  (६) चिकित्सा काण्ड।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं जिनमें  बीज के वृक्ष बनने तक की गाथा का वैज्ञानिक पद्धति से विवेचन किया गया है।  इसका प्रथम अध्याय है बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय, इसमें महर्षि पाराशर कहते  हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आपोहि कललं भुत्वा यत्‌ पिण्डस्थानुकं भवेत्‌।&lt;br /&gt;तदेवं व्यूहमानत्वात्‌ बीजत्वमघि गच्छति॥&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले पानी जेली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर  वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि  बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण  करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी  अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे अध्याय भूमि वर्गाध्याय में पृथ्वी का उल्लेख है। इसमें  मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरा अध्याय वन वर्गाध्याय का है। इसमें १४ प्रकार के वनों का  उल्लेख है। चौथा अध्याय वृक्षांग सूत्राध्याय (फिजियॉलाजी) का है। इसमें  प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;‘पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति।‘&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वात-क्दृ२ आतप च्द्वदथ्त्ढ़ण्द्य, रंजक क्लोरोफिल। यह स्पष्ट है कि वात  कार्बन डाय आक्साइड अ सूर्य प्रकाश अ क्लोरोफिल से अपना भोजन वृक्ष बनाते  हैं। इसका स्पष्ट वर्णन इस ग्रंथ में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांचवा पुष्पांग सूत्राध्याय है। इसमें कितने प्रकार के फूल होते  हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है।  उनमें पराग कहां होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फलांग सूत्राध्याय में फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का  वर्गीकरण किया गया है। सातवें वृक्षांग सूत्राध्याय में वृक्ष के अंगों का  वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़)  त्वक्‌ (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम्‌ (स्टिम्‌) सारं (कठोर तना) सारसं  (च्ठ्ठद्र) र्नियासा (कन्ड़द्धड्ढद्यत्दृदद्म) बीजं (बीज) प्ररोहम्‌  (च्ण्दृदृद्यद्म)-इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है। आठवें अध्याय  में बीज से पेड़ के विकास का वर्णन किया गया है। बीज के बारे में जो कहा गया  है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। बीज और पत्रों की प्रक्रिया में वे कितनी  गहराई में गए, यह तय करना आज के वनस्पति शास्त्र के विद्वानों का दायित्व  है। पाराशर         कहते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;‘बीज मातृका तु बीजस्यम्‌ बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि&lt;wbr&gt;‘&lt;br /&gt;पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत्‌ मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च।  तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र  प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और  द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके  बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन- सा बीज कैसे उगता है, इसका  वर्गीकरण के साथ उसमें स्पष्ट वर्णन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी वर्णन है कि बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण  (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस:&lt;br /&gt;संप्लवते प्ररोहांगेषु।&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज  मातृका प्रशोषमा पद्यमे। (वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वृक्ष के विकास की गाथा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। आगे कहा गया है कि जड़ बन जाने के बाद  बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती  है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन  पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा  ऊपर आता है, यह मानो आज के ‘एसेण्ट ऑफ सैप‘ का वर्णन है। यह रस पत्तों में  पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये  शिरायें दो प्रकार की हैं- ‘उपसर्प‘ और ‘अपसर्प‘। वे रस प्रवाह को ऊपर भी  ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं।  गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध भी वे रस ऊपर कैसे ले जाती हैं इसके बारे में आज  के विज्ञान में पूरा ज्ञान नहीं है। जब तक कैपिलरी एक्शन का ज्ञान न हो तब  तक यह बताना संभव नहीं है और यह ज्ञान बहुत समय तक पश्चिमी देशों को नहीं  था। कैपिलरी मोशन संबंधी भौतिकी के सिद्धांत का ज्ञान बॉटनी के ज्ञान के  साथ आवश्यक है। जब पत्तों में रस प्रवाहित होता है, तब क्या होता है इसे  स्पष्ट करके ग्रंथ में कहा गया है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘रंजकेन पश्च्यमानात‘ किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता  है-यानी फोटो सिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। इसके पश्चात्‌ वह कहते हैं  कि ‘उत्पादं- विसर्जयन्ति‘ हम सब आज जानते हैं कि पत्तियां फोटो सिंथेसिस  से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड। दिन में  कार्बन डाय आक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती  हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं। इस सबका वर्णन इसमें है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे कहा कि जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा  उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। संक्षेप में यह वर्णन  बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना,  फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है। इस सारी क्रमिक क्रिया से  पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की  ज्ञात नहीं है। &lt;/span&gt;  &lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;(क्रमश:)&lt;/span&gt; &lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-4532349417837378256?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4532349417837378256'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4532349417837378256'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_9397.html' title='वृक्ष आयुर्वेद से मिला ज्ञान'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-1655570110876922546</id><published>2010-06-03T15:05:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T15:06:02.969+05:30</updated><title type='text'>रसायन शास्त्र : धातु, आसव, तत्व - सब भारतीय सत्य</title><content type='html'>&lt;div id=":3v" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक -  सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;span&gt; सायन शास्त्र का सम्बन्ध धातु विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान से भी है।  वर्तमान काल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने ‘हिन्दू  केमेस्ट्री‘ ग्रंथ लिखकर कुछ समय से लुप्त इस शास्त्र को फिर लोगों के  सामने लाया। रसायन शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है। खनिजों, पौधों,  कृषिधान्य आदि के द्वारा विविध वस्तुओं का उत्पादन, विभिन्न धातुओं का  निर्माण व परस्पर परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि में आवश्यक औषधियों का  निर्माण इसके द्वारा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्व काल में अनेक रसायनज्ञ हुए, उनमें से कुछ की कृतियों  निम्नानुसार हैं।&lt;br /&gt;नागार्जुन-रसरत्नाकर, कक्षपुटतंत्र, आरोग्य मंजरी, योग सार, योगाष्टक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाग्भट्ट - रसरत्न समुच्चय&lt;br /&gt;गोविंदाचार्य - रसार्णव&lt;br /&gt;यशोधर - रस प्रकाश सुधाकर&lt;br /&gt;रामचन्द्र - रसेन्द्र चिंतामणि&lt;br /&gt;सोमदेव- रसेन्द्र चूड़ामणि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रस रत्न समुच्चय ग्रंथ में मुख्य रस माने गए निम्न रसायनों का  उल्लेख किया गया है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) महारस (२) उपरस (३) सामान्यरस (४) रत्न (५) धातु (६) विष (७)  क्षार (८) अम्ल (९) लवण (१०) लौहभस्म।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महारस (१) अभ्रं (२) वैक्रान्त (३) भाषिक (४) विमला (५) शिलाजतु  (६) सास्यक (७)चपला (८) रसक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरस :- (१) गंधक (२) गैरिक (३) काशिस (४) सुवरि (५) लालक (६) मन:  शिला (७) अंजन (८) कंकुष्ठ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य रस- (१) कोयिला (२) गौरीपाषाण (३) नवसार (४) वराटक (५)  अग्निजार (६) लाजवर्त (७) गिरि सिंदूर (८) हिंगुल (९) मुर्दाड श्रंगकम्‌&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;इसी प्रकार दस से अधिक विष हैं।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अम्ल का भी वर्णन है। द्वावक अम्ल (च्दृथ्ध्ड्ढदद्य ठ्ठड़त्ड्ड) और  सर्वद्रावक अम्ल (ठ्ठथ्थ्‌ ड्डत्द्मद्मदृथ्ध्त्दढ़ ठ्ठड़त्ड्ड)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभिन्न प्रकार के क्षार का वर्णन इन ग्रंथों में मिलता है तथा  विभिन्न धातुओं की भस्मों का वर्णन आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयोगशाला- ‘रस-रत्न-समुच्चय‘ अध्याय ७ में रसशाला यानी  प्रयोगशाला का विस्तार से वर्णन भी है। इसमें ३२ से अधिक यंत्रों का उपयोग  किया जाता था, जिनमें मुख्य हैं- (१) दोल यंत्र (२) स्वेदनी यंत्र (३) पाटन  यंत्र (४) अधस्पदन यंत्र (५) ढेकी यंत्र (६) बालुक यंत्र (७) तिर्यक्‌  पाटन यंत्र (८) विद्याधर यंत्र (९) धूप यंत्र (१०) कोष्ठि यंत्र (११) कच्छप  यंत्र (१२) डमरू यंत्र।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयोगशाला में नागार्जुन ने पारे पर बहुत प्रयोग किए। विस्तार से  उन्होंने पारे को शुद्ध करना और उसके औषधीय प्रयोग की विधियां बताई हैं।  अपने ग्रंथों में नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं का मिश्रण तैयार करने, पारा  तथा अन्य धातुओं का शोधन करने, महारसों का शोधन तथा विभिन्न धातुओं को  स्वर्ण या रजत में परिवर्तित करने की विधि दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पारे के प्रयोग से न केवल धातु परिवर्तन किया जाता था अपितु शरीर  को निरोगी बनाने और दीर्घायुष्य के लिए उसका प्रयोग होता था। भारत में पारद  आश्रित रसविद्या अपने पूर्ण विकसित रूप में स्त्री-पुरुष प्रतीकवाद से  जुड़ी है। पारे को शिव तत्व तथा गन्धक को पार्वती तत्व माना गया और इन दोनों  के हिंगुल के साथ जुड़ने पर जो द्रव्य उत्पन्न हुआ, उसे रससिन्दूर कहा गया,  जो आयुष्य-वर्धक सार के रूप में माना गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पारे की रूपान्तरण प्रक्रिया-इन ग्रंथों से यह भी ज्ञात होता है कि  रस-शास्त्री धातुओं और खनिजों के हानिकारक गुणों को दूर कर, उनका आन्तरिक  उपयोग करने हेतु तथा उन्हें पूर्णत: योग्य बनाने हेतु विविध शुद्धिकरण की  प्रक्रियाएं करते थे। उसमें पारे को अठारह संस्कार यानी शुद्धिकरण  प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। इन प्रक्रियाओं में औषधि गुणयुक्त वनस्पतियों  के रस और काषाय के साथ पारे का घर्षण करना और गन्धक, अभ्रक तथा कुछ क्षार  पदार्थों के साथ पारे का संयोजन करना प्रमुख है। रसवादी यह मानते हैं कि  क्रमश: सत्रह शुद्धिकरण प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद पारे में रूपान्तरण  (स्वर्ण या रजत के रूप में) की सभी शक्तियों का परीक्षण करना चाहिए। यदि  परीक्षण में ठीक निकले तो उसको अठारहवीं शुद्धिकरण की प्रक्रिया में लगाना  चाहिए। इसके द्वारा पारे में कायाकल्प की योग्यता आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धातुओं को मारना:- विविध धातुओं को उपयोग करने हेतु उसे मारने की  विधि का वर्णन किया गया है। प्रयोगशाला में धातुओं को मारना एक परिचित विधि  थी। गंधक का सभी धातुओं को मारने में उपयोग होता था। अत: ग्रंथ में गंधक  की तुलना सिंह से की गई तथा धातुओं की हाथी से और कहा गया कि जैसे सिंह  हाथी को मारता है उसी प्रकार गंधक सब धातुओं को मारता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जस्ते का स्वर्ण रंग में बदलना-हम जानते हैं जस्ता (झ्त्दत्त्‌)  शुल्व (तांबे) से तीन बार मिलाकर गरम किया जाए तो पीतल (एद्धठ्ठद्मद्म)  धातु बनती है, जो सुनहरी मिश्रधातु है। नागार्जुन कहते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रमेण कृत्वाम्बुधरेण रंजित:।&lt;br /&gt;करोति शुल्वं त्रिपुटेन काञ्चनम्‌॥&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(रसरत्नाकार-३)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धातुओं की जंगरोधी क्षमता-गोविन्दाचार्य ने धातुओं के जंगरोधन या  क्षरण रोधी क्षमता का क्रम से वर्णन किया है। आज भी वही क्रम माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुवर्ण रजतं ताम्रं तीक्ष्णवंग भुजङ्गमा:।&lt;br /&gt;लोहकं षडि्वधं तच्च यथापूर्व तदक्षयम्‌॥&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(रसार्णव-७-८९-१०)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ धातुओं के अक्षय रहने का क्रम निम्न प्रकार से है-  सुवर्ण, चांदी, ताम्र, वंग, सीसा, तथा लोहा। इसमें सोना सबसे ज्यादा अक्षय  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तांबे से मथुर तुप्ता&lt;br /&gt;(ड़दृद्रद्रड्ढद्ध द्मद्वथ्द्रण्ठ्ठद्यड्ढ) बनाना-&lt;br /&gt;ताम्रदाह जलैर्योगे जायते&lt;br /&gt;तुत्यकं शुभम्‌।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ तांबे के साथ तेजाब का मिश्रण होता है तो कॉपर सल्फेट  प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भस्म:- रासायनिक क्रिया द्वारा धातु के हानिकारक गुण दूर कर उन्हें  राख में बदलने पर उस धातु की राख को भस्म कहा जाता है। इस प्रकार मुख्य  रूप से औषधि में लौह भस्म (क्ष्द्धदृद), सुवर्ण भस्म (क्रदृथ्ड्ड), रजत  भस्म (च्त्थ्ध्ड्ढद्ध), ताम्र भस्म (क्दृद्रद्रड्ढद्ध), वंग भस्म  (च्र्त्द), सीस भस्म (ख्र्ड्ढठ्ठड्ड) प्रयोग होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वज्रसंधात (ॠड्डठ्ठथ्र्ठ्ठदद्यत्दड्ढ  क्दृथ्र्द्रदृद्वदड्ड)-वराहमिहि&lt;wbr&gt;र अपनी बृहत्‌ संहिता में कहते हैं-&lt;br /&gt;अष्टो सीसक भागा: कांसस्य द्वौ तु रीतिकाभाग:।&lt;br /&gt;मया कथितो योगोऽयं विज्ञेयो वज्रसड्घात:॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ एक यौगिक जिसमें आठ भाग शीशा, दो भाग कांसा और एक भाग  लोहा हो उसे मय द्वारा बताई विधि का प्रयोग करने पर वह वज्रसङ्घात बन  जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;आसव बनाना-&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरक के अनुसार ९ प्रकार के आसव बनाने का उल्लेख है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. धान्यासव - ङदृदृद्यद्म&lt;br /&gt;२. फलासव-क़द्धद्वत्द्यद्म&lt;br /&gt;३. मूलासव-क्रद्धठ्ठत्दद्म ठ्ठदड्ड द्मड्ढड्ढड्डद्म&lt;br /&gt;४. सरासव-ज़्दृदृड्ड&lt;br /&gt;५. पुष्पासव-क़थ्दृध्र्ड्ढद्धद्म&lt;br /&gt;६. पत्रासव-थ्ड्ढठ्ठध्ड्ढद्म&lt;br /&gt;७. काण्डासव-द्मद्यड्ढथ्र्द्म (च्द्यठ्ठड़त्त्द्म)&lt;br /&gt;८. त्वगासव-एठ्ठद्धत्त्द्म&lt;br /&gt;९. शर्करासव-च्द्वढ़ड्ढद्ध&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के गंध, इत्र सुगंधि के सामान आदि का  भी विकास हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सारे प्रयोग मात्र गुरु से सुनकर या शास्त्र पढ़कर नहीं किए गए।  ये तो स्वयं प्रत्यक्ष प्रयोग करके सिद्ध करने के बाद कहे गए हैं। इसकी  अभिव्यक्ति करते हुए अनुमानत: १३वीं सदी के रूद्रयामल तंत्र के एक भाग रस  कल्प में रस शास्त्री कहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इति सम्पादितो मार्गो द्रुतीनां पातने स्फुट:&lt;br /&gt;साक्षादनुभवैर्दृष्टों न श्रुतो गुरुदर्शित:&lt;br /&gt;लोकानामुपकाराएतत्‌ सर्वें निवेदितम्‌&lt;br /&gt;सर्वेषां चैव लोहानां द्रावणं परिकीर्तितम्‌-&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(रसकल्प अ.३)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ गुरुवचन सुनकर या किसी शास्त्र को पढ़कर नहीं अपितु अपने  हाथ से इन रासायनिक प्रयोगों और क्रियाओं को सिद्धकर मैंने लोक हितार्थ  सबके सामने रखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन रसायन शास्त्रियों की प्रयोगशीलता का यह एक प्रेरणादायी  उदाहरण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-1655570110876922546?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/1655570110876922546'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/1655570110876922546'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_6037.html' title='रसायन शास्त्र : धातु, आसव, तत्व - सब भारतीय सत्य'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-3125483398365249577</id><published>2010-06-03T14:57:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T14:58:57.761+05:30</updated><title type='text'>स्थापत्य शास्त्र-२ : अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराहो - ये हैं भारतीय शिल्प की चमत्कारिक धरोहर</title><content type='html'>&lt;div id=":39" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; २५००-३००० ई.पू. से लेकर १७वीं शताब्दी तक के देश के विविध हिस्सों में जल  प्रदाय की व्यवस्था के आश्चर्यजनक नमूने मिलते हैं जिसमें बड़े तालाब, नहरें  तथा अन्य स्थान से पानी का मार्ग परिवर्तित कर पानी लाने के अनेक उदाहरण  प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौटिल्य आज से २५०० वर्ष पूर्व अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि  राजा जिस पवित्र भाव से मन्दिर का निर्माण करता है उसी भाव से उसे जल रोकने  का प्रयत्न करना चाहिए। आज पानी को लेकर चारों ओर हाहाकार है। लोग कहते  हैं कि कहीं तीसरा विश्वयुद्ध पानी को लेकर न हो जाए। ऐसे समय में चाणक्य  की बात ध्यान देने योग्य है। चाणक्य राजा को पवित्र भाव से जल रोकने का  प्रयास करने की सलाह देकर ही नहीं रुके, अपितु आगे वे कहते हैं कि जनता को  भी जल संरक्षण के लिए प्रेरित करना चाहिए। उस हेतु आर्थिक सहयोग देना  चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर वस्तु का सहयोग करना चाहिए, इतना ही नहीं तो  व्यक्ति का भी सहयोग करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौटिल्य जल रोकने हेतु बांध बनाने का भी उल्लेख करते हैं तथा इसका  भी वर्णन करते हैं कि बांध वहां नहीं बनाना चाहिए जहां दो राज्यों की  सीमाएं मिलती हैं, क्योंकि ऐसा होने पर वह झगड़े की जड़ बनेगा। आज कावेरी तथा  नर्मदा नदी के विवादों को देखकर लगता है वे बहुत दूरद्रष्टा थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण में पेरुमामिल जलाशय अनंतराजा सागर ने बनवाया था। यह भारत  में सिंचाई, शिल्प और प्रौद्योगिकी की कहानी कहता है। समीप के मंदिर की ओर  दो पत्थर-शिलाओं पर बने शिलालेख (सन्‌ १३६९) से पता लगता है कि जलागार के  निर्माण में दो वर्ष लगे। एक हजार श्रमिक लगाए गए और एक सौ गाड़ियां पत्थर  निर्माण स्थल तक पहुंचाने में प्रयुक्त हुएं। शिलालेख में इस जलागार  (जलाशय) के निर्माण स्थल के चयन और निर्माण के संबंध में बारह विशेष बातों  का उल्लेख हैं, जो एक अच्छे तालाब के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) शासक में कुछ भलाई, समृद्धि, खुशहाली के माध्यम से यश पाने की  अभिलाषा हो। (२) पायस शास्त्र यानी जल विज्ञान में निपुणता हो। (३) जलाशय  का आधार सख्त मिट्टी पर आधारित हो। (४) नदी जल का भण्डार करीब ३८ किलोमीटर  से ला रही हो। (५) बांध के दो तरफ किसी पहाड़ी के ऊंचे शिखर हों। (६) इन दो  पहाड़ी टीलों के बीच बांध ठोस पत्थर का बने। भले ही लंबा न हो, लेकिन सख्त  हो। (७) ये पहाड़ियां ऐसी जमीन से भिन्न हों जो उद्यानिकी के अनुकूल और  उर्वर होती हैं। (८) जलाशय का वेड (तल) लंबा, चौड़ा और गहरा हो। (९) सीधे,  लम्बे पत्थरों वाली जमीन हो। (१०) समीप में निचली, उर्वर जमीन सिंचाई के  लिए उपलब्ध हो। (१२) जलाशय बनाने में कुशल शिल्पी लगाए जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह वर्जनाएं भी शिलालेख में उत्कीर्ण हैं, इन्हें हर हाल में टाला  जाना चाहिए-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) बांध से रिसाव। (२) क्षारीय भूमि। (३) दो अलग शासित क्षेत्रों  की सीमा में जलाशय का निर्माण। (४) जलाशय बांध के बीच में ऊंचाई वाला  क्षेत्र। (५) कम जलापूर्ति आगम और सिंचाई के लिए अधिक फैला क्षेत्र। (६)  सिंचाई के लिए अपर्याप्त भूमि और अधिक जलागम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त ग्यारहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी में जल  संरक्षण की संरचना के लिए जलाशयों के निर्माण को रोचक इतिहास देश में दर्ज  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) अरिकेशरी मंगलम्‌ जलाशय (१०१०-११) के साथ मन्दिर की संरचना।  (२) गंगा हकोदा चोपुरम्‌ जलाशय (१०१२-१०१४) के बांध, स्तूप और नहरों का  विस्तार १६ मील लम्बा है। (३) भोजपुर झील (११वीं सदी) भोपाल से लगी हुई २४०  वर्गमील में फैली है। इसका निर्माण राजा भोज ने किया था। इस झील में ३६५  जल धाराएं मिलती हैं। (४) अलमंदा जलाशय (ग्यारहवीं) विशाखापट्टनम्‌ में है।  (५) राजत टाका तालाब (ग्यारहवीं शताब्दी) (६) भावदेव भट्ट जलाशय बंगाल में  (७) सिंधुघाटी जलाशय (११०६-०७) मैसूर में स्लूस तक निर्माण किया गया है।  (८) पेरिया क्याक्कल स्लूस (१२१९) त्रिचलापल्ली जिले में। (९) पखाला झील  (१३वीं शताब्दी)। वारंगल जिले में हल संरचना का उदाहरण है। (१०)  फिरंगीपुरम्‌ जलाशय (१४०९) गुंटूर जिले में शिल्प की विशिष्टता है। (११)  हरिद्रा जलाशय (१४१०) व्राह्मणों ने अपने खर्चे से निर्मित कराया था। तब  विजयनगर में राजा देवराज सत्तासीन थे। (१२) अनंतपुर जिले में नरसिंह वोधी  जलाशय (१४८९) का उल्लेख भी आवश्यक है। (१३) १५२० में नागलपुर जलाशय-राजा  कृष्णराज ने नागलपुर की पेयजल पूर्ति के लिए बनवाया था। कृष्णराज को भूजल  सुरंग बनाने का पहला गौरव प्राप्त हुआ। विजयपुर, महमदनगर, औरंगाबाद,  कोरागजा, वासगन्ना चैनलों का निर्माण इसी श्रृंखला की कड़ी है। (१४)  शिवसमुद्र (१५३१-३२) आज भी बंगलुरू की जलपूर्ति का स्रोत है। (१५)  तुगलकाबाद में बांध के जनक अनंगपाल (११५१) थे (१६) सतपुला बांध दिल्ली  (१३२६) में ३८ फुट ऊंची महराबें है। (१६) जमुना की पुरानी नहर, जिसे  फिरोजशाह तुगलक नहर (१३वीं शताब्दी) कहा गया, रावी पर बनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कलात्मक स्थापत्य के अमर उदाहरण-&lt;br /&gt;प्राचीन मंदिर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्राचीनकाल में शिल्पियों के समूह होते थे, जो एक कुल की तरह रहते थे  और कोई राजकुल या धनिक व्यक्ति भक्ति भावना से भव्य मन्दिर निर्माण कराना  चाहता तो ये वहां जाकर वर्षों अंत:करण की भक्ति से, पूजा के भाव से,  व्यवसायी बुद्धि से रहित होकर, मूर्ति उकेरने की साधना में संलग्न रहते थे।  उनकी मूक साधना प्रस्तर में प्राण फूंकती थी। इसी कारण आज भी प्राचीन  मंदिरों की मूर्तिकला मानो जीवंत हो अपनी कहानी कहती है। कोणार्क के सूर्य  मन्दिर का निर्माण लगातार १२ वर्ष तक अनेक शिल्पियों की साधना का परिणाम  है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस श्रेष्ठ भारतीय कला के अनेक नमूने देश के विभिन्न स्थानों पर  दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एलोरा के मन्दिर जिनमें व्राह्मण मंदिर कैलास सबसे विशाल और सुन्दर  है, इसके सभी भाग निर्दोष और कलापूर्ण हैं। इसकी लंबाई १४२ फुट, चौड़ाई ६२  फुट तथा ऊंचाई १०० फुट है। इस पर पौराणिक दृश्य उत्कीर्ण हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एलीफेंटा की गुफा में शिव-पार्वती के विवाद वाले दृश्यों में मानो  शिल्पी की सारी साधना मुखर हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उड़ीसा का लिंगराज मंदिर कला का श्रेष्ठतम नमूना है। यह मन्दिर  ५२०न्४६५ वर्गफुट में स्थित है, मंदिर की ऊंचाई १४४.०५ फुट है तथा ७.५ फुट  भारी दीवार से घिरा है। इसके चार प्रमुख भाग हैं:- विमान-जगमोहन-नट  मन्दिर-भाग मंडप। मंदिर में अनेक देवताओं की सुंदर उकेरी गई मूर्तियों के  साथ-साथ रामायण और महाभारत के अनेक प्रसंगों को उकेरा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खजुराहो के मन्दिर-यह नवीं शताब्दी के मंदिर हैं। पहले ८५ मंदिर  थे, अब लगभग २० ही शेष रह गए हैं। खजुराहो के मन्दिर शिल्पकला के महान्‌  प्रतीक हैं। बाह्य दीवारों पर  भोग मुद्रायें हैं। गर्भगृह में शिवलिंग  स्थापित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त गुजरात में गिरनार के मन्दिर प्रसिद्ध हैं। दक्षिण  भारत में श्रीरंगपट्टन का मंदिर सबसे बड़ा और स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना  है। यहां पर एक सहस्र स्तंभों वाला (१६न्७०) मण्डप है, जिसका कमरा ४५०न्१३०  फुट है। यहां गोकुल जैसा बड़ा और कलात्मक गोपुर और कहीं-कहीं कुण्डलाकार  बेलें, पुष्पाकृतियों आदि अनोखी छटा उत्पन्न करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;११वीं शताब्दी का रामेश्वरम्‌ मंदिर चार धामों में से एक धाम है।  मदुरई का मीनाक्षी मन्दिर कला का अप्रतिम नमूना है। इसकी लम्बाई ८४७ फुट,  चौड़ाई ७९५ फुट ऊंचाई १६० फुट है। इसके परकोटे में ११ गोपुर हैं। एक सहस्र  स्तंभों वाला मंडप यहां भी है और इसकी विशेषता है कि प्रत्येक स्तंभ की  कारीगीरी, मूर्तियां व मुद्राएं भिन्न-भिन्न है। दक्षिण भारत में कला का यह  सर्वश्रेष्ठ नमूना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार पूरे भारत में सहस्रों मंदिर, महल, प्रासाद प्राचीन  शिल्पज्ञान की गाथा कह रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिल्प के कुछ अद्भुत नमूने- (१) अजंता की गुफा में एक बुद्ध  प्रतिमा है। इस प्रतिमा को यदि अपने बायीं ओर से देखें तो भगवान बुद्ध  गंभीर मुद्रा में दृष्टिगोचर होते हैं, सामने से देखें तो गहरे ध्यान में  लीन शांत दिखाई देते हैं और दायीं ओर देखें तो उनके मुखमंडल पर हास्य  अभिव्यक्त होता है। एक ही मूर्ति के भाव कोण बदलने के साथ बदल जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य में बना विट्ठल मंदिर शिल्पकला  का अप्रतिम नमूना है। इसका संगीत खण्ड यह बताता है कि पत्थर, उनके प्रकार,  विशेषता और किस पत्थर को कैसे तराशने से और किस कोण पर स्थापित करने पर  उसमें से विशेष ध्वनि निकलेगी। इस खण्ड के विभिन्न स्तंभों से संपूर्ण  संगीत व वाद्यों का अनुभव होता है। इसमें प्रवेश करते ही सर्वप्रथम सात  स्तंभ हैं। इसमें प्रथम स्तंभ पर कान लगाएं और उस पर आघात दें। तो स की  ध्वनि निकलती है और सात स्वरों के क्रम से आगे के स्तम्भों में से  रे,ग,म,प,ध,नी की ध्वनि निकलती है। आगे अलग-अलग स्तंभों से अलग-अलग वाद्यों  की ध्वनि निकलती है। किसी स्तम्भ से तबले की, किसी स्तंभ से बांसुरी की,  किसी से वीणा की। जिन्होंने यह बनाया, उन्होंने पत्थरों में से संगीत प्रकट  कर दिया। आज भी उन अनाम शिल्पियों की ये अमर कृतियां भारतीय शिल्प शास्त्र  की गौरव गाथा     कहती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चित्रकला&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास स्थित अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के  चित्रों की चमक हजार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों  के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों  में अभिव्यक्त किया गया है। चावल के मांड, गोंद और अन्य कुछ पत्तियों तथा  वस्तुओं का सम्मिश्रमण कर आविष्कृत किए गए रंगों से ये चित्र बनाए गए। लगभग  हजार साल तक भूमि में दबे रहे और १८१९ में पुन: उत्खनन कर इन्हें प्रकाश  में लाया गया। हजार वर्ष बीतने पर भी इनका रंग हल्का नहीं हुआ, खराब नहीं  हुआ, चमक यथावत बनी रही। कहीं कुछ सुधारने या आधुनिक रंग लगाने का प्रयत्न  हुआ तो वह असफल ही हुआ। रंगों और रेखाओं की यह तकनीक आज भी गौरवशाली अतीत  का याद दिलाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्रिटिश संशोधक मि। ग्रिफिथ कहते हैं ‘अजंता में जिन चितेरों ने  चित्रकारी की है, वे सृजन के शिखर पुरुथ थे। अजंता में दीवारों पर जो  लंबरूप (खड़ी) लाइनें कूची से सहज ही खींची गयी हैं वे अचंभित करती हैं।  वास्तव में यह आश्चर्यजनक कृतित्व है। परन्तु जब छत की सतह पर संवारी  क्षितिज के समानान्तर लकीरें, उनमें संगत घुमाव, मेहराब की शक्ल में  एकरूपता के दर्शन होते हैं और इसके सृजन की हजारों जटिलताओं पर ध्यान जाता  है, तब लगता है वास्तव में यह विस्मयकारी आश्चर्य और कोई चमत्कार है।‘ &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;( क्रमश: )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-3125483398365249577?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/3125483398365249577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/3125483398365249577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3608.html' title='स्थापत्य शास्त्र-२ : अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराहो - ये हैं भारतीय शिल्प की चमत्कारिक धरोहर'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-4936481131042812610</id><published>2010-06-03T14:56:00.000+05:30</published><updated>2010-06-03T14:57:35.284+05:30</updated><title type='text'>स्थापत्य शास्त्र-१ : नगर रचना के श्रेष्ठतम उदाहरण</title><content type='html'>&lt;div id=":3d" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt; &lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt; &lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt; हमारे यहां स्थापत्य शास्त्र की परिधि काफी व्यापक रही है। इसमें नगर रचना,  भवन, मन्दिर, मूर्तियां, चित्रकला- सब कुछ आता था। नगरों में सड़कें,  जल-प्रदाय व्यवस्था, सार्वजनिक सुविधा हेतु स्नानघर, नालियां, भवन के  आकार-प्रकार, उनकी दिशा, माप, भूमि के प्रकार, निर्माण में काम आने वाली  वस्तुओं की प्रकृति आदि का विचार किया गया था और यह सब प्रकृति से सुसंगत  हो, यह भी देखा जाता था। जल प्रदाय व्यवस्था में बांध, कुआं, बावड़ी, नहरें,  नदी आदि का भी विचार होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी प्रकार के निर्माण हेतु शिल्प शास्त्रों में विस्तार से   विचार किया गया है। हजारों वर्ष पूर्व वे कितनी बारीकी से विचार करते थे,  इसका भी ज्ञान होता है। शिल्प कार्य के लिए मिट्टी, एंटें, चूना, पत्थर,  लकड़ी, धातु तथा रत्नों का उपयोग किया जाता था। इनका प्रयोग करते समय कहा  जाता था कि इनमें से प्रत्येक वस्तु का ठीक से परीक्षण कर उनका निर्माण में  आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिए। परीक्षण हेतु वह माप कितने वैज्ञानिक  थे, इसकी कल्पना हमें निम्न उद्धरण से आ सकती है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि भृगु कहते हैं कि निर्माण उपयोगी प्रत्येक वस्तु का परीक्षण  निम्न मापदंडों पर करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्णलिंगवयोवस्था: परोक्ष्यं च बलाबलं।&lt;br /&gt;यथायोग्यं, यथाशक्ति: संस्कारान्कारयेत्‌ सुधी:॥&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(भृगु संहिता)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ वस्तु का वर्ण (रंग), लिंग (गुण, चिन्ह), आयु (रोपण काल  से आज तक) अवस्था (काल खंड के परिणाम) तथा इन सबके कारण वस्तु की ताकत  देखकर उस पर जो खिंचाव पड़ेगा, उसे देख-परखकर यथोचित रूप में सभी संस्कारों  को करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें वर्ण का अर्थ रंग है। पर शिल्प शास्त्र में इसका उपयोग  प्रकाश को परावृत करता है। अत: इसे उत्तम वर्ण कहा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माण के संदर्भ में अनेक प्राचीन ऋषियों के शास्त्र मिलते हैं,  जैसे-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र-इसमें विश्वकर्मा निर्माण के संदर्भ  में प्रथम बात बताते हैं- ‘पूर्व भूमिं परिक्ष्येत पश्चात्‌ वास्तु  प्रकल्पयेत्‌‘ अर्थात्‌ पहले भूमि परीक्षण कर फिर वहां निर्माण करना चाहिए।  इस शास्त्र में विश्वकर्मा आगे कहते हैं उस भूमि में निर्माण नहीं करना  चाहिए जो बहुत पहाड़ी हो, जहां भूमि में बड़ी-बड़ी दरारें हों आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) काश्यप शिल्प-इसमें कश्यप ऋषि कहते हैं नींव तब तक खोदनी चाहिए  जब तक जल न दिखे, क्योंकि इसके बाद चट्टानें आती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) भृगु संहिता-इसमें भृगु कहते हैं कि जमीन खरीदने के पहले भूमि  का पांच प्रकार अर्थात्‌ रूप, रंग, रस, गन्ध और स्पर्श से परीक्षण करना  चाहिए। वे इसकी विधि भी बताते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त भवन निर्माण में आधार के हिसाब से दीवारें, उनकी  मोटाई, उसकी आन्तरिक व्यवस्था आदि का भी विस्तार से वर्णन मिलता है। इस  ज्ञान के आधार पर हुए निर्माणों के अवशेष सदियां बीतने के बाद भी अपनी  कहानी कहते हैं, जिसके कुछ निम्नानुसार हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहनजोदड़ो (सिंध)-पुरातात्विक उत्खनन में प्राप्त ईसा से ३००० वर्ष  पूर्व के नगर मोहनजोदड़ो की रचना देखकर आश्चर्य होता है। अत्यंत  सुव्यवस्थित ढंग से बसा हुआ है यह नगर मानो उसके भवन तथा सड़कें - सब  रेखागणितीय माप के साथ बनाए गए थे। इस नगर में मिली सड़कें एकदम सीधी थीं  तथा पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण बनी हुई थीं। दूसरी आश्चर्य की बात  यह कि ये एक-दूसरे से ९० अंश के कोण पर थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भवन निर्माण अनुपात में था। एंटों के जोड़, दीवारों की ऊंचाइयां  बराबर थीं। भोजनालय, स्नानघर रहने के कमरे आदि की उचित व्यवस्था थी। नगर  में रिहायशी भवन, बगीचे, सार्वजनिक भवन के साथ ही बहुत बड़ा सार्वजनिक  स्नानागार भी मिला था, जो ११.८२ मीटर लम्बा, ७.०१ मी. चौड़ा तथा २.४४ मीटर  ऊंचा है, जिसमें पानी हेतु दो धाराएं थीं। दूसरी बात, दीवारों में एंटों पर  ऐसा पदार्थ लगा था जिस पर पानी का असर न हो। इस नगर को देखकर ध्यान में  आता है कि नगर को बसाने वाले निर्माण शास्त्र में बहुत पारंगत थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) द्वारका- इसी प्रकार डा. एस.आर.राव ने पुरातात्विक उत्खनन में  द्वारका को खोजा और वहां जो पुरावशेष मिले वे बताते हैं कि द्वारका नगर भी  सुव्यवस्थित बसा था। नगर के चारों ओर दीवार थी। भवन निर्माण जिन पत्थरों से  होता था उनका समुद्री पानी में क्षरण नहीं होता था। दो मंजिले भवन, सड़कें  तथा पानी की व्यवस्था वहां दृष्टिगोचर होती है। इस खुदाई में तांबा, पीतल व  कुछ मिश्र धातुएं प्राप्त हुई हैं जिनमें जस्ता ३४ प्रतिशत तक मिश्रित है।  निर्माण में आने वाले स्तंभ, खिड़कियों के पट आदि का माप व आकार पूर्ण  गणितीय ढंग से था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३) लोथल बंदरगाह (सौराष्ट्र)-ईसा से २५०० वर्ष पूर्व लोथल का  बंदरगाह बनाया गया, जहां छोटी नावें ही नहीं अपितु बड़े-बड़े जहाज भी रुका  करते थे। यहां बंदरगाह होने के कारण एक बड़ा शहर भी बसा था। इसकी रचना लगभग  मोहनजोदड़ो, हड़प्पा जैसी ही थी। सड़कें, भवन, बगीचे, सार्वजनिक उपयोग के भवन  आदि थे। दूसरे, यहां श्मशान शहरी बस्ती से दूर बनाया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोथल बंदरगाह ३०० मीटर उत्तर-दक्षिण तथा ४०० मीटर  पूर्व-पश्चिम था  और बाढ़, तूफान रोकने हेतु १३ मीटर की दीवार एंट, मिट्टी आदि की बनी थी। यह  बंदरगाह बाद के काल बने में फोनेशियन और रोमन बंदरगाहों से बहुत विकसित  था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) वाराणसी-क्लॉड वेटली ने भारतीय शिल्प के बारे में लिखा है कि  भारत की महान शिल्प विरासत की उपेक्षा की गयी है। बहुत सारी आधुनिक इमारतें  भव्यता के बाद भी भारत को आबोहवा, मानसूनी हवाओं, जलवृष्टि और लंबरूप  सूर्य के प्रकाश के कारण प्रतिकूल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के परम्परागत वास्तु शिल्प की आवश्यक बातें पत्थर की कुर्सी,  मोटी दीवारें, खिड़कियों का फर्स की ओर झुकाव, जिससे हवा का आगम-निर्गम  (सरकुलेशन) उन्मुक्त रहे, भीतरी आंगन, तलघर, टेरेसनुमा छप्पर का निर्माण  प्रचलित रहे हैं। भारतीय वास्तु शिल्प में इन बातों का ध्यान समुदाय की  सुविधाओं और वृद्धिशील स्वास्थ्य के मद्देनजर रखा गया। वाराणसी विश्व का  पहला नियोजित नगर माना गया है। प्राचीन भारत में जलशक्ति अभियांत्रिकी के  विद्वान प्रो. भीमचन्द्र चटर्जी भारत के जल अभियांत्रिकी  विज्ञान के बारे  में लिखते हैं कि अयोध्या की राज्य परम्परा की चार पीढ़ियां अनवरत हिमालय से  गंगा को लाने के लिए समर्पित रहीं और महान भगीरथ गंगा अवतरण में सफल हुए।  गंगा का प्रवाह बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवर्तित किया गया। वाराणसी के सामने  गंगा को घुमाव दिया गया। यहां यह उत्तरामुखी होती है और इसकी दो शाखाएं  होती हैं- वरुणा और असी। इनका जल पोषण गंगा ने किया। ऐसे घनत्व के स्थान  जहां बाढ़ में जलागम बढ़ने पर अति जलागार को दूर प्रवाहित किया जा सके। बाढ़  रोकने का ऐसा अप्रतिम उदाहरण दूसरा नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५) नगर नियोजन की नौ आवश्यक बातें (नवागम नगरम्‌ प्राहु:)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. जलापूर्ति- पेयजल, जल-मल की शुद्धि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. मंडप-यात्रियों के लिए विश्रामालय, धर्मशालाएं, अतिथि गृह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. हाट-उपभोक्ता सामग्री क्रय-विक्रय स्थल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४. दांडिक और पुलिस- अपराध अनुसंधान, दंड विधान की व्यवस्था, न्याय  व्यवस्था, अराजक तत्वों से सुरक्षा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५. बगीचा उद्यान- बाग-बगीचा, आमोद-प्रमोद और शिक्षा संस्थाओं के  लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;६. आबादी- आवासीय व्यवस्था, कार्यशालाएं, कल कारखाने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;७. श्मशान- अन्तेष्टि स्थल और अस्थि विसर्जन की व्यवस्था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;८. स्वास्थ्य-  अस्पताल, स्वास्थ्य निदान केन्द्र।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;९. मन्दिर- देवी-देवता स्थल, सभी मतावलंबियों की सुविधा, समागम  स्थल, सार्वजनिक समारोह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(६) प्राचीन भारत में नगर नियोजन का दुर्लभ उदाहरण- कांजीवरम्‌ नगर  नियोजन का अनुपम उदाहरण है। विश्व के नगर नियोजन विज्ञानी कांजीवरम्‌ का  नियोजन देखकर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। प्राचीन भारत में दक्षिण के  नगर नियोजन के विशिष्ट वैभव के विषय में सी.पी.वेंकटराम अय्यर ने १९१६ में  लिखा है कि प्राचीन नगर कांजीवरम्‌ परम्परागत श्रेष्ठ नगर नियोजन का एक  दुर्लभ नमूना है। प्रोफेसर गेडेड ने इसे नगर नियोजन के भारत के चिन्तन और  नागरिक सोच का उत्कर्ष कहा है और उसकी भूरि-भूरि सराहना की है। यहां अनुकूल  आराम, कामकाजी दक्षता के अनुरूप नगर नियोजन ने प्रो.गेडेड की अत्यंत  प्रभावित किया है। यह प्राचीन भारत में नगर नियोजन का ठोस सबूत है।  प्रोफेसर गेडेड के विचार से नगर की योजना की यह उत्कृष्ट सोच है। नागरिक  सोच की जितनी उत्कृष्ट कल्पना हो सकती है, शिल्पियों ने यहां उसे मूर्त रूप  दिया है। उन्होंने मौलिक रूप से मन्दिरों के नगर को बहुत ही विलक्षण  कल्पना से संवारा है। नगर को मंदिरों से मात्र आकार ही नहीं दिया गया है  अपितु अनेक दृष्टियों से यह छोटी-छोटी बातों में समृद्ध है, जो आनंदित करता  है। यहां समुदायों का अलग-अलग सपना साकार होता है। मानव की कल्पना तथा  व्यवहार की गरिमा मूर्तरूप होती है। साथ ही व्यक्तिगत कलाकार को अपनी  सुरुचिपूर्ण स्वायत्तता सुलभ है। अन्यत्र कहीं भी, यहां तक कि दुनिया के  समृद्धतम नगरों में भी यह दुर्लभ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेंट एम्ड्रयूज से ईडन, लिंकन से न्यूयार्क, आक्सफोर्ड से  सेल्सबरी, एक्सेला चोपेले से कोलोग और फ्र्ीबर्ग रोबर से नाइम्स तक इसके  विपरीत परिस्थितियां दृष्टिगोचर होती हैं। वहां नगर नियोजन के मामले में  सम्यक्‌ बोध का अभाव और गिरावट है। झुग्गी-झोपड़ियों की बसावट है। इस सब  विकृति से भारतीय नगर नियोजन कल्पना का मुक्त होना भारत के वास्तुवैभव,  शिल्प की श्रेष्ठता और नगर नियोजन की समृद्धि का प्रमाण है।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;(क्रमश:)&lt;/span&gt; &lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-4936481131042812610?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4936481131042812610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/4936481131042812610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_3314.html' title='स्थापत्य शास्त्र-१ : नगर रचना के श्रेष्ठतम उदाहरण'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-1392780733508627797</id><published>2010-06-03T14:55:00.001+05:30</published><updated>2010-08-21T17:21:47.702+05:30</updated><title type='text'>खगोल विज्ञान-२ : आर्यभट्ट ने खंगाला खगोल</title><content type='html'>&lt;div id=":3h" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt; लीलावती अपने पिता से पूछती है कि पिताजी, मुझे तो पृथ्वी चारों ओर सपाट  दिखाई देती है, फिर आप यह क्यों कहते हैं कि पृथ्वी गोल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब भास्कराचार्य कहते हैं कि पुत्री, जो हम देखते हैं वह सदा वैसा  ही सत्य नहीं होता। तुम एक बड़ा वृत्त खींचो, फिर उसकी परिधि के सौवें भाग  को देखो, तुम्हें वह सीधी रेखा में दिखाई देगा। पर वास्तव में वह वैसी नहीं  होता, वक्र होता है। इसी प्रकार विशाल पृथ्वी के गोले के छोटे भाग को हम  देखते हैं, वह सपाट नजर आता है। वास्तव में पृथ्वी गोल है।&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;समो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यत&lt;/span&gt;: &lt;span&gt;स्यात्परिधे&lt;/span&gt;: &lt;span&gt;शतांश&lt;/span&gt;:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;पृथ्वी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पृथ्वी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नितरां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तनीयान्&lt;/span&gt;‌&lt;span&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;नरश्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तत्पृष्ठगतस्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुत्स्ना&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;समेव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तस्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतिभात्यत&lt;/span&gt;: &lt;span&gt;सा॥&lt;/span&gt; &lt;span&gt;१३&lt;/span&gt; &lt;span&gt;॥&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;em&gt; &lt;span&gt;                                                      सिद्धांत&lt;/span&gt; शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पृथ्वी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;स्थिर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;है&lt;/span&gt;:-पश्चिम में १५वीं सदी में गैलीलियों के समय  तक धारणा रही कि पृथ्वी स्थिर है तथा सूर्य उसका चक्कर लगाता है, परन्तु आज  से १५०० वर्ष पहले हुए आर्यभट्ट, भूमि अपने अक्ष पर घूमती है, इसका विवरण  निम्न प्रकार से देते हैं-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;अनुलोमगतिनौंस्थ&lt;/span&gt;: &lt;span&gt;पश्यत्यचलम्&lt;/span&gt;‌&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;विलोमंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यद्वत्&lt;/span&gt;‌&lt;span&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;अचलानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तद्वत्&lt;/span&gt;‌ &lt;span&gt;सम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;पश्चिमगानि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लंकायाम्&lt;/span&gt;‌&lt;span&gt;॥&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;em&gt;                                                                 आर्यभट्टीय गोलपाद-९&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ नाव में यात्रा करने वाला जिस प्रकार किनारे पर स्थिर  रहने वाली चट्टान, पेड़ इत्यादि को विरुद्ध दिशा में भागते देखता है, उसी  प्रकार अचल नक्षत्र लंका में सीधे पूर्व से पश्चिम की ओर सरकते देखे जा  सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार पृथुदक्‌ स्वामी, जिन्होंने व्रह्मगुप्त के व्रह्मस्फुट  सिद्धान्त पर भाष्य लिखा है, आर्यभट्ट की एक आर्या का उल्लेख किया है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;भ पंजर: स्थिरो भू रेवावृत्यावृत्य प्राति दैविसिकौ।&lt;br /&gt;उदयास्तमयौ संपादयति नक्षत्रग्रहाणाम्‌॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ तारा मंडल स्थिर है और पृथ्वी अपनी दैनिक घूमने की गति से   नक्षत्रों तथा ग्रहों का उदय और अस्त करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने ग्रंथ आर्यभट्टीय में आर्यभट्ट ने दशगीतिका नामक प्रकरण में  स्पष्ट लिखा-प्राणे नैतिकलांभू: अर्थात्‌ एक प्राण समय में पृथ्वी एक कला  घूमती है (एक दिन में २१६०० प्राण होते हैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सूर्योदय&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सूर्यास्त&lt;/span&gt;-भूमि गोलाकार होने के कारण विविध नगरों में  रेखांतर होने के कारण अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग समय पर सूर्योदय व  सूर्यास्त होते हैं। इसे आर्यभट्ट ने ज्ञात कर लिया था, वे लिखते हैं-&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;उदयो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;यो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;लंकायां&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;सोस्तमय&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;सवितुरेव&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;सिद्धपुरे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;मध्याह्नो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;यवकोट्यां&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;रोमक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;विषयेऽर्धरात्र&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;: &lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;स्यात्&lt;/span&gt;‌&lt;span style="font-style: italic;"&gt;॥&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;em style="font-style: italic;"&gt;                                                      (आर्यभट्टीय गोलपाद-१३)&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ जब लंका में सूर्योदय होता है तब सिद्धपुर में सूर्यास्त  हो जाता है। यवकोटि में मध्याह्न तथा रोमक प्रदेश में अर्धरात्रि होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;चंद्र-सूर्यग्रहण&lt;/span&gt;- आर्यभट्ट ने कहा कि राहु केतु के कारण नहीं  अपितु पृथ्वी व चंद्र की छाया के कारण ग्रहण होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात्‌ पृथ्वी की बड़ी छाया जब चन्द्रमा पर पड़ती है तो चन्द्र  ग्रहण होता है। इसी प्रकार चन्द्र जब पृथ्वी और सूर्य के बीच आता है तो  सूर्यग्रहण होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;विभिन्न ग्रहों की दूरी&lt;/span&gt;- आर्यभट्ट ने सूर्य से विविध ग्रहों की दूरी के बारे में बताया है। वह आजकल के माप से मिलता-जुलता है। आजकल पृथ्वी से सूर्य की दूरी (15 करोड़ किलोमीटर) है। इसे AU ( Astronomical unit) कहा जाता है। इस अनुपात के आधार पर निम्न सूची बनती है।  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;table align="center" border="1" cellpadding="5" cellspacing="0"&gt; &lt;tbody&gt;&lt;tr&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;ग्रह  &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;आर्यभट्ट  का मान &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;वर्तमान  मान&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;बुध&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;०.३७५  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;०.३८७  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;शुक्र&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;०.७२५  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;०.७२३  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;मंगल&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;१.५३८  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;१.५२३  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;गुरु&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;५.१६  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;५.२०  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;tr&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;शनि&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;९.४१  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;td align="left" valign="middle" nowrap="nowrap"&gt;&lt;span&gt;९.५४  एयू&lt;/span&gt;&lt;/td&gt; &lt;/tr&gt; &lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt; &lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;व्रह्माण्ड का विस्तार&lt;/span&gt;- व्रह्माण्ड की विशालता का भी हमारे पूर्वजों ने  अनुभव किया था। आजकल व्रह्माण्ड की विशालता मापने हेतु प्रकाश वर्ष की इकाई  का प्रयोग होता है। प्रकाश एक सेकेंड में ३ लाख किलोमीटर की गति से भागता  है। इस गति से भागते हुए एक वर्ष में जितनी दूरी प्रकाश तय करेगा उसे  प्रकाश वर्ष कहा जाता है। इस पैमाने से आधुनिक विज्ञान बताता है कि हमारी  आकाश गंगा, जिसे  Milki way ‌ कहा जाता है, की लम्बाई एक  लाख प्रकाश वर्ष है तथा चौड़ाई दस हजार प्रकाश वर्ष है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आकाश गंगा के ऊपर स्थित एण्ड्रोला नामक आकाश गंगा इस आकाश गंगा  से २० लाख २० हजार प्रकाश वर्ष दूर है और व्रह्माण्ड में ऐसी करोड़ों आकाश  गंगाएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमद्भागवत में राजा परीक्षित महामुनि शुकदेव से पूछते हैं,  व्रह्माण्ड का व्याप क्या है? इसकी व्याख्या में शुकदेव व्रह्माण्ड के  विस्तार का उल्लेख करते हैं- ‘हमारा जो व्रह्माण्ड है, उसे उससे दस गुने  बड़े आवरण ने ढंका हुआ है। प्रत्येक ऊपर का आवरण दस गुना है और ऐसे सात आवरण  मैं जानता हूं। इन सबके सहित यह समूचा व्रह्माण्ड जिसमें परमाणु के समान  दिखाई देता है तथा जिसमें ऐसे करोड़ों व्रह्माण्ड हैं, वह समस्त कारणों का  कारण है।‘ ये बात बुद्धि को कुछ अबोध्य-सी लगती है। पर हमारे यहां जिस एक  शक्ति से सब कुछ उत्पन्न-संचालित माना गया, उस ईश्वर के अनेक नामों में एक  नाम अनंत कोटि व्रह्माण्ड नायक बताया गया है। यह नाम जहां व्रह्मांडों की  अनन्तता बताता है, वहीं इस विश्लेषण के वैज्ञानिक होने की अनुभूति भी कराता  है। इस प्रकार इस संक्षिप्त अवलोकन से हम कह सकते हैं कि काल गणना और खगोल  विज्ञान की भारत में उज्ज्वल परम्परा रही है। पिछली सदियों में यह धारा  कुछ अवरुद्ध सी हो गई थी। आज पुन: उसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा पूर्वकाल के  आचार्य आज की पीढ़ी को दे रहे हैं। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt;(क्रमश:)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-1392780733508627797?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/1392780733508627797'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/1392780733508627797'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_7859.html' title='खगोल विज्ञान-२ : आर्यभट्ट ने खंगाला खगोल'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-5854530188921723350</id><published>2010-06-03T14:51:00.003+05:30</published><updated>2010-08-21T17:11:07.714+05:30</updated><title type='text'>खगोल विज्ञान-१ : न्यूटन से पहले भास्कराचार्य ने बताया था गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त</title><content type='html'>&lt;div id=":4j" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;खगोल विज्ञान को वेद का नेत्र कहा गया, क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टियों में होने वाले व्यवहार का निर्धारण काल से होता है और काल का ज्ञान ग्रहीय गति से होता है। अत: प्राचीन काल से खगोल विज्ञान वेदांग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राहृण आदि ग्रथों में नक्षत्र, चान्द्रमास, सौरमास, मल मास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प का माप आदि के संदर्भ में अनेक उद्धरण मिलते हैं। इस हेतु ऋषि प्रत्यक्ष अवलोकन करते थे। कहते हैं, ऋषि दीर्घतमस् सूर्य का अध्ययन करने में ही अंधे हुए, ऋषि गृत्स्मद ने चन्द्रमा के गर्भ पर होने वाले परिणामों के बारे में बताया। यजुर्वेद के 18वें अध्याय के चालीसवें मंत्र में यह बताया गया है कि सूर्य किरणों के कारण चन्द्रमा प्रकाशमान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यंत्रों का उपयोग कर खगोल का निरीक्षण करने की पद्धति रही है। आर्यभट्ट के समय आज से 1500 से अधिक वर्ष पूर्व पाटलीपुत्र में वेधशाला (Observatory) थी, जिसका प्रयोग कर आर्यभट्ट ने कई निष्कर्ष निकाले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के यंत्राध्याय प्रकरण में कहते हैं, "काल" के सूक्ष्म खण्डों का ज्ञान यंत्रों के बिना संभव नहीं है। इसलिए अब मैं यंत्रों के बारे में कहता हूं। वे नाड़ीवलय यंत्र, यष्टि यंत्र, घटी यंत्र, चक्र यंत्र, शंकु यंत्र, चाप, तुर्य, फलक आदि का वर्णन करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्रत्यक्ष निरीक्षण एवं अचूक ग्रहीय व कालगणना का 6000 वर्ष से अधिक पुराना इतिहास :- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री धर्मपाल ने "Indian Science and Technology in the Eighteenth Century" नामक पुस्तक लिखी है। उसमें प्रख्यात खगोलज्ञ जॉन प्लेफेयर का एक लेख "Remarks on the Astronomy of the brahmins" (1790 से प्रकाशित) दिया है। यह लेख सिद्ध करता है कि 6000 से अधिक वर्ष पूर्व में भारत में खगोल का ज्ञान था और यहां की गणनाएं दुनिया में प्रयुक्त होती थीं। उनके लेख का सार यह है कि सन् 1667 में एम.लॉ. लाबेट, जो स्याम के दूतावास में थे, जब वापस आये तो अपने साथ एक पंचांग लाए। दो पंचांग मिशनरियों ने भारत से भेजे, जो एक दक्षिण भारत से था और एक वाराणसी से। एक और पंचांग एम.डी. लिस्ले ने भेजा, जो दक्षिण भारत के नरसापुर से था। वह पंचांग जब उस समय के फ्रेंच गणितज्ञों की समझ में न आया तो उन्होंने वह जॉन प्लेफेयर के पास भेज दिया, जो उस समय रॉयल एस्ट्रोनोमर थे। उन्होंने जब एक और विचित्र बात प्लेफेयर के ध्यान में आई कि स्याम के पंचांग में दी गई यामोत्तर रेखा-दी मेरिडियन (आकाश में उच्च काल्पनिक बिन्दु से निकलती रेखा) 180-15"। पश्चिम में है और स्याम इस पर स्थित नहीं है। आश्चर्य कि यह बनारस के मेरिडियन से मिलती है। इसका अर्थ है कि स्याम के पंचांग का मूल हिन्दुस्तान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात वह लिखता है, "एक आश्चर्य की बात यह है कि सभी पंचांग एक संवत् का उल्लेख करते हैं, जिसे वे कलियुग का प्रारंभ मानते हैं। और कलियुग के प्रारंभ के दिन जो नक्षत्रों की स्थिति थी, उसका वर्णन अपने पंचांग में करते हैं तथा वहीं से काल की गणना करते हैं। उस समय ग्रहों की क्या स्थिति थी, यह बताते हैं। तो यह बड़ी विचित्र बात लगती है। क्योंकि कलियुग का प्रारंभ यानि ईसा से 3000 वर्ष पुरानी बात।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;(1) ब्राहृणों ने गिनती की निर्दोष और अचूक पद्धति विकसित की होगी तथा ब्रह्मांड में दूर और पास के ग्रहों को आकर्षित करने के लिए कारणीभूत गुरुत्वाकर्षण के नियम से ब्राहृण परिचित थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) ब्राहृणों ने आकाश का निरीक्षण वैज्ञानिक ढंग से किया।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्लेफेयर के निष्कर्ष &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अंत में प्लेफेयर दो बातें कहते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(1) यह सिद्ध होता है कि भारत वर्ष में एस्ट्रोनॉमी ईसा से 3000 वर्ष पूर्व से थी तथा कलियुगारम्भ पर सूर्य और चन्द्र की वर्णित स्थिति वास्तविक निरीक्षण पर आधारित थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) एक तटस्थ विदेशी का यह विश्लेषण हमें आगे कुछ करने की प्रेरणा देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री धर्मपाल ने अपनी इसी पुस्तक में लिखा है कि तत्कालीन बंगाल की ब्रिाटिश सेना के सेनापति, जो बाद में ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य बने, सर रॉबर्ट बारकर ने 1777 में लिखे एक लेख Bramins observatory at Banaras (बनारस की वेधशाला) पर प्रकाश डाला है। सन् 1772 में उन्होंने वेधशाला का निरीक्षण किया था। उस समय इसकी हालत खराब थी क्योंकि लंबे समय से उसका कोई उपयोग नहीं हुआ था। इसके बाद भी उस वेधशाला में जो यंत्र व साधन बचे थे , उनका श्री बारकर ने बारीकी से अध्ययन किया। उनके निरीक्षण में एक महत्वपूर्ण बात यह ध्यान में आई कि ये साधन लगभग 400 वर्ष पूर्व तैयार किए गए थे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्राचीन खगोल विज्ञान की कुछ झलकियां &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(1) प्रकाश की गति :- क्या हमारे पूर्वजों को प्रकाश की गति का ज्ञान था? उपर्युक्त प्रश्न एक बार गुजरात के राज्यपाल रहे श्री के.के.शाह ने मैसूर विश्वविद्यालय के भौतिकी के प्राध्यापक प्रो. एल. शिवय्या से पूछा। श्री शिवय्या संस्कृत और विज्ञान दोनों के जानकार थे। उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, "हां जानते थे।" प्रमाण में उन्होंने बताया कि ऋग्वेद के प्रथम मंडल में दो ऋचाएं है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनो न योऽध्वन: सद्य एत्येक: सत्रा सूरो वस्व ईशे अर्थात् मन की तरह शीघ्रगामी जो सूर्य स्वर्गीय पथ पर अकेले जाते हैं। ( 1-71-9) ("तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिकृदसि सूर्य विश्वमाभासिरोचनम्" अर्थात् हे सूर्य, तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो। ( 1.50.9)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;योजनानां सहस्रे द्वे द्वेशते द्वे च योजने। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;अर्थात् आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें 1 योजन- 9 मील 160 गज&lt;br /&gt;अर्थात् 1 योजन- 9.11 मील&lt;br /&gt;1 दिन रात में- 810000 अर्ध निषेष&lt;br /&gt;अत: 1 सेकेंड में - 9.41 अर्ध निमेष&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार 2202 x 9.11- 20060.22 मील प्रति अर्ध निमेष तथा 20060.22 x 9.41- 188766.67 मील प्रति सेकण्ड। आधुनिक विज्ञान को मान्य प्रकाश गति के यह अत्यधिक निकट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) गुरुत्वाकर्षण: "पिताजी, यह पृथ्वी, जिस पर हम निवास करते हैं, किस पर टिकी हुई है?" लीलावती ने शताब्दियों पूर्व यह प्रश्न अपने पिता भास्कराचार्य से पूछा था। इसके उत्तर में भास्कराचार्य ने कहा, "बाले लीलावती, कुछ लोग जो यह कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कछुआ या हाथी या अन्य किसी वस्तु पर आधारित है तो वे गलत कहते हैं। यदि यह मान भी लिया जाए कि यह किसी वस्तु पर टिकी हुई है तो भी प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी हुई है और इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण... यह क्रम चलता रहा, तो न्याय शास्त्र में इसे अनवस्था दोष कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीलावती ने कहा फिर भी यह प्रश्न बना रहता है पिताजी कि पृथ्वी किस चीज पर टिकी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब भास्कराचार्य ने कहा,क्यों हम यह नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी भी वस्तु पर आधारित नहीं है।..... यदि हम यह कहें कि पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है और इसे धारणात्मिका शक्ति कह दें तो क्या दोष है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर लीलावती ने पूछा यह कैसे संभव है।&lt;br /&gt;तब भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।4&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश (5) &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;आगे कहते हैं-&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;आकृष्यते तत्पततीव भाति &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश- (6) &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p style="text-align: left;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने यह बता  दिया था।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7457787634958475595-5854530188921723350?l=vaigyanik-bharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/5854530188921723350'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7457787634958475595/posts/default/5854530188921723350'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vaigyanik-bharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_226.html' title='खगोल विज्ञान-१ : न्यूटन से पहले भास्कराचार्य ने बताया था गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त'/><author><name>अनुनाद सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05634421007709892634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7457787634958475595.post-1106407834290283027</id><published>2010-06-03T14:50:00.001+05:30</published><updated>2010-08-21T16:58:01.783+05:30</updated><title type='text'>कालगणना-३ : आदि से अंत तक जानने की अनूठी भारतीय विधि</title><content type='html'>&lt;div id=":aw" class="ii gt"&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;लेखक - सुरेश सोनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="justify"&gt; &lt;span&gt; &lt;span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;युगमान&lt;/span&gt;- 4,32,000 वर्ष में सातों ग्रह अपने भोग और शर को छोड़कर एक जगह आते हैं। इस युति के काल को कलियुग कहा गया। दो युति को द्वापर, तीन युति को त्रेता तथा चार युति को सतयुग कहा गया। चतुर्युगी में सातों ग्रह भोग एवं शर सहित एक ही दिशा में आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान कलियुग का आरंभ भारतीय गणना से ईसा से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था। उस समय सभी ग्रह एक ही राशि में थे। इस संदर्भ में यूरोप के प्रसिद्ध खगोलवेत्ता बेली का कथन दृष्टव्य है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हिन्दुओं की खगोलीय गणना के अनुसार विश्व का वर्तमान समय यानी कलियुग का आरम्भ ईसा के जन्म से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था। इस प्रकार यह कालगणना मिनट तथा सेकेण्ड तक की गई। आगे वे यानी हिन्दू कहते हैं, कलियुग के समय सभी ग्रह एक ही राशि में थे तथा उनके पञ्चांग या टेबल भी यही बताते हैं। ब्राहृणों द्वारा की गई गणना हमारे खगोलीय टेबल द्वारा पूर्णत: प्रमाणित होती है। इसका कारण और कोई नहीं, अपितु ग्रहों के प्रत्यक्ष निरीक्षण के कारण यह समान परिणाम निकला है।"। (Theogony of Hindus, by Bjornstjerna P. 32)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंच मण्डल क्रम वाली है। चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडल, सूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। ये उत्तरोत्तर मण्डल का चक्कर लगा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मन्वन्तर मान&lt;/span&gt;- सूर्य मण्डल के परमेष्ठी मंडल (आकाश गंगा) के केन्द्र का चक्र पूरा होने पर उसे मन्वन्तर काल कहा गया। इसका माप है 30,67,20,000 (तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष। एक से दूसरे मन्वन्तर के बीच 1 संध्यांश सतयुग के बराबर होता है। अत: संध्यांश सहित मन्वन्तर का माप हुआ 30 करोड़ 84 लाख 48 हजार वर्ष। आधुनिक मान के अनुसार सूर्य 25 से 27 करोड़ वर्ष में आकाश गंगा के केन्द्र का चक्र पूरा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कल्प&lt;/span&gt;- परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है। यानी आकाश गंगा अपने से ऊपर वाली आकाश गंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया। यानी इसका माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)। इसे ब्रह्मा का एक दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात, अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मा का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष&lt;br /&gt;ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्माण्ड की आयु- 31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,000000000 वर्ष)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय मनीषा की इस गणना को देखकर यूरोप के प्रसिद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञानी कार्ल सेगन ने अपनी पुस्तक "क्दृद्मथ्र्दृद्म" में कहा "विश्व में हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है जो इस विश्वास पर समर्पित है कि इस ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति और क्षय की एक सतत प्रक्रिया चल रही है और यही एक धर्म है, जिसने समय के सूक्ष्मतम से लेकर बृहत्तम माप, जो समान्य दिन-रात से लेकर 8 अरब 64 करोड़ वर्ष के ब्राहृ दिन रात तक की गणना की है, जो संयोग से आधुनिक खगोलीय मापों के निकट है। यह गणना पृथ्वी व सूर्य की उम्र से भी अधिक है तथा इनके पास और भी लम्बी गणना के माप है।" कार्ल सेगन ने इसे संयोग कहा है यह ठोस ग्रहीय गणना पर आधारित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ऋषियों की अद्भुत खोज&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हमारे पूर्वजों ने जहां खगोलीय गति के आधार पर काल का मापन किया, वहीं काल की अनंत यात्रा और वर्तमान समय तक उसे जोड़ना तथा समाज में सर्वसामान्य व्यक्ति को इसका ध्यान रहे इस हेतु एक अद्भुत व्यवस्था भी की थी, जिसकी ओर साधारणतया हमारा ध्यान नहीं जाता है। हमारे देश में कोई भी कार्य होता हो चाहे वह भूमिपूजन हो, वास्तुनिर्माण का प्रारंभ हो- गृह प्रवेश हो, जन्म, विवाह या कोई भी अन्य मांगलिक कार्य हो, वह करने के पहले कुछ धार्मिक विधि करते हैं। उसमें सबसे पहले संकल्प कराया जाता है। यह संकल्प मंत्र यानी अनंत काल से आज तक की समय की स्थिति बताने वाला मंत्र है। इस दृष्टि से इस मंत्र के अर्थ पर हम ध्यान देंगे तो बात स्पष्ट हो जायेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;संकल्प मंत्र में कहते हैं.... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ॐ अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्राहृणां द्वितीये परार्धे- अर्थात् महाविष्णु द्वारा प्रवर्तित अनंत कालचक्र में वर्तमान ब्रह्मा की आयु का द्वितीय परार्ध-वर्तमान ब्रह्मा की आयु के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं। श्वेत वाराह कल्पे-कल्प याने ब्रह्मा के 51वें वर्ष का पहला दिन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैवस्वतमन्वंतरे- ब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं उसमें सातवां मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अष्टाविंशतितमे कलियुगे- एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं, उनमें से 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलियुगे प्रथमचरणे- कलियुग का प्रारंभिक समय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलिसंवते या युगाब्दे- कलिसंवत् या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे- देश प्रदेश का नाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमुक स्थाने - कार्य का स्थान&lt;br /&gt;अमुक संवत्सरे - संवत्सर का नाम&lt;br /&gt;अमुक अयने - उत्तरायन/दक्षिणायन&lt;br /&gt;अमुक ऋतौ - वसंत आदि छह ऋतु हैं&lt;br /&gt;अमुक मासे - चैत्र आदि 12 मास हैं&lt;br /&gt;अमुक पक्षे - पक्ष का नाम (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)&lt;br /&gt;अमुक तिथौ - तिथि का नाम&lt;br /&gt;अमुक वासरे - दिन का नाम&lt;br /&gt;अमुक समये - दिन में कौन सा समय&lt;br /&gt;अमुक - व्यक्ति - अपना नाम, फिर पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार जिस समय संकल्प करता है, उस समय से अनंत काल तक का स्मरण सहज व्यवहार में भारतीय जीवन पद्धति में इस व्यवस्था के द्वारा आया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;काल की सापेक्षता&lt;/span&gt; - आइंस्टीन ने अपने सापेक्षता सिद्धांत में दिक् व काल की सापेक्षता प्रतिपादित की। उसने कहा, विभिन्न ग्रहों पर समय की अवधारणा भिन्न-भिन्न होती है। काल का सम्बन्ध ग्रहों की गति से रहता है। इस प्रकार अलग-अलग ग्रहों पर समय का माप भिन्न रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय छोटा-बड़ा रहता है। इसकी जानकारी के संकेत हमारे ग्रंथों में मिलते हैं। पुराणों में कथा आती है कि रैवतक राजा की पुत्री रेवती बहुत लम्बी थी, अत: उसके अनुकूल वर नहीं मिलता था। इसके समाधान हेतु राजा योग बल से अपनी पुत्री को लेकर ब्राहृलोक गये। वे जब वहां पहुंचे तब वहां गंधर्वगान चल रहा था। अत: वे कुछ क्षण रुके। जब गान पूरा हुआ तो ब्रह्मा ने राजा को देखा और पूछा कैसे आना हुआ? राजा ने कहा मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने पैदा किया है या नहीं? ब्रह्मा जोर से हंसे और कहा, जितनी देर तुमने यहां गान सुना, उतने समय में पृथ्वी पर 27 चर्तुयुगी बीत चुकी हैं और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है। तुम वहां जाओ और कृष्ण के भाई बलराम से इसका विवाह कर देना। साथ ही उन्होंने कहा कि यह अच्छा हुआ कि रेवती को तुम अपने साथ लेकर आये। इस कारण इसकी आयु नहीं बढ़ी। यह कथा पृथ्वी से ब्राहृलोक तक विशिष्ट गति से जाने पर समय के अंतर को बताती है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी कहा कि यदि एक व्यक्ति प्रकाश की गति से कुछ कम गति से चलने वाले यान में बैठकर जाए तो उसके शरीर के अ
